Saturday, January 11, 2014

"नानी तुम सच में चली गयी?"

शाम के लगभग पौने सात-सात बजे होंगे। दिन भर किसी सेमिनार से थका-हारा हॉस्टल के अपने कमरे में घुसा ही था। मोबाइल को चार्ज में लगा कर पलटा ही था कि उसी मोबाइल की रिंग बज उठी। पापा का फ़ोन था। शाम के उस समय में उनका फ़ोन आना थोड़ा अटपटा लगा था। फ़ोन उठाया और पापा के हेल्लो बोलने के अंदाज़ ने ही मन में थोड़ी बेचैनी पैदा कर दी थी। फ़ोन पर आने वाली आवाज़ में एक अजीब तरीके की मनहूसियत का अहसास हो रहा था। माहौल के ग़मज़दा होने का बोध बिना कुछ बोले ही हो रहा था। कुछ अटपटी अनहोनी की आशंका ने अभी मन में घर करना शुरू किया ही था कि पापा की आवाज़ आयी। 'नानी नहीं रहीं'। इसके आगे न पापा ने कुछ कहा और न मैंने ही कुछ और सुनने की कोशिश की। फ़ोन रख दिया।

एक दिन पहले फ़ोन पर मम्मी से बात हुई थी। नानी की तबियत पहले से ठीक हुई है, मम्मी ने बताया था। थोड़ी परेशान थी। बोल रही थी कि नानी अब ज्यादा दिन बचेगी नहीं। बेचैन थी, बोली एक बार जाकर मिलने का मन कर रहा है।  जल्दी ही जाने का प्रोग्राम बन रहा था। पापा के इस फ़ोन से अचानक एक दिन पहले की ये बातें याद आयी। कहते हैं कई बार यूँही कह दी गयी बात भी भगवान सुन लेता है और बात सच हो जाती है। अगले ही पल मन से एक धिक्कार भगवान के नाम की निकली। तुझे सुनना ही था तो ये बात। फिर याद आया कि इस खबर से मम्मी की क्या हालत हो रही होगी, और मैंने पापा से पूछा भी नहीं। तुरंत पापा को फ़ोन किया और बोल दिया कि मैं आ रहा हूँ। सोचा अभी स्टेशन चला जाउंगा तो किसी न किसी ट्रेन से सुबह तक पहुँच जाऊँगा। 

एक घंटे बाद ट्रेन में बैठा था। बिना रिजर्वेशन के। टीटी को कुछ पैसे दिए और एक सीट मिल गयी। रात भर का समय यूँही बैठे-बैठे कट गया। सोच रहा था कि नानी से तो कभी भी इतनी नजदीकी नहीं थी, फिर भी इतनी बेचैनी कैसे। फिर लगा जिनसे खून का रिश्ता होता है उनसे नजदीकी उनकी गोद में खेलकर या बैठ कर उनके साथ बातें करने से नहीं होती। खून का रिश्ता आखिर खून का ही होता है। कोसों दूर सात समंदर पार रहने वाला इंसान भी हमेशा अपनी बगल में ही महसूस होता है। कुछ ऐसा ही रिश्ता मेरा नानी के साथ था। 

शायद ही हमारे देश में कोई ऐसा बचपन होगा जो बिना नानी की कहानियों के बीता होगा। मेरा बचपन कुछ ऐसा ही था। बचपन में कहानियाँ तो कई सुनी, मगर नानी से एक भी नहीं। कहानियाँ नाना जी ही सुनाते थे और इसलिए घनिष्ठता उनसे ही अधिक थी। नाना जी के रहने से नानी के वहाँ नहीं होने की कोई कमी नहीं खलती थी। फिर क्यूँ आज नाना जी के रहते हुए नानी के चले जाने से इतनी बेचैनी हो रही है। आखिर समय पर खाने-पीने का पूछने के अलावा नानी से कभी और बात भी नहीं किया। फिर भी ट्रेन में बैठा हुआ यही सोच रहा था कि कल जब बथुआ पहुँचूँगा तो अपने कोठरी के चौखट पर बैठी, इंतज़ार करती हुई नानी वहाँ नहीं होगी। कैसा लगेगा वो खाली चौखट!

सुबह जब बथुआ पहुँचा तो नानी वहीँ थी। अपने उसी कोठरी के चौखट के पास। बैठी नहीं थी, लेटी हुई थी। आँखें बंद, मानो गहरी नींद में सोती हुई। मम्मी वहीँ पास में बैठी रो रही थी। आँखों ने सबसे पहले नाना जी को ढूँढा था। बाहर कुर्सी पर बैठे रो-रोकर बुरा हाल हो रखा था। आधी सदी से ज्यादा वक़्त जिसके साथ बिताया था वो उन्हें छोड़कर चली गयी थी। आँखों से निरंतर आंसू मेरे भी निकल रहे थे। नानी के चले जाने का ग़म ज्यादा था या नाना जी की बची हुई ज़िन्दगी के खालीपन की तकलीफ ज्यादा थी, यह बात आज भी समझ नहीं आयी।

अर्थी को कांधा देकर श्मशान तक पहुँचाना और फिर उसे चिता पर रख कर आग लगा देना बड़ा अज़ीब लग रहा था। जब बांस काटकर उसका बल्ला बनाकर बचपन में खेलता था तो यही नानी मारे चिंता के न जाने कितनी बार टोकती थी कि ध्यान से कहीं हाथ न कट जाये। आज उनको ही कटे हुए बांस की बनी अर्थी पर लिटा दिया। आग की लपटों में देखकर ऐसा लग रहा था कि मेरा कोई हिस्सा जल रहा हो। दुनिया की भी क्या अजीब रीत है! जिस बेटे को माँ ज़िन्दगी भर हर तरह के तकलीफों से दूर रखती है, जिसके लिए सारा दुःख-दर्द अपने ऊपर ले लेती है उसी बेटे के लिए सबसे बड़ा पुण्य का काम उस माँ को आग देना होता है। फूट-फूट कर रोते हुए नानी को आग देते हुए मामू का वो चेहरा आज भी भुलाये नहीं भूलता। उनके मन में क्या चल रहा होगा। अपनी माँ को आग की लपटों में डाल देने की शक्ति उनमें कहाँ से आयी होगी। अपनी माँ को जलते हुए देखकर उनका खुद का कितना बड़ा हिस्सा जल कर ख़ाक़ हो गया होगा।

किसी के चले जाने से दुनिया रुक नहीं जाती। कुछ समय के लिए जीवन अधूरा जरुर लगता है मगर ख़त्म नहीं होता। ऐसी ही बातें ऐसे समय में अपने आप का ढांढस बढ़ाने के काम आती हैं, अपने आप को साहस देती हैं। नानी जा चुकी थी। राख बनकर वहीँ श्मशान की मिट्टी में मिल चुकी थी। पूरी ज़िंदगी जितना उनके साथ बिना बात नहीं किये हुए बिता दिया, उसकी भरपाई करने की इच्छा अब उनके जाने के तीन-साढ़े तीन महीने बाद भी होती रहती है। हर वक़्त जब भी नानी का चेहरा आँखों के सामने आता है, कई सवाल मन में उठने लगते हैं। अंतिम सवाल हमेशा एक ही होता है, "नानी तुम सच में चली गयी?"     
         

1 comment:

Om Prakash said...

Riste ke ahmiyat ka ahsas kuch khas hota hai
Par afsos ki ye kayee bar samay ke baad hota hai