Monday, November 05, 2012

वो सब कुछ!


कमरे में अकेला,
पलंग पर करवटें बदलता,
घड़ी की टिक-टिक सुनता,
कोसता उस आवाज़ को
जो याद दिला रही थी उसे
बीते हुए वो दिन, वो पल,
वो सब कुछ।

वो चेहरा, वो मुस्कराहट,
बड़ी सी मुस्कुराती आँखें
शरारत से लबालब,
होठों के नीचे वो काला तिल,
तिल पर टिपटिपाती उंगलियाँ,
वो छोटी छोटी प्यारी उंगलियाँ,
उन्हें अपने हाथों में लेना
अपनी उँगलियों में उन्हें समाना
जैसे अपनी रूह में समाना उसे,
वो सब कुछ।

घड़ी की वही टिक-टिक
याद दिला रही थी उसे,
आज का उसका अकेलापन
दिल का उसका वही खालीपन।
कोशिश करता था वो
उस खालीपन को भरने का
उन्ही यादों के सहारे
उन हर खूबसूरत पलों के सहारे
जो साथ बिताया था उन्होंने,
लड़ते, झगड़ते, हँसते, खेलते,
साथ में।

कितने प्यारे थे वो दिन,
न जाने कहाँ चले गए।
आज सब धुंधला था,
वो चेहरा भी, वो मुस्कराहट भी,
वो आँखें भी, शरारत की जगह
अब आंसुओं से लबालब,
छोटी छोटी वो उंगलियाँ
तड़पती अपने आप को समाने।
वो सब कुछ।

सब कुछ धुंधला था,
आँखों में नमी थी
या सामने धुंध था,
जो भी हो,
एक उम्मीद थी,
नमी हटेगी कभी
धुंध छंटेगा कभी।
वो चेहरा, व मुस्कराहट
सब साफ़ दिखेंगे कभी,
फिर से घड़ी की सुइयां
लायेंगी वापस वही समय,
वहीँ, जहाँ शुरू हुआ था सब कुछ।
हाँ, वो सब कुछ! 

Tuesday, October 23, 2012

एक और मौत, फिर वही बेचैनी और फिर वही दौड़ती भागती ज़िन्दगी

शाम के साढ़े चार बजे थे। सुबह वार्ड की थकान को मिटाने वो आराम से अपने कमरे में सो रहा था। दुर्गा पूजा की छुट्टियाँ चल रही थी। वार्ड में ज्यादा पेशेंट थे नहीं। पिछले हफ्ते जिनका ओपरेशन हुआ था वही 3-4 बचे थे बस। एक को छोड़कर सब स्टेबल हो गए थे। एक की हालत थोड़ी गंभीर बनी हुई थी, बेड नंबर 61। उसी के चक्कर में सुबह से 3-4 दफे वार्ड के चक्कर लगाने पड़े थे। उसी की थकान थी जो अमूमन दिन में कभी न सोने वाला वो आज सो रहा था। तभी वार्ड से फ़ोन आया। सिस्टर ने इन्फॉर्म किया था, 61 नंबर की हालत बहुत ख़राब थी। जितनी जल्दी हो सका वो वार्ड में था। 61 नंबर अपनी आखिरी सांस ले चुका था। उसे विश्वास नहीं हो रहा था। आज सुबह हालत गंभीर थी मगर फिर भी बातें कर रहा था। खराब होने की उम्मीद थी मगर इतनी जल्दी हो जायेगा इसका अहसास नहीं था। दुबारा ओपरेशन करने के बारे में अभी सोचना शुरू ही तो किया था। मौत को भी न जाने कौन सी हड़बड़ी थी, शायद शाम में महा-अष्टमी के मेले में पंडालों में घुमने जाना था उसे।

मौत की फोर्मलिटी पूरी करके वो वापस अपने कमरे में आ चुका था। दुखी, अकेला और एक हद तक सन्न। जब से इस पेशे में आया है, कई मौतें देख चुका है। कोई नयी बात नहीं थी। फिर भी एक अजीब किस्म की बेचैनी थी। शायद उसकी मौत का जिम्मेदार एक हद तक अपने आप को मान रहा था। शायद वो उसे बचा सकता था। मगर कैसे। दिल था जो कह रहा था कि ये संभव था, दिमाग जानता था ऐसी मौतों को टाला नहीं जा सकता। लाख पन्ने पढने के बाद भी कभी कभी दिल दिमाग पर इस कदर हावी हो जाता है कि दिमाग की सोचने की शक्ति जाती सी लगती है। ये ऐसा ही एक समय था, जब दिल दिमाग पर हावी हुआ जा रहा था।

कमरे में बैठा वो उस दिन को याद कर रहा था जिस दिन वो पेशेंट वार्ड में एडमिट हुआ था। एक गोरा-चिट्टा भरा-पूरा अच्छे घर का दिखने वाला 46 साल का आदमी। उसने खुद बताया था, "डाक्टर बाबु! पेट में कैंसर है। शरीर में खून भी ख़त्म हो गया है। बिना खून के ओपरेशन कैसे होगा। ऊपर से हार्ट का भी रोग है। ज़िन्दगी बर्बाद हो गया है। खाली अस्पताल और डाक्टर लोग का चक्कर। एकदम परेशान हो गए हैं।" होठों के किनारों में एक मुस्कराहट आ गयी थी। शरीर में खून ख़त्म हो गया है की बात से। मैंने कहा था, "खून नहीं रहता शरीर में तो जिंदा थोड़े रहते। कुछ नहीं होगा, खून चढ़ेगा, ओपरेशन होगा, ठीक हो जाईयेगा एकदम। चिंता नहीं करिए।"

वही चेहरा बार बार उसकी आँखों के सामने आ रहा था। आँखें बंद करता तो बेड के किनारे नीचे  बैठकर चीत्कार करती पेशेंट की पत्नी याद आती। दिन भर भूखा-प्यासा खून के इंतज़ाम के लिए दौड़ता उस पेशेंट का बेटा याद आता जो अपने बाप की मौत की खबर सुनते वही वार्ड में ही बेहोश हो गया। वो सारी आँखें उसे अपनी ओर उठती और सवाल करती दिखती थी। विचलित करती, उसे परेशान करती। उसका दिल उन सभी आँखों का गुनाहगार उसे ठहरा रहा था। एक बेचैनी उसके मन में घर कर रही थी। तकरीबन आठ बज गए थे। बाहर महा-अष्टमी के मेले की धूम शुरू हो चुकी थी। चारों ओर से लाउड-स्पीकर की आवाज़े कानों में आ रही थी। घुमने जाने का प्रोग्राम उसका भी था, दोस्तों के साथ, मगर दिल इजाज़त नहीं दे रहा था।

*          *          *          *          *          *          *          *          *          *          *          *

रात के दो बज चुके थे। थका-हारा वो अपने कमरे में आ चुका था। बंगाल में आया और दुर्गा पूजा का मजा नहीं लिया तो क्या किया। यही बोलकर उसके दोस्त उसे उठाकर घूमने ले गए थे। माँ के पंडाल, पंडालों की भीड़ और भीड़ में बंगालन सुंदरियां। जब कॉलेज के दोस्त साथ होते हैं तो सुंदरियां अजेंडे में सबसे ऊपर होती है। हमारे अजेंडे में वो सबसे ऊपर नहीं थी, क्यूंकि उन्हें छोड़कर अजेंडे में कोई था ही नहीं। थोड़ी मस्ती हुई, घूमकर सब वापस आये। दिल शांत हो चुका था। दिमाग ने एक बार फिर दिल के ऊपर जीत हासिल की थी। मन मान चुका था कि कई बार सब कुछ करने के बाद भी मौत को टालना अपने हाथ में नहीं होता। मौत सबसे ऊपर है, सबसे ताक़तवर। ये एक जीवन-चक्र है, हमारी ज़िन्दगी का। रोज़ नए पेशेंट आयेंगे। मीठी-मीठी बाते होंगी, इलाज़ होगा। कई ठीक हो जायेंगे, कई मौत के साथ अपनी जंग हार जायेंगे। कुछ को मौत जंग लड़ने का मौका भी नहीं देगी, यूँही साथ लेकर चली जाएगी। जैसे उसे ले गयी थी, बेड नंबर 61 को।


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आज वार्ड से लौटकर जब ये ब्लॉग लिखने बैठा हूँ तो सोच रहा हूँ, मौत कितनी कमीनी होती है। कभी भी किसी को भी अपने साथ उठाकर ले जाती है, और हम कुछ कर नहीं पाते। थोडा उदास होते हैं, कभी कभी थोड़ी बेचैनी भी होती है, मगर कितनी देर। इस पेशे में हूँ तो शायद ज्यादा देर उदास होने या बेचैन होने की इजाज़त भी नहीं है। मगर क्या इस पेशे का नाम लेकर इंसानियत से दूर हुए अपने अहसासों को सही ठहराना खुद सही है। एक ऐसा पेशा खुद चुना है जिसमे ज़िन्दगी और मौत की ये लड़ाई हर रोज़ चलती मिलेगी और उसमे रेफरी के अपने किरदार को हमेशा निभाना पड़ेगा। युद्ध शुरू होने के पहले की अर्जुन की दुविधा कही न कही हमारे पेशे में भी घर करती मिलती ही है। फर्क सिर्फ इतना रह जाता है कि अर्जुन को खुद बाण चलाने थे और वो भी अपने भाइयों पर। हमें बाण नहीं चलाना होता। हमें जिनकी चिंता होती है वो हमारे अपने भी नहीं होते। मगर फिर भी। एक पेशेंट के लिए भगवान के बाद का दर्जा हमें दिया जाता है। जिसकी तकदीर में वो मौत लिख देता है, उसे भी हमारे पास भेजता है। शायद हमें ये याद दिलाने कि हम भगवान नहीं, उसके बाद दुसरे नंबर पर ही हैं।    

Wednesday, October 17, 2012

फिर से लिखेगा वो!!!

कमरे में वो अकेला बैठा हुआ था। न जाने कितनी देर से। बाहर धीरे धीरे अँधेरे ने घर कर लिया था और उसे इसका अंदाजा तक न लग सका। कानों में इयरफोन लगाए लैपटॉप के आगे बैठा गाने सुन रहा था, गुलाल फिल्म के। गीत के भयानक बोलों में खोया था या किसी और उलझन में, पता नहीं। बस समय का अंदाजा नहीं लग रहा था उसे। यूँही बैठा लैपटॉप खोले अपने ही ब्लॉग के पुराने पोस्ट्स पढ़ रहा था। वहीँ बिस्तर पर बगल में वो नोवेल भी रखी थी जिसे उसने लगभग 3-4 महीने पहले पढना शुरू किया था मगर चंद पन्नों के आगे कुछ भी नहीं पढ़ पाया। कुछ सोच रहा था। शायद खुद को उलाहने भी दे रहा था।

वो भी क्या समय था। लैपटॉप पर बैठा ब्लॉग खोलता और शब्द यूँही निकलने लग जाते। कभी अपनी मनःस्थिति के बारे में तो कभी आस-पास की गतिविधिओं के बारे में। कुछ भी। बस लिखता रहता था। 2 साल हो गए। ढंग से कुछ भी नहीं लिखा था उसने। ब्लॉग मर सा गया था उसका। और शायद उस मरे हुए ब्लॉग के सामने बैठा उसी के शोक में डूबा हुआ था। कई बार समय की कमी का बहाना बनाया, कई बार प्रायोरिटी लिस्ट में ब्लॉग के काफी नीचे होने का हवाला भी दिया। बहानों की कभी कोई कमी नहीं रही। बहाने कोई भी हो, परिणाम एक ही था। एक ही तो भली आदत थी उसकी, उसने उसे भी आसानी से जाने दिया था। शायद उस आदत की ही यादों में कहीं खोया हुआ था।

ज़िन्दगी चलते चलते काफी आगे निकल गयी थी। ज़िन्दगी के साथ चलता तो साथी छूट जाते थे और साथ निभाता था तो ज़िन्दगी भागती चली जाती थी। अजीब उधेड़बुन में फंसा हुआ था। न घर का न घाट का। ज़िन्दगी की जद्दोजहद ने उसे कही अलग अकेला लाकर खड़ा कर दिया था। जिसके सहारे ज़िन्दगी जीने के सपने देखे थे उसने, वो तो कहीं पीछे ही छूट गयी थी। बहुत पीछे। पीछे मुड़कर उसे पुकारता तो भी वो सुन नहीं पाती। समय ने एक ऐसी खाई खड़ी कर दी थी जिसे पाटना तो दूर, गहराई को बढ़ने से भी वो रोक नहीं पा रहा था। वही तो एक सहारा था जो उसकी हर आदत का आधार थी। जब आधार ही खो दिया था उसने तो आदतें कहाँ बचतीं।

पहले जब प्यार की बातें होती थी तो खुश रहता था। खुश रहता था तो यूँही सबकुछ अच्छा लगता था। अकेला बैठना भी तब अच्छा लगता था। कुछ करने का जी करता था। कुछ भी करता था। अक्सर लिखता था। जब तकरार होती थी, तब भी लिखता था। कभी अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए, कभी मन की भड़ास निकालने के लिए। अक्सर लिखता था। आज न प्यार होता है, न ही तकरार। न खुश ही रहता है, न दुखी ही होता है। Indifferent सा हो गया है। अपनी तरफ, अपनी ज़िन्दगी की तरफ, अपने उस सहारे की तरफ। आदतें छूट गयी हैं।

दिल ही नहीं करता कुछ भी करने का। कहीं भी मन नहीं लगता। बस अकेला बैठा रहता है कमरे में। यूँही। खिड़की के बाहर अँधेरे को गिरता देखता रहता है। उस अँधेरे को जिसने उसके अन्दर घर कर लिया है। रातें उसे अपनी अपनी सी लगने लगी हैं। शायद रात के अँधेरे में वो अपने मन के अँधेरे को देखता है। सुबह होने की कोई चाहत नहीं बची है अब उसके मन में। अँधेरे की ऐसी आदत लगी है कि शायद सूरज की रौशनी अब उसकी आँखों को चौंधियाने के अलावा कुछ भी नहीं करती। आँखें बंद हो जाती है रौशनी में या कि वो खुदबखुद कर लेता है, पता नहीं। पर जो भी हो, बंद आँखों से वो रौशनी उसके अन्दर के अन्धकार को ख़त्म नहीं कर पाती। ख़त्म नहीं कर पाती या वो उसे ख़त्म करने देना नहीं चाहता, पता नहीं। शायद उसे उस पुरानी रौशनी का ही इंतज़ार है जिसने उसकी ज़िन्दगी को रौशन रखा था। इंतज़ार है उसे उसी रौशनी का। आएगी वो एक दिन उसके पास, उसके मन के अंधेरों में और ख़त्म होगा वो अँधेरा। फिर से रौशन होगी उसकी ज़िन्दगी, फिर से खुश होगा वो प्यार की बातों से। फिर से दुखी होगा तकरारों से। फिर से ज़िन्दगी जीना शुरू करेगा वो। फिर से लिखेगा वो!!!


Tuesday, February 21, 2012

काश.........काश.......काश!

शाम के 5 बज चुके थे........वो बेचैन सा हो रहा था.......लैब में बैठे बैठे कोई काम न था.........बस मैडम के जाने का इंतज़ार.....मन ही मन गालियाँ दे रहा था......कब जाएगी ये खूसट और कब निकलूंगा मैं बाहर. बाहर जाने की यूँ कोई हड़बड़ी नहीं रहती थी, पर उस दिन बेचैन था. वो जो आई हुई थी. बाहर लाइब्ररी में बैठ कर इंतज़ार कर रही थी उसका......पिछले आधे घंटे से........जुगत में बैठा था कि कब मैडम निकले और वो जाकर उससे मिले................सुबह सुबह फ़ोन पर झगडा जो हुआ था. ऐसे ही किसी बात पर कहा-सुनी हो जाना आम बात हो चुकी थी.........सुबह में झगडा और शाम में फिर मिल कर बात सलटा लेना अमूमन रोज़ की बात. उस रोज़ भी वो मुलाक़ात वैसी ही होने वाली थी और यही उसकी बेचैनी का कारण भी......
मैडम के कमरे में कुछ सुगबुगाहट शुरू हुई........मन को थोड़ी तसल्ली हुई कि अब बस थोड़े देर की ही बात है........वो खुश था. उसने मिस कॉल मार दिया..........5 -10 मिनटों में मैडम भी चली गयी. दौड़ता हुआ वो बाहर निकला. लाइब्ररी की तरफ जैसे ही कदम बढ़ाये, उस ओर से वो आती हुई दिखी.....
खुले हुए लहराते बाल, कुर्ते-जींस पहने हुए, होठों पर मुस्कान लिए वो उस ओर आ रही थी............उसने नोटिस किया, उसने बाल कटवाए थे. पूरे छोटे नहीं, किनारों से. उसे लम्बे बाल पसंद थे. उसका बाल कटवाना उसे अच्छा नहीं लगता था. न बाल खुले रखना. वो चाहता था कि हमेशा उसके बाल लम्बे ही रहे. उसे उसका जींस पहनना भी पसंद नहीं था. कई बार जाहिर भी कर चुका था ये बात...........यूँ बाल कटवा कर इस तरह से जींस में उसका आना उसे गंवारा नहीं गुजरा..........वो समझ नहीं पा रहा था कि सब कुछ जानते हुए भी क्यूँ वो आज सुलह करने इस तरह से आई थी........उसे कुछ समझ नहीं आया. वक़्त की नज़ाक़त और उसकी मुस्कान को देखकर उसने चुप रहना ही मुनासिब समझा..........कई बार ख़ामोशी एक ऐसी जरुरत बन जाती है जिसके सामने कोई शब्द मायने नहीं रखते........ये ऐसा ही समय था........वक़्त के ऊपर सब कुछ छोड़ते हुए वो भी मुस्कुराता हुआ आगे बढ़ा.......
"काफी देर इंतज़ार करना पड़ा."
"नहीं लाइब्ररी में पढाई कर रही थी, इसलिए समय का पता नहीं चला."
"चाय पीना है?" 
"चलो."
न जाने कितनी दफे चाय इस तरह बातचीत के बीच समय काटने के लिए एक मजबूत हथियार बनेगा, वो सोच रहा था.........
"तुमने तो नोटिस भी नहीं किया, मैंने बाल कटवाए हैं."
"ह्म्म्मम्म.........मैंने किया..........कुछ बोलने को नहीं है उसपर इसलिए बोला नहीं.......यू नो, आई डोंट लाइक इट मच!"
"अरे, शौख से नहीं कटवाया है बाबा........बाल फूटने लगे थे नीचे.........नहीं कटवाती तो ये कभी नहीं बढ़ते."
"हम्म्म्म........मगर अचानक?........सुबह तो कुछ नहीं बताया."
"सुबह तुम्हारा मूड कहाँ था बात करने का..........कुछ बोलो तो उल्टा जवाब.........क्या बताती.........वैसे भी अचानक ही प्रोग्राम बना.........सब जा रहे थे तो मैं भी चली गयी..........जावेद हबीब में कटवाया है......99 रुपये में."
"गधा जनम छुड़ा ही लिया आखिर........हेयर डिजाइनर से कटवा कर.....अच्छा है.........बट, यू नो, आई स्टील डोंट लाइक ईट."
एक चाय, एक काफी और 2 मफिन लेकर वो काफी शॉप पर ही बैठ गए थे.......... बातों बातों में उसने बताया की बाल काटने वाले, उस पार्लर में, लड़के थे...........काफी की सिप मुंह की मुंह में और कप की कप में ही रह गयी. बात बर्दाश्त से बाहर हो चुकी थी. जींस पहनना, बाल खुले रखना, उन्हें कटवाना ये सब वो बर्दाश्त कर चुका था. लड़कों से बाल कटवाना उसे बर्दाश्त न हुआ..........जिन बालों में खुद ऊँगली फिराने की उसकी चाहत थी उन बालों को अभी थोरी देर पहले कोई लड़का घंटे भर संवार रहा था, इस सोच ने उसे अन्दर तक गुस्से से भर दिया. उसने उससे पूछना चाहा कि क्या उसे ऐसी सोच से कोई दिक्कत नहीं. बहुत कोशिश की अपने गुस्से को काबू में रखने की पर वो रख न सका. अंत में पूछ ही लिया उसने..........और जिस बात का डर था, वही हुआ...........जब जवाब नहीं के रूप में आया तो फिर उसके पास बोलने को कुछ नहीं बचा था. कुछ और बात करने को उसका दिल नहीं हो रहा था..........
सुबह के झगडे को सुलझाने वाली मुलाक़ात, खुद एक झगडे का सबब बन कर रह जाएगी, वो नहीं जानता था.........बड़ी कोशिश की उसने खुद को समझाने की कि ऐसा होता है आज के युग में. वो कल की बात थी जब लड़कियां लड़कों के सलून में नहीं जाती थी और लड़के लड़कियों के. आज दोनों के लिए एक ही पार्लर होते हैं.............लाख कोशिशों के बावजूद भी वो खुद को समझा न सका..........खुद पर धिक्कार करने की भी कोशिश की कि छोटे शहर की छोटी सोच के साथ ही जियेगा, मगर जितना धिक्कार करता उतना ही उस सोच पर उसे गुमान होता..........आखिर मध्यम-वर्गीय परिवार से आने का उसे गर्व जो था. वो चुप नहीं रहा............बाते हुई, झगडे बढे.........भावनाओं को ठेस पहुची........दोनों तरफ..........जो मुलाक़ात सुबह के झगडे को ठीक करने के लिए शुरू हुई थी वो खुद एक ऐसे झगडे का रूप ले चुकी थी जिसका अंत उसके उठ कर वापस अपने घर चले जाने से हुआ. जींस पहनने पर तो कोई बात भी नहीं हो सकी. वो खफा थी. उसकी छोटी सोच से.......उसके मध्यम-वर्गीय ढकोसलों से..........उसकी बातों से...........अपने ऊपर उसके विश्वास की कमी से..........


कुछ दिन बाद:
वो पहले से तय प्रोग्राम के मुताबिक़ शहर छोड़कर अपने घर वापस जा चुकी थी.........इसे यही रहना था..........इसी शहर में, इसी लैब में.........वो इसी कैम्पस में था...........रोज़ लैब जाता था........सुबह फ़ोन पर थोड़ी बात होती थी........झगडा सुलझ चुका था.......रोज़ 5 बजते थे........बेचैनी रोज़ होती थी........मिलने की नहीं, इस बात की कि आज बाहर कोई मिलने वाला नहीं होगा..........रात को लाइब्ररी में अकेले अपने लैपटॉप और किताबों के साथ घंटों बैठता था...........बाहर निकलेगा तो फ़ोन पर कोई बात करने वाला न होगा, इस सोच से डर जाता था..........बाहर निकलता था तो हर ज़र्रा उसे उसकी याद दिलाता था........उस पेड़ के नीचे बैठ कर कभी प्यार की तो कभी तकरार की बाते करते थे.......वहां वो फिसल कर गिर रही थी तो उसने हाथ थाम कर उसे रोका था..........उस कैंटीन में बैठ कर शाम का नाश्ता करते थे..........बाते करते हुए इसी रास्ते से रात के 2-3 बजे लाइब्ररी से निकल कर काफी पीने जाते थे.........वो काफी शॉप, जहां न जाने कितनी बाते हुई है, कितने झगडे हुए हैं, कितने झगडे सुलझे हैं........सब कुछ..........वही काफी शॉप जहां वो अंतिम झगडा भी हुआ था..........उस सोच का झगडा.........क्या वो झगडा जरुरी था, क्या वो उसे समझ नहीं सकता था या क्या उसने झगडा करके कोई गलती की थी..........क्या इसकी पसंद-नापसंद को समझने का उसका कोई फ़र्ज़ न था..........क्या उसने इसका विश्वास तोड़ा था.........न जाने कितने सवाल मन में आते हैं और चले जाते हैं........बस रह जाती है एक कचोट की काश साथ रहने के उन अंतिम कुछ दिनों में वो झगडा नहीं करता. ...........काश.........काश.......काश!



Saturday, February 04, 2012

वो चीखता है


वो हँसता था, खिलखिलाता था,
झूमता था, गाता था, गुनगुनाता था,
दोस्ती थी, प्यार था,
मस्ती थी, तकरार था.
वो जिंदा था, क्यूंकि,
वो ज़िन्दगी को जीता था.

हँसता वो आज भी है, मगर,
वो हँसी कही खो गयी.
खिलखिलाना वो भूल गया है,
झूमना, गाना, गुनगुनाना
उसकी आदत नहीं रही.
दोस्त हैं, प्यार है, मगर.
वो प्यार वो दोस्ती नहीं रही.
जिंदा वो आज भी है,
पर ज़िन्दगी जी नहीं पाता. 

अकेला, गुमसुम, चुपचाप,
जब बैठता है तो रोता है,
सब के साथ होता है तो
बस सांस लेता है, क्यूंकि, जिंदा है.
अक्सर चिल्ला उठता है, चीखता है.

एक गुस्सा है, मन में, आग है.
एक विस्फोट होने की आहट है.
ऐसा विस्फोट जिसकी गूंज
उसे खुद बहरा कर देगा,
वो जानता है.
वो समझता है,
एक ऐसा विस्फोट जो 
आस पास सब ख़त्म कर देगा,

इसलिए रोकता है, रोके रहता है.
दिल के हर कोने में
गुस्से को छुपाने की जुगत में रहता है.
तड़पता है, सब कुछ सहता है,
नाकाम कोशिश करता रहता है
और अंत में चीख उठता है,
अपने दोस्तों पर, अपने प्यार पर.

वो कहते हैं, वो बदल गया है,
वो कुछ नहीं बोलता, बस सुनता है
बैठता है, सोचता है, ढूंढता है,
खुद को देखता है तो पाता है,
वो आज खुद का अक्स न रहा,
जो पहले था, अब वो शख्स न रहा. 

   

Monday, December 13, 2010

उम्र और इंसानियत का रिश्ता, सुना था, इन्वर्सली प्रपोर्शनल होता है!!!

भगवान् भला करे उसका जो आज ड्यूटी पर आने से पहले उससे बात हुई और उसने दुआ दी कि आज कोई डेथ सर्टिफाई न करनी पड़े........पता नहीं इमरजेंसी ड्यूटी के ऐसे कितने और 8 घंटे मिलेंगे ज़िन्दगी में जिसमे एक भी मौत से पाला न पड़े.........अपनी 8 घंटे की ड्यूटी बजाकर इमरजेंसी से निकल ही रहा था कि बाहर गेट पर एक दोस्त मिल गया, एक बैचमेट...........पिछले 5 सालों में जो कुछ चीज़े कमाई हैं यहाँ कॉलेज में उनमे से एक उसकी दोस्ती भी है. अगले 8 घंटों की शिफ्ट उसकी ही थी..........हाथ में सिगरेट लिए अपने मदमस्त चाल में वो चला आ रहा था.
"एक सुट्टा मारेगा?", उसने पूछा. मैंने कुछ नहीं कहा. "मारा कर साले........कब तक सन्यासी बना रहेगा.........बड़े काम की चीज़ है साले........जो अन्दर 8 घंटे तक दिमाग की दही करके आया है न उससे बचने का सबसे सरल, सस्ता और टिकाऊ उपाय है बे."........ पिछले ५ सालों में न जाने उसने कितनी बार सिगरेट के गुण गिनाये थे........."चल कॉफ़ी पीला यार, सर दर्द कर रहा है.", हर बार की तरह मैंने डिमांड रख दी. बगल के कैंटीन में दो कॉफ़ी का आर्डर करके उसने पूछा, "क्यूँ बे साले, आज कितनों को मौत के घाट उतारा बे?"............... इंटर्नशिप शुरू होने के बाद से हर इमरजेंसी शिफ्ट के बाद आपस में बात करने को ये ही पहली टोपिक मिलती थी. साढ़े चार सालों तक बीमारियाँ और उनके इलाज़ को पढने के बाद जब सच में बीमारियों से पाला पड़ा तो पता चला कि साली सारी किताबें बकवास हैं. मौत की कोई गारंटी नहीं होती. वो अपना एप्वाईंटमेंट खुद लेकर आती है. और तुम कुछ भी कर लो, कुछ नहीं कर सकते.
"अबे यार, आज तो गज़ब हो गया, साला एक भी डेथ सर्टिफाई नहीं किया यार. भीड़ थी, पेशेंट थे, लेकिन फिर भी, पता नहीं. जानता है, आज आने के पहले एक पुरानी दोस्त से बात हुई, फोन पर. उसने दुआ दी थी कि आज मौत से पाला न पड़े. साली की दुआ लग गई लगता है.", मैंने उससे कहा............. "सच में यार, लकी मैन. अब मैं जाता हूँ, देखता हूँ भगवान् मेरे हाथों कितनो की वाट लगाता है आज. साला अजीब लगता है यार..........एक जज मौत की सजा सुनकर कलम की नीब तोड़ देता है. उस कलम से फिर कोई काम नहीं होता, और हम साले न जाने यूँही लगातार कितनो को सर्टिफाई करते रहते हैं.........यार अब तो हाथ भी नहीं धोता मैं सर्टिफाई करने के बाद." सिगरेट की अंतिम कश खीचते हुए उसने कहा.............. "ओये दो-दो रसगुल्ले भी बढ़ाना यार", कैंटीन वाले को उसने आर्डर किया.............. "कितना अजीब लगता है न यार, मौत की बातें कर रहे हैं और मन साला रसगुल्ले खाने को कर रहा है. साली इंसानियत कही घोड़े बेचकर सो गयी लगती है.", मैंने उससे कहा था. "अबे जो होता है साला अच्छे के लिए ही होता है. जब तक मौत से पाला नहीं पड़ता था तब तक मौत 'मौत' लगती थी अब तो साली यारी हो गयी है उससे. अच्छा है न कि कोई फर्क नहीं पड़ता. साला अगर लोड लेने लगते तो ज़िन्दगी यूँही सड़ जाती. छोड़ बे, अपन लोग ऐसी लाइन में आ ही गए हैं तो अब इस बात का रोना क्या. एन्जॉय कर साले." उसने मेरा ढांढस बढाया था. अपने मन को शांत करने के लिए आदमी कई बहाने ढूँढ लेता है, उसने भी यही किया था.
कॉफ़ी की चुस्कियां ख़त्म हो चुकी थी. मेरे चेहरे पर पिछले 8 घंटों की थकान और उसके चेहरे पर आने वाले 8 घंटों की चिंता साफ़ दिख रही थी.............. ऊपर से तो हर कोई मजबूत दिखना चाहता है कि उसे मौत से कोई फर्क नहीं पड़ता पर अन्दर से सब विचलित होते हैं............ वो भी ऐसा ही था. मन में उसके भी यही चल रहा था. "जा ड्यूटी कर, किस्मत अच्छी रही तो तुझे भी एक भी सर्टिफाई नहीं करना पड़ेगा." मैंने उसे हिम्मत दी थी. "साले खुद एक लौंडिया की दुआ से बच गया तो बड़ा फ़कीर बन रहा है!" यूँही डपट कर हंस देना उसकी पुरानी आदत थी. उस समय भी उसके चेहरे पर हंसी दिख रही थी. अंतिम रसगुल्ले को मुंह में रखते हुए मैंने उससे कहा, "चल अब घर चलता हूँ भाई. जाकर सबसे पहले उसे ही फोन करके शुक्रिया करूँगा. जा तू भी, सर खोज रहे होंगे." "साला वो टकलू क्या खोजेगा मुझे. साला खुद तो कुछ आता नहीं बस बैठा हुआ आर्डर चलता रहता है.", बोलते हुए वो मेरे साथ कैंटीन से बाहर निकल गया.
बाहर थोड़ी अफरा-तफरी मची हुई थी.............कोई रोड एक्सीडेंट में बुरी तरह घायल लड़की को कुछ लोग इमरजेंसी के अन्दर ले जा रहे थे..............मैंने उससे कहा, "जा साले, कर जाकर सर्टिफाई.".........."लगता है आज फिर शुरुआत मौत से ही होने वाली है भाई." मुस्कराकर उसने कहा था.........वो अन्दर चला गया और मैं अपनी गाडी में बैठकर घर की ओर बढ़ गया. थोरी ही दूर पर मोबाइल बज उठा. एक दोस्त का फ़ोन था. फ़ौरन ब्रेक लगाकर यु-टार्न लिया और फिर इमरजेंसी पहुच गया. जिस दोस्त की दुआओं ने दिन भर मौत के साए से दूर रखा वही दोस्त वहाँ अपनी आखरी साँसे गिन रही थी. एक्सीडेंट हुआ था. होश में थी.................'और कोई डेथ सर्टिफाई किया या नहीं, नहीं मालूम पर मेरा तुम ही करना.'..............उसके अंतिम शब्द थे!

दम तोड़ती उन आँखों ने अंतिम गुजारिश की थी.
डाक्टरी के लबादे ने दिल तक पहुचने ही न दिया.


उम्र और इंसानियत का रिश्ता, सुना था, इन्वर्सली प्रपोर्शनल होता है!!! 


 

Wednesday, December 01, 2010

यूँही फुर्सत में: कुछ ख्याल!

चंद रोज़ बेगारी के,
कुछ पल कामचोरी के,


कई सफहों को कलम फिर गंदा कर गयी!

वो जब कुछ नहीं करता तो कितना कुछ कर देता है या कितना कुछ कर देने की शक्ति रखता है. कमरे में अकेले किताबों के बीच बैठा हुआ. बड़ी मुश्किल से ध्यान वहीँ बगल में रखे अपने लैपटॉप पर से हटा पाता है. किताबों की पतली-मोटी अक्षरें उसका ध्यान अपनी तरफ खींच पाने में अक्सर असफल हो जाती हैं. कमरे के बाहर सड़क पर से गुजरती हुई वो 'उमर बिजली मलहम' की प्रचार गाड़ी उन अक्षरों को हमेशा मात दे देती हैं. कमरे के बाहर का कुछ भी उसे कितना भाता है. उसका मन हमेशा यूँही कुछ ख्यालों में खोया रहता है. बेतरतीब से कई ख्याल, कुछ ढंग के, बाकी सारे बेढंगे, बिना सर पैर के. ख्यालों की कोई निश्चित दिशा नहीं होती, इसका प्रमाण वो हर रोज़ अपनी ज़िन्दगी में देखता है. घर के बाहर काम कर रहे मजदूर के चेहरे पर के झुर्रियों से जो उड़ान ख्याल भरते हैं उनकी लैंडिंग न जाने कहाँ कहाँ हो जाती है. एयर ट्रैफिक कंट्रोल वालों को कितनी मुश्किल होती होगी. कभी आगे से, कभी पीछे से, कभी ऊपर से, कभी नीचे से, अचानक, ख्यालों का एक्सीडेंट न जाने कितनी बार हवाई जहाज़ों से होता होगा.
न जाने कितने ख्याल कुछ मिनटों में उसका मन बुन लेता है. कुछ ख्याल ऐसी सवालों के शक्ल में आते हैं जिनका जवाब कोई नहीं दे सकता. 'मनमोहन देसाई न होते तो "खोया-पाया" फिल्मों का वजूद क्या होता?'.......'अमिताभ बच्चन की ऊंचाई थोड़ी कम होती तो ड्रीम हसबैंड की ऊंचाई का मानक कौन होता?'.......'माधुरी दीक्षित की चोली के पीछे इतनी हलचल क्यूँ रहती थी?'.........'विनोद मेहरा के शर्ट के ऊपर के चार बटन नदारद क्यूँ होते थे?'.........'हेलेन आंटी का पीठ हमेशा खुला ही क्यूँ होता था'.......'हंगल साहब अपने बेटे की अर्थी उठाते उठाते खुद कभी क्यूँ नहीं मरे?'........'सचिन तेंदुलकर बैटिंग के पहले टाँगे क्यूँ फैलाता है?'........'सिद्धू के मुहावरों की गंगोत्री हिमालय के किस भाग से निकलती है?'.........ऐसे ही कई सौ सवाल है..........जवाब न मिलता है, न मिलने की ख्वाहिश होती है. बस एक ख्वाहिश रहती है ऐसे सवालों के हमेशा जिंदा रहने की. शायद मन को घूमने का इक आयाम देती हैं ये. उनकी उड़ान के लिए पंखों का सहारा बनती हैं ये. शायद इसीलिए जवाब ढूंढता भी नहीं वो. कहीं जवाब मिल गए तो मन की उड़ान बंद न हो जाये.....
कई ख्याल ऐसे भी होते हैं जो उसे कुछ सोचने को मजबूर करती है. कई दिन की चिलचिलाती धूप के बाद वो कुछ घंटों के लिए बादलों का घुमड़ना.......हवा के झोकों में किसी लड़की का दुपट्टा फिर से उड़ना.........दिन भर काम करते उस मजदूर का झुर्रियों भरा चेहरा.........अस्पताल में इमरजेंसी में एक गरीब की अपनी किस्मत से हार........उस दिन टेलीफोन पर प्रेमिका से झगडा........न जाने और क्या क्या........रेखा के मन को बहकने के लिए बेली के महकने की दरकार होती थी, उसके मन के लिए ऐसी कोई जरुरत नहीं. बहकना उसके मन का शौक है, मजबूरी नहीं. बिना किसी सीमा के किसी भी गली में कभी भी घुस जाता है उसका मन. मंजिल तक पहुचने की कोई लालसा नहीं, बस राह चलते रहने की अभिलाषा होती है.
कुछ ऐसे ही बेगारी भरे दिन बीते पिछले कुछ दिन. कई ख्याल मन में उमड़ते रहे. कुछ नाकाम रह गए तो कुछ ने शब्दों की शक्ल ले ली. ऐसे ही कुछ ख्याल यहाँ पेश करने के कोशिश कर रहा हूँ. उम्मीद है पसंद आयेंगे!
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उस रोज़ सूरज ने आँखें मूंदी थी
या बादल के साए में छुप गया था.

चाँद दो पल के लिए ही सही, मुस्करा रहा था!
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ज़ालिम हवा के वो झोंके
उड़ता हुआ वो तुम्हारा दुपट्टा

उफ़! खुली आँखों के ये सपने बड़े जालिम होते हैं!
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चाँद आया था धरती और सूरज के बीच
तारे भी उस रोज़ मुस्करा रहे थे.

बीच दोपहर में भी रात आती है कभी!
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वो झुर्रियों भरा चेहरा आज भी ईंट ढो रहा था.
आसमान में आज बादल छा गए थे

आख़िरकार आज सूरज ने भी हार मान ही ली!
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वक़्त की बेवफाई कहूं
या शुबहे की दगाबाजी थी.

जागे हुए बड़ी लम्बी गुजरी थी वो रात!
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ज़िन्दगी और मौत की जद्दोजहद में
गाँधी के चंद हरे-लाल चेहरों ने फिर बाजी मार ली

ये बीमारियाँ गरीबों का पेटेंट ही क्यूँ नहीं करा लेती?
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Friday, November 26, 2010

फिर यादें होती हैं, उदासी नहीं होती!


कमरे के कोने में बैठा
शायद घंटों बीत गए थे,
एक और शाम यूँही ढल गयी थी
शायद बाहर अँधेरा हो आया था.

कोई फर्क नहीं पड़ता,
बाहर के अँधेरे से,
अब डर नहीं लगता.
आदत सी हो गयी है.
आखिर मन में अँधेरा ही तो है.

मन में अँधेरा?
सचमुच?
नहीं, अँधेरे की आदत नहीं लगी
बस अब महसूस नहीं होता,
यादों के उजाले में, अब,
अँधेरा पता ही नहीं चलता.

एक अकेलापन है.
है क्या?
कमरे के कोने में
अकेला ही तो बैठा हूँ.
सच क्या?
नहीं, यादों के भवर में
कई लोग हैं,
साथ घूम रहे हैं,
यूँही झूम रहे हैं.

साथ वो भी बैठी थी शायद,
बगल में तो नहीं थी,
हाँ, ख्यालों के एक कोने में होगी,
वही तो होती है हमेशा.
कुछ बोलती है
मेरी यादों के बारे में,
कुछ पूछती है,
इन ख्यालों के बारे में.

वो बोलती है,
यादों की उड़ान
न जाने कहा ले जाती है,
टूटे हुए तारों को अचानक
फिर जोड़े जाती है.
तार जुड़ने की खुशियाँ कम,
टूटे होने की पीड़ा अधिक दे जाती है,
तनहा तो नहीं छोड़ती,
पर दुखी छोड़े जाती है.

वो पूछती है,
क्यूँ उदास होते हो पुरानी बातों में,
क्यूँ डूबे रहते हो उन यादों में?
जो खुशियाँ नहीं देती
क्या फायदा उन यादों का,
मन उदास हो जिनसे
क्यूँ बात करना उन ख्यालों का?

मैं कहता हूँ,
यादों से दूर न करो,
उन ख्यालों से दूर न करो.
आज हमेशा आज नहीं होता,
हर कोई हमेशा पास नहीं होता.
दोस्त रहते हैं मगर दोस्ती नहीं रहती,
दिल होता है मगर दिल्लगी नहीं होती.
हाँ, सच ही तो कहते हैं लोग,
ज़िन्दगी हर वक़्त एक जैसी नहीं होती.

लोग मिलते हैं मगर,
बातों की फुर्सत नहीं होती,
बस पुरानी डायरी के कुछ पन्ने होते हैं,
फिर यादें होती हैं, उदासी नहीं होती!

 

Wednesday, November 24, 2010

नीतीश कुमार की जीत: वक़्त ख़ुशी मनाने का या आगे देखने का?

बिहारी चुनाव समर आज आखिरकार अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँच गया. वोटों की गिनती और परिणाम घोषित होने के साथ पूर्ण बहुमत की सरकार बनने का रास्ता साफ़ हो गया. नीतीश कुमार नीत जदयू-भाजपा गठबंधन की सरकार के शपथ लेते ही एक महीने से चल रही इस पूरी लीला का पटाक्षेप हो जायेगा. आज घोषित हुए ये परिणाम अपने आप में अद्भुत ही नहीं अद्वितीय मालूम पड़ते हैं. नीतीश कुमार के पिछले 5 सालों के विकास-राज ने आज लालू यादव के गुंडा-राज को अंततः दफ़न कर दिया. बिहार की राजनीति में ऐसा पहले कभी न हुआ होगा जब जात-पात को छोड़कर इस तरह की वोटिंग हुई हो और ऐसा जनादेश मिला हो.
'70 के दशक में इंदिरा गाँधी के तथाकथित तानाशाह और उसके बाद इमरजेंसी के विरोध में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में एक बयार बिहार समेत पूरे देश में चली थी जिसका नतीजा केंद्र में पहली दफा गैर-कांग्रेसी सरकार के रूप में आया था. हालांकि जेपी आन्दोलन अपने आप को देश भर में दीर्घकालिक नहीं बना सका था मगर बिहार की राजनीति में इसका प्रभाव लम्बे समय तक आने वाला था. इसी छात्र आन्दोलन की देन बिहार को लालू यादव और नीतीश कुमार के रूप में मिली जो इस विधानसभा चुनाव में एक दूसरे के खिलाफ खड़े थे. ये चुनाव सिर्फ दो पार्टियों की लड़ाई नहीं थी मगर छात्र आन्दोलन के दो धुरी रहे इन दो नेताओं की साख की लड़ाई थी. एक ही विचारधारा से जुड़े राजनीति में कदम रखने वाले इन दो नेताओं की राहें आज इतनी जुदा हो चुकी हैं जिसका अनुमान आज के चुनाव परिणाम से ही लगाया जा सकता है.
'90 के दशक में कांग्रेस को हराकर सत्ता पर काबिज होने वाले लालू यादव ने एक भूल कर दी थी. जिस तानाशाही का विरोध करके उन्होंने राजनीति में अपनी पहचान बनायीं थी, वो खुद उसी तानाशाही की तरफ बढ़ने लगे थे. 'जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेगा बिहार में लालू' का नारा तक देने में उन्हें उस जनता की याद नहीं आई थी जिसने उन्हें सर आखों पर बिठाया था. बिहार को अपनी बपौती और बिहारियों को अपनी प्रजा समझने की भूल उन्हें 2005 में अपना राज खोकर चुकानी पड़ी. 15 साल से रुके हुए बिहार की इंजन को दुरुस्त करके उसे पटरी पर लाने का एक असाधारण काम नीतीश कुमार ने अपने 5 सालों में कर दिखाया. जिस विकास की बयार नितीश कुमार ने बिहार में इन पांच सालों में बहाई उसका नतीजा आज एक स्पष्ट जनादेश के रूप में उन्हें मिला है.
हर ओर बिहार में आज ख़ुशी का माहौल है. दो तिहाई बहुमत की बात तो छोड़ ही दी जाए, यहाँ तो नौ-दहाई के आसपास का बहुमत एनडीए गठबंधन को मिल चुका है. एक असाधारण फैसला ही लगता है. बिहारी जनता की बात करें तो हर कोई इस विकास की गाड़ी को आगे चलते देखना चाहता था मगर मन में कही न कही इसके ठोकर खाकर रुक जाने का डर सताया हुआ था. आज का ये फैसला उनके डर को सिर्फ समाप्त ही नहीं करता मगर एक नए बिहार के निर्माण के सपने का बीज भी बो रहा है. बिहारी जनता खुश है विकास की इस जीत को देखकर.
ऐसे स्पष्ट जनादेश का मतलब बहुत साफ़ है. नीतीश कुमार के किये गए कामों को हर जगह से स्वीकृति मिली है. मगर सवाल ये है कि कही ऐसा जनादेश देखकर खुद नीतीश बाबु ही अपने आप को न संभाल पाए. कई बार उम्मीद से अधिक मिल जाने पर मन बावला हो उठता है. अगर ऐसा ही कुछ हो गया तो शायद बिहार के लिए इससे बुरी बात और कुछ नहीं रह जाएगी. जिस गफलत का शिकार लालू हो गए थे अगर उसी ने नीतीश को घेर लिया तो अनुमानों से परे नुकसान बिहार को उठाना पड़ सकता है. ऐसा भी हो सकता है कि नीतीश ऐसे जनादेश को देखकर कुछ सुस्ताने की सोच बैठे. जनता का समर्थन अपने ओर देखकर अगर वे निश्चिंत हो गए तो शायद फिर कभी कोई बिहारी निश्चिंत नहीं हो पायेगा. ऐसे में इस जीत पर ख़ुशी मनाकर शायद हम एक भूल कर रहे हैं, समय-पूर्व ख़ुशी मनाने की. ये समय ख़ुशी मनाने का नहीं, आलोचनाओं का है. नीतीश की पिछले 5 सालों में नाकामियों को गिनाने का है और आगे की जरूरतों पर रौशनी डालने का है. समय है नीतीश कुमार को जगाये रखने का, अपनी तरक्की की और विकास की ओर ध्यान लगाये रखने का.

 

Monday, November 22, 2010

कल्पनाओं से परे एक परिवार की उड़ान!


तीन कमरे का एक छोटा सा मकान. छोटे-छोटे कमरे, सब मिलकर एक कमरे के बराबर. 5 लोगों का परिवार. 1-2 की संख्या में अतिथि हमेशा मौजूद. एस्बेस्टस की छत. ऊंचाई इतनी कि एक पंखा भी न टाँगा जा सके. जेठ की झुलसती गर्मी में बदहवास होते बच्चों पर तरस खाकर मकान-मालिक ने एक पुराना-खटारा टेबल पंखा दे दिया. गर्मी से निजात तो मिली मगर आँखों की नींद पंखे की घर्र-घर्र ने छीन ली. छोटा बेटा सिर्फ 3 महीने का था, बड़ा वाला 7 साल का, बीच में एक बेटी, 5 साल की. बड़ा बेटा रात को बाहर ही सोता था, खुली आसमान के नीचे. मजबूरी भले थी, मगर, उसे शायद अच्छा लगता था. सपनों की उड़ान को रोकने वाला कोई नहीं होता था. सीधे चाँद और तारों से बातें होती थी.
सुबह उठकर नहाने की दिक्कत. एक गुसलखाना तक न था. बच्चे पापा के साथ घर के बाहर लगे नलके के नीचे बैठकर ही नहा लिया करते थे. माँ जैसे तैसे घर के अन्दर ही नहाती थी. गर्मी ऐसे ही अन्दर बाहर करते बीत जाती थी. सुकून मिलता था, शायद अब आराम मिले. बरसात की फुहारों से शायद कुछ राहत मिले. बरसात आपने साथ राहत जरूर लाती थी, मगर दिक्कतें यही ख़त्म नहीं होती. एस्बेस्टस की छत थी, कुछ छेद तो होने ही थे. बरसात शुरू तो पता ही नहीं चलता था कि घर के अन्दर हैं या बाहर. जगह-जगह से पानी की बूंदें गिरती थी. कमरे भले तीन थे मगर बिस्तर सिर्फ एक ही हुआ करता था. सूरज गोले बरसाए या छत पर से बूँदें टपके, सब को सोना वही पड़ता था. कभी साबुन से छेदों को सील करके तो कभी कटोरियाँ टांग के. अब तो छोटा बेटा भी 3 साल का हो गया था. बल्ला-बॉल खरीदने के लायक पापा की आर्थिक क्षमता नहीं थी. ऐसे में बच्चे कभी शिकायत नहीं करते थे. कटोरियाँ टांगने की मजबूरी को ही अपना खेल समझते थे और छेदों को सील करने वाले साबुन को अपना खिलौना. दुःख कहाँ दिखता था चेहरे पर. कोई शिकन भी नहीं.
एक बड़े से अहाते के एक कोने में बने इस छोटे से घर की दिक्कतें किसी मौसम में ख़त्म नहीं होती. जंगल-झाड के बीच बने इस घर में बरसात के बाद सापों का प्रकोप दिखता था. बच्चों को तो सांप से भी डर नहीं लगता था. सांप देखते ही बेटी अपने पापा को लाठी जाकर दे देती थी. न जाने कितने साँपों के सर का कचूमर निकलते देखा था उन नन्हे आँखों ने. डर क्यूँ आएगा. पढने के टेबल पर किताबों के बीच में सांप भी बैठते थे. एक याराना सा लगता था शायद. जाड़े के मौसम में डाक्टर पापा की MBBS डिग्री का सही मतलब समझ आता था. एक ही बिस्तर पर एक ही रजाई के नीचे मियाँ-बीवी-बच्चों-समेत. जगह कम होने की कोई शिकायत नहीं होती थी.
स्थिति कुछ सुधरी तो खेलने के कुछ सामन आने लगे. साल में एक. एक बार बल्ला आया, एक बार कैरम बोर्ड, एक बार व्यापारी. 'साल में एक' की शर्त का नतीजा था शायद जो बच्चों ने अपनी ज़िन्दगी में चीजों को सहेज कर रखने का गुण सीखा.    कभी एक से ज्यादा की मांग नहीं कि, जरुरत ही नहीं महसूस होती थी. जब जो माँगा गया, माँ-पापा ने सब कुछ पूरा किया, शायद इसलिए कोई लालसा नहीं रहती थी. बिना मांगे ही उन्होंने इतना कुछ दिया कि कभी कोई कमी महसूस नहीं होती थी. क्या नहीं था उन बच्चों के पास. पड़ोस के बच्चों जैसे रिमोट पर चलने वाले कार नहीं थे तो क्या हुआ, पापा ने रस्सी खीचने वाली गाडी खुद बना दी थी. गाडी में बैठ कर घूमने का मजा वो नहीं जानते थे, स्कूटर पर माँ-पापा के साथ बैठकर घूमने के सामने उनके लिए कुछ भी नहीं था. बेटी आगे खड़ी होती थी, बड़ा बेटा बीच में बैठता था और छोटा माँ की गोद में. बेटी बड़ी होने के बाद भी वहीँ खड़ी होती थी, गर्दन दर्द हो जाये इस तरह से अपने सर को झुकाए. कभी जो उसने एक बार भी चूं तक की हो. दर्द क्या होता था बच्चे जानते ही नहीं थे.
बड़ा बेटा अब 17 साल का हो गया था, बेटी 15 की और छोटा बेटा 10 साल का. पापा की आमदनी और बचत से अब अपना एक घर बन गया था. छोटा सा प्यारा सा एक घर. खिडकियों में पल्ले लगाने के पैसे नहीं थे फिर भी, सब लोग इस घर में आ गए. समय के साथ खिडकियों में पल्ले भी लग गए और एक तल्ला छोटा मकान कुछ सालों में 3 तल्ले से भी ऊपर हो गया. बड़ा बेटा इंजीनियर बन गया. अपनी कमाई से एक बड़े शहर में अपना एक फ्लैट खरीद लिया उसने. बेटी डाक्टर बन गयी. अपना घर उसने भी बसा लिया. छोटा बेटा भी अब डाक्टर बन चुका है. अपने उसी तीन तल्ले घर में रहता है. दो तल्ले खुद के पास रखे गए हैं. 3 छोटे-छोटे कमरों से शुरू हुई वो यात्रा आज 6 बड़े कमरों, 2 हॉल, 2 रसोई और 6 गुसलखाने तक पहुच गयी है. जब आदमी थे तब जगह नहीं था, आज जगह है आदमी नहीं. नए फ़ोन में पल-पल डायलटोन खोजने वाला छोटा बेटा आज दिन भर लैपटॉप लेकर ऑनलाइन रहता है. एक स्कूटर पर घूमने वाले पूरे परिवार के पास आज 4 चारपहिये और 4 दुपहिये हैं.
सब कुछ कितना बदल गया. कुछ नहीं बदला तो वो है माँ-पापा के चेहरे की वो ख़ुशी. वो तब भी थी, वो आज भी है. दुःख क्या होता है बच्चे आज भी नहीं जानते, या यूँ कहे कि जानना ही नहीं चाहते. कोई शिकायत आज भी नहीं होती. कोई मांग तब भी नहीं थी आज भी नहीं है, पापा बस वैसे ही बच्चों की झोलियाँ भरते रहते हैं. उनकी मेहनत ने उनके सपनों के साथ मिलकर क्या गुल खिलाया है उसपर विश्वास उन्हें आज भी नहीं होता. 20 साल पहले का वो घर कबूतरखाना ही तो लगता है आज. मगर क्या उनसब के लिए वो आशियाने से कम था. न जाने क्या क्या सपने देखे थे उस परिवार ने उस एस्बेस्टस की छत के नीचे. पता नहीं ऐसे भविष्य की कल्पना भी कभी की थी या नहीं.
20 तारीख को हमारे घर के गृह-प्रवेश के 14 साल पूरे हो गए. गाहे-बगाहे यूँही वो लम्हा याद आ गया जब पहली बार इस घर में कदम रखा था. उन लम्हों के साथ वो सबकुछ याद आ गया जो उसके पहले हमारे परिवार ने एक साथ बांटा था. बस वही सबकुछ यहाँ लिख दिया है. अभी बैठकर जब सबकुछ सोचता हूँ तो कुछ नहीं सूझता. बस मालूम होता है कि ये कुछ नहीं, एक मामूली परिवार की कल्पनाओं से परे एक उड़ान ही तो है, और क्या!