Thursday, March 25, 2010

कब तक आएँगी ऐसी टिप्पणियाँ?

हिंदी में ब्लॉग लिखने एवं पढने की शुरुआत इसी साल की शुरुआत से हुई है। कभी किसी का ब्लॉग पढता हूँ तो उस पर आई हुई टिप्पणियों को भी पढता हूँ। अपने पोस्ट पर भी यदा-कदा एकाध टिप्पणी आ जाती है। हिंदी ब्लॉग-जगत में अंग्रेजी ब्लॉग के मुकाबले एक अंतर पाया। हिंदी ब्लॉग की ज्यादातर टिप्पणियाँ पोस्ट के मुद्दे और उसके विषय से परे उसकी लिखावट पर जोर देती हुई लगती हैं। कोई 'सुन्दर आलेख' लिख देता है तो कोई 'nice' या 'अच्छा' लिखकर काम चला देता है। ये तो कुछ छोटे-छोटे उदाहरण थे। हिंदी ब्लॉग लिखने एवं पढने वालों ने इसे बखूबी अनुभव किया होगा। मेरा बस एक छोटा सा सवाल है कि क्या हम ब्लॉग सिर्फ इसलिए लिखते हैं कि कोई हमें हमारी लेखनी के लिए तारीफ़ करके निकल ले?
बचपन में स्कूल में हिंदी की क्लास में गुरूजी किसी विषय पर लेख लिखने को बोलते थे और जब उस लेख को पूरा करके उनके पास हम मूल्यांकन के लिए जाते थे तो कुछ इसी तरह वो भी हमारे लेख को 'सुन्दर', 'अच्छा' या 'बहुत अच्छा' इत्यादि विशेषणों से सुसज्जित कर दिया करते थे। यहाँ जब ब्लॉग लिखना शुरू किया और उसपर आने वाली टिप्पणियों का आकलन किया तो कुछ वैसा ही महसूस हुआ कि जैसे गुरूजी ने फिर से हमारा मूल्यांकन करना शुरू कर दिया है।
औरों के बारे में तो नहीं जानता मगर जहां तक मेरा सवाल है तो मैं ब्लॉग लिखता हूँ किसी विषय या किसी मुद्दे पर अपने विचारों को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने के लिए। ये विचार अच्छे सुन्दर तरीके से रखे जाएँ इसकी कोशिश भी करता हूँ। मगर इसलिए नहीं कि इस सुन्दर तरीके को लोग पसंद करें लेकिन इसलिए कि जो लिखता हूँ वो सामने वाले तक आसानी से पहुँच सके। सुन्दर लेखनी का प्रयोग, मेरे हिसाब से, सिर्फ अपने विचार को व्यापक बनाने के लिए होना चाहिए।
टिप्पणियों के बारे में कुछ बातें हो रही हैं तो सबसे पहले समझने की जरुरत है कि आखिर आवश्यकता क्या है इन टिप्पणियों की। २-३ बातें हो सकती हैं। एक तो टिप्पणी से पता चलता है कि हाँ भाई मैंने आपका ब्लॉग पढ़ा, मगर ये एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता नहीं हो सकती। वैसे भी ज्यादातर लोग ब्लॉग पढ़कर भी कोई टिप्पणी बिना किये ही निकल लेते हैं। दूसरी बात हो सकती है ये बताने के लिए कि अमुक पोस्ट आपको कैसा लगा। यह कारण ही शायद अभी सबसे ज्यादा चलन में है। ज्यादातर लोग, जैसा मैंने पहले भी लिखा है, यही बताने में लगे रहते हैं कि उन्हें ब्लॉग कैसा लगा। मगर ज़रा एक बात पर ध्यान दीजिये कि क्या कभी किसी ने कहीं भी कोई ऐसी टिप्पणी पढ़ी है जिसमे लिखा हो कि ये अच्छा नहीं है। मैंने तो नहीं पढ़ा है अभी तक। अगर ऐसी किसी टिप्पणी की कोई जगह नहीं हमारे ब्लॉग-जगत में तो मैं मानता हूँ कि 'अच्छा' या 'सुन्दर' वाली टिप्पणी भी कोई मायने नहीं रखते।
तीसरी आवश्यकता जो मुझे लगती है टिप्पणी की वो है अमुक पोस्ट पर उठाये गए मुद्दों, सवालों, और विषयों पर अपनी राय देने की। कोई ब्लॉगर अपने विचार हमारे सामने प्रस्तुत करता है किसी ख़ास विषय पर और उसके उन विचारों से हम कितने सहमत हैं या असहमत हैं, इस बात को हम टिप्पणी के माध्यम से उनके सामने रख सकते हैं। उस ख़ास मुद्दे पर एक आम बहस का दौर चल सकता है ब्लॉग के माध्यम से। इस बहस का फायदा क्या होगा यह बताना ज़रा मुश्किल है मगर विचारों का आदान-प्रदान होगा इससे इनकार नहीं कर सकता। कई लोगों ने ब्लॉग का इस्तेमाल इसे एक भाषा मानकर किया है मगर क्या जबतक विचारों का कोई आदान-प्रदान न हो तब तक हम इसे भाषा की संज्ञा दे सकते हैं।
कोई अपने विचार यहाँ लिखता है और हम उसे सिर्फ उसकी लेखनी के आधार पर मूल्यांकन करके छोड़ दें तो क्या ये सही लगता है। क्या हमारा फ़र्ज़ नहीं बनता कि उसके द्वारा उठाये गए मुद्दे पर भी हमारा ध्यान जाये। खैर, बहुत बड़ी बड़ी बातें हो गयी आज। एक बार फिर से दिल दुखा देने वाली पोस्ट बनकर तैयार हो चुकी है। कई टिप्पणीकारों को शायद मेरी बात चुभ जाये, शायद कुछ लोग किसी भी तरह की टिप्पणी करना भी छोड़ दें मेरे पोस्ट पर। मगर अपने आप को इस ब्लॉग-जगत का सच्चा नागरिक मानते हुए अपना फ़र्ज़ समझता हूँ कि यदि कोई कमी महसूस हो तो उसे सबके सामने लाऊँ ताकि निदान हो सके। किसी को बुरा लगा हो तो माफ़ कर दें। आशा करता हूँ कि इस मुद्दे पर अपने विचारों से मुझे अवगत कराएँगे। धन्यवाद!

17 comments:

वीनस केशरी said...

आपके विचार से लगभग सहमत हूँ

कुछ असहमतियां हैं

- अगर आपने अभी तक किसी पोस्ट पर ऐसी टिप्पणी नही देखी जो रोष व्यक्त करती हो या ये कहती हो की ये मुझे अच्छा नहीं लगा तो आप कई ब्लॉग पर मेरी टिप्पणी को इस सन्दर्भ में पढ़ सकते है

-बाकी अगर कोई लेख पसंद करता है और केवल सटीक शब्दों में टिप्पणी कर के चला जाता है तो इसमें बुरा मानने की क्या बात है जरूरी नहीं की हर कोई विचारामंथन करे

-अगर आप ये चाहते हैं की हर कोई हर पोस्ट पर अपना विस्तृत विचार रखे तो मेरी समझ में ऐसा संभव नहीं है

-वैसे ये बात भी सही है और गलत है की सही है ब्लॉग जगत में उन पोस्ट पर ज्यादा विचार उचरा जाता है जिन पर बात करके दुनिया या खुद का कोई भला नहीं हो सकता

आलोक सिंह "साहिल" said...

आशु भाईजी, आपकी बात से पूरी तरह असहमत नहीं हुआ जा सकता है...लेकिन यह आइने का सिर्फ एक पहलू ही है..बाकी केशरी जी की बात मुझे उचित लगी ..
आलोक साहिल

Udan Tashtari said...

यह मुद्दा हजारों बार चर्चित हो चुका है और हर बार लिखने वाला इस तरह लिखता है कि जैसे पहली बार उसने उठाया है यह मुद्दा.

आप शुरु करें विस्तृत टिप्पणी करना और उदाहरण खड़ा करें कि ऐसे की जाती है टिप्पणी. लोग तो अनुसरण करने के लिए बैठे ही हैं.

सिर्फ बातों के जमा खर्च से बेहतर है कि प्रोत्साहन में अच्छा या बढ़िया कह दिया जाये. यह कुछ न कहने से बेहतर है.

आपका जो भी अनुभव हो लेकिन ऐसी टिप्पणियाँ भी उर्जा देती हैं सतत लेखन के लिए और इन्हीं के आभाव में कई ब्लॉग बंद हुए हैं.

विचार करियेगा और आज से अनुकरणीय उदारण देना शुरु करें विश्लेषणात्मक टिप्पणियाँ करके. हर्ष होगा.

मेरी शुभकामनाएँ सदैव की तरह आपके साथ हैं.

Udan Tashtari said...

हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

अनेक शुभकामनाएँ.

बी एस पाबला said...

निश्चित तौर पर उड़न तशतरी का कहना कि-
आप शुरु करें विस्तृत टिप्पणी करना और उदाहरण खड़ा करें कि ऐसे की जाती है टिप्पणी
आपके लिए एक चुनौती है
और मैं जानता हूँ कि आप इसे स्वीकारने के अतिरिक्त विस्तृत टिप्पणी करना लगातार जारी रखेंगे।

कम से कम मुझे तो अपने ब्लॉगों पर विस्तृत टिप्पणी की प्रतीक्षा रहेगी

वीनस केशरी की टिप्पणी भी इस संदर्भ में विचारणीय है।

बी एस पाबला

Suman said...

nice

RAJNISH PARIHAR said...

आपने सही मुद्दा उठाया है..पर इस ब्लाग परिवार को समझने में कुछ और समय चाहिए!यहाँ एक हिंदी फिल्म वाला सब मसाला है!इस सब के बीच आप अपने विचारों की ज्योति जलाये रखिये..अच्छे विचार तो सराहे ही जायेंगे!आप कितने ब्लाग पढ़ते है,उसी से आपके ब्लाग पर भी लोग आयेंगे..!बाकी केशरी जी की बात मुझे उचित लगी ..

Aashu said...

@केशरी जी: आपकी बात से बिल्कुल सहमत हूँ कि हर कोई पोस्ट पर एक विस्तृत टिप्पणी करे यह संभव नहीं मगर कोई एक व्यक्ति भी ऐसा न करे यह सही भी नहीं। जहा तक बुरा मानने की बात आपने की है तो मैं बता दूं की ये बुरा मानने जैसा कुछ भी नहीं है। कई बार मैंने देखा है कि काफी महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर लिखे गए ब्लोगों की भी धार शायद ऐसी टिप्पणियों से कुंद हो गयी है। टिप्पणी पढ़ते पढ़ते पोस्ट का मुद्दा ख़त्म ही हो जाता है क्यूंकि वहाँ एक भी टिप्पणी यह नहीं कहता कि मैं इससे सहमत हूँ मगर कुछ असहमतियां हैं, फलां-फलां.......बस वही बात होती है कि 'मुझे ब्लॉग पढ़कर अच्छा लगा।" ब्लॉग का जो काम है, विचारों का आदान-प्रदान, वो ज्यादातर नहीं होता ही दीखता है ब्लोगों पर। खैर, धन्यवाद आपने अपने बहुमूल्य विचार प्रस्तुत किये!

@साहिल जी: धन्यवाद अपने विचारों को यहाँ रखने के लिए!

@उड़न तश्तरी जी: आपसे सहमत हूँ कि प्रोत्साहन के दो शब्द कुछ न कहने से बेहतर हैं। इस बात से भी सहमत हूँ कि प्रोत्साहन करने वाली टिप्पणियों से सतत लेखन के लिए उर्जा तो बहुत मिलती है। मगर कई बार ब्लॉग लिखकर लगता है कि भूल जाता हूँ उस मुद्दे को, सिर्फ खुश होकर रह जाता हूँ की फलां-फलां साहबों को हमारी लेखनी पसंद आई। खैर, धन्यवाद अपने विचारों से अवगत कराने के लिए। जिस दायित्व का निर्वाह करने की अपील आपने मुझसे की है वो एक चुनौती तो है मगर निर्वहण करने की कोशिश जरूर करूँगा [शायद शुरुआत कर भी चूका हूँ, आप सब की टिप्पणियों का जवाब देकर चर्चा को आगे बढ़ाने का काम तो जरूर हो रहा है :)]। धन्यवाद!

@पाबला जी, @परिहार जी, @सुमन जी: धन्यवाद अपने विचारों से अवगत कराने के लिए!

गिरिजेश राव said...

आप के भीतर ऊर्जा है। ऐसे मुद्दे उठते रहने चाहिए।
लेखन जारी रखिए। विमर्श करती टिप्पणियाँ भी मिलेंगी । छोटी टिप्पणियो के प्रति भी सहिष्णु रहिए। अंग्रेजी ब्लॉगरी की तुलना में हिन्दी में संख्या बहुत कम है और लोग इसे आगे बढ़ाने में, संख्या बढ़ाने के प्रयास में लगे हुए हैं। जो अवस्था है उसमें ऐसा होना स्वाभाविक है।
समय और अन्य सीमाओं के कारण भी हर बार विस्तृत और विमर्श करती टिप्पणियाँ देना सम्भव नहीं हो पाता और पाठक हाजिरी लगा कर चल देता है। उसके स्नेह को देखिए कि यह बताना आवश्यक समझता है कि वह आप के ब्लॉग पर आया था।

sangeeta swarup said...

आपने टिप्पणियों के विषय पर चिन्त्ता व्यक्त की अच्छा लगा...नाईस या सुन्दर लेख की टिप्पणियां भी लेखक को प्रोत्साहित करती हैं...

और ये कहना कि किसी मुद्दे पर विचार मंथन नहीं होता ..मुझे ये लगता है कि ये कहना उचित नहीं है क्यों कि मैंने कई ब्लोग्स पर विचारों का आदान प्रदान देखा है....हाँ ये ज़रूर कहा जा सकता है कि वो संख्या कम है...उम्मीद है कि हिंदी ब्लोगिंग भी धीरे धीरे ऊँचे स्तर तक पहुंचेगी....इस मुद्दे को उठाने के लिए आभार

Aashu said...

@संगीता जी: धन्यवाद आपके आभार के लिए! मैं आपसे सहमत हूँ कि ऐसा नहीं है कि विचारों का आदान-प्रदान कहीं होता ही नहीं। जरूर इसकी संख्या कम है मगर ये यदा-कदा मिल ही जाया करते हैं। मगर कभी कभी एक छोटी सी बात रखने के लिए भी अतिशयोक्ति का सहारा लेना पड़ता है जो शायद मैंने लिया इस पोस्ट में। मैं मानता हूँ कि मुझे इस तरह के generalisation से बचना चाहिए था मगर आशा करता हूँ कि मेरी इस गलती को नजरअंदाज कर दिया जायेगा इस मुद्दे को आवाह्यक मन कर। धन्यवाद एक बार फिर!

कृष्ण मुरारी प्रसाद said...

मैंने कुछ ब्लॉग पर इस तरह की टिप्पणी है...१)मुझे समझ नहीं आया...
२)आपकी भाषा कठिन है..
३)थोड़ी सरल भाषा में लिखते तो अच्छा रहत....
४)आपकी भाषा और लिखने का लहजा ठीक नहीं है जिससे आपके मुद्दे पर लोग ध्यान नहीं देते, भड़क जाते हैं....
५)आपने बहुत लंबा पोस्ट लिखा है....
...इत्युअदी...इत्यादि....
..................
विलुप्त होती... नानी-दादी की बुझौअल, बुझौलिया, पहेलियाँ....बूझो तो जाने....
.........
http://laddoospeaks.blogspot.com/
लड्डू बोलता है ....इंजीनियर के दिल से....

जी.के. अवधिया said...

आशु जी, यहाँ सभी लोग आपकी बात से सहमत ही हों जायेंगे, यहाँ का चलन ही यही है। मैं नहीं मानता कि प्रायः टिप्पणियाँ किसी को प्रोत्साहित करने के लिये होती हैं, अधिकतर टिप्पणियाँ "तुम मेरी पीठ थपथपाओ मैं तुम्हारी पीठ थपथपाउँगा" अर्थात् एक दूसरे की आत्मतुष्टि करने के लिये ही होती हैं।

क्या हर किसी को प्रोत्साहित करना जरूरी है?

किसी को चिंता हो जाती है फलाँ ब्लॉगर लापता है और पोस्ट तैयार हो जाती है, किसी एक ब्लॉगर की किसी दूसरे ब्लॉगर से फोन पर बात हो जाती है तो पोस्ट बन जाता है, इस प्रकार के पोस्टों का क्या अर्थ है? किसका भला होता है ऐसे पोस्ट से? पढ़ने वाले का? हिन्दी का? किसका? ऐसे लेखन को प्रोत्साहित करना क्या दर्शाता है?

कई बार लगने लगता है कि सार्थक लेखन के लिये चिन्ता करना बेकार है, यहाँ पर तो जो हो रहा है वही होता रहेगा।

Dr. Smt. ajit gupta said...

आशुजी, टिप्‍पणियों का बड़ा गोरखधंधा है। दिन में सैकड़ों पोस्‍ट आती हैं सभी पर टिप्‍पणी करना और उन्‍हें पढ़ना सम्‍भव नहीं है। अपनी रुचि के विषय ही पढ़े जाते हैं, कम से कम मैं तो यही करती हूँ। लेकिन फिर भी कुछ पोस्‍ट दूसरी भी पढ़ने में आती है। मेरी टिप्‍पणियां आप पढ़िए हमेशा कुछ न कुछ विषय से सम्‍बंधित ही होगा। कई बार हम विधा विशेष में लिखने पर उसके सांचे का ध्‍यान नहीं रखते तब मैं जहाँ भी ध्‍यान जाता है हमेशा उसे टोकती हूँ क्‍योंकि यह सीखने का भी मंच है। विचारों के आदान प्रदान के लिए यह मंच है तो जिसमें जितना लेना का जज्‍बा है वो लेता है और जिसमें नहीं है वो नहीं ले पाता।

अजय कुमार झा said...

आशु जी मुझ से पहले आए सभी जनों ने काफ़ी कुछ सारगर्भित कह ही दिया है ..आपकी बहुत सी बातों सहमत हैं सभी और ये बात भी सच है कि सब ये जानते भी हैं ..मगर फ़िर वही प्रश्न कि पच्चीस हज़ार ब्लोग्गर्स हैं अभी जिनमें से शायद ही पांच सौ भी नियमित लिख पढ रहे हैं ..उसमें से टीपने वाले भी बहुत ज्यादा नहीं है तो जो भी ये कार्य कर रहे हैं उन पर आखिरकार कितनी जिम्मेदारी डाली जाए हां कुछ पोस्टें अपने आप ही पाठक को लिखने को मजबूर कर जाती हैं अब खुद देखिए न ..इस पोस्ट पर सबने अपनी राय रख ही दी है न ...शुभकामनाएं आपको
अजय कुमार झा

Aashu said...

@कृष्ण मुरारी जी: आपकी इन तरह की टिप्पणियों से किसी को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। अगर आपको पोस्ट उचित रूप से समझ न आई तो ये लेखक को बताना भी आवश्यक है। मैंने अपने पोस्ट में लिखा भी है और दोहराता भी हूँ यहाँ कि लेखनी का उपयोग सिर्फ अपने पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुचाने तक ही सीमित होना चाहिए। लेखनी की परवाह करते करते मुद्दे को भूल जाना बिल्कुल भी ठीक नहीं है। साथ में ये भी कहना चाहूँगा कि मुद्दे की परवाह करते हुए लेखनी को भी नहीं भूलना चाहिए क्यूंकि यह लेखनी ही है जो किसी पोस्ट को व्यापक बनाती है। धन्यवाद आपके विचार के लिए।

@अवधिया जी: आपकी बात से पूर्णतया सहमत हूँ। ज्यादातर टिप्पणियां आवश्यक से ज्यादा एक औपचारिकता ही प्रतीत होती हैं। फलां ने मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी की है इसलिए मैं भी उसके ब्लॉग पर टिप्पणी करूँगा। इस तरह की विचारधारा से न हमारा भला होने वाला है न ही हिंदी ब्लॉग-जगत का। इसलिए आवाज उठती रहनी चाहिए। एक बात और, निराशावाद से थोडा बचें। हिंदी ब्लॉग अभी भी अपने शैशव-काल में है और अभी भी इसमें कई बदलाव आने बाकी हैं। उम्मीद अभी भी है सार्थक लेखन के लिए। जरूरत है अपने स्टैण्डर्ड को बनाये रखने की। कोई करे न करे सार्थक लेखन आपको ये निरंतर करते रहना है। शायद कोई अनुकरण ही कर ले आपकी और सार्थक लेखन के तरफ कई कदम बढ़ जाएँ। धन्यवाद आपकी टिप्पणी के लिए!

@Dr. gupta ji, @अजय जी: धन्यवाद, प्रोत्साहन के लिए!!

वीनस केशरी said...

मैंने तो कभी ध्यान नहीं दिया की कौन मेरे ब्लॉग पर कमेन्ट कर रहा है और कौन नहीं ये जरूर ध्यान देता हूँ कमेन्ट करने वाले ने क्या कहा :)

सीधा नियम है,

नेट पर आओ

मेल चेक करो

जिनको अनुसरण कर रहे हो उनमे से काम की
पोस्ट पढ़ो

ब्लोग्वानी से बगल के लिंक में से अपने मतलब की पोस्ट पढ़ो

और फिर चिट्ठाजगत के बगल के लिंक पढ़ो

फिर पूरा चिट्ठा जगत खोल खोल कर अपने मतलब की पोस्ट पढ़ो

जिस पर समझ बने कमेन्ट करो

नेट बंद कर के सो जाओ

अपन तो २ साल से यही कर रहे हैं :)

कई ब्लोग्गेर्स ने मेरी कहे बात पसंद की - शुक्रिया :)