Friday, March 19, 2010

तिरुपति वाले बालाजी भगवान नहीं है!

पिछले पोस्ट पर अपनी यात्रा के बारे में कुछ बातें मैंने प्रस्तुत किया था। आज भी कुछ उसी यात्रा के बारे में लिखने जा रहा हूँ। अपनी यात्रा में एक दिन तिरुपति में भी बिताया। मकसद बालाजी के दर्शन का था। पिछली बार जब बंगलोर गया था तो दादी को लेकर तिरुपति भी गया था। बालाजी के दर्शन के साथ दादी को तीर्थ कराने का पुण्य पाने का मौका भी मिल गया था। इस बार भी कुछ ऐसी ही बात थी। इस बार साथ में चाचाजी थे।
पिछली बार जब दादी के साथ गया था, तब दर्शन में कोई दिक्कत नहीं हुई थी। वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक अभिभावक के साथ जाकर दर्शन करने की सुविधा ट्रस्ट ने मुहय्या कराई हुई थी। उस सुविधा का लाभ उठाकर हमने बिना समय लगे बिना लाइन में लगे ही दर्शन कर लिए थे। इस बार ऐसी सुविधा नहीं मिल सकी थी। बंगलोर से भारतीय पर्यटन विभाग द्वारा पैकेज टूर कराया जाता है जिसमे आने जाने का भाडा और दर्शन में लगने वाले टिकट शामिल होते हैं। उसी टूर से हमलोग भी इस बार तिरुपति गए। और लोगों से तिरुपति में दर्शन के लिए लगने वाले लाइन और उसमे लगने वाले विभिन्न दामों के टिकट के बारे में सुन रखा था। पिछली बार इसका अनुभव न हो पाया मगर इस बार काफी नजदीक से इसका अनुभव हुआ।
पैकेज टूर में होने के कारण वहाँ लाइन में हमें VIP टिकट मिल गया था। पैकेज का हिस्सा होने के कारण सही दाम पता न चल सका मगर लाइन लगने के बाद पता चल गया कि हम 300 वाले लाइन से आगे थे। लाइन लग गए, अंदर घुसना शुरू भी हो गया। इसके बाद शुरू हुआ एक अप्रतिम तमाशा। हम अपने लाइन में जा रहे थे और बीच में कुछ 300 रुपये टिकट वाले लोग हमारी लाइन में घुसने का प्रयास करने लगे तो जो हाल मैंने देखा उसे देखकर मन वहीँ पर दर्शन के नाम से घृणित हो गया। ट्रस्ट के कुछ कर्मियों ने इस प्रकार उन लोगों को हमारे लाइन से हटाया जैसे किसी चोर-उचक्के को मारा जाता है। उनका लहजा ऐसा था जैसे वो उन लोगों को उनकी औकात बता रहे हों। मुंबई के डांस बार में जिस तरह फ़ोकट की दारु पी लेने वाले को औकात बताई जाती है, वैसा ही कुछ नजारा वहाँ देखने को मिला। तुरंत मन में एक ख्याल आया। जिस भगवान के दर्शन के लिए भक्तों को अपनी औकात सोचनी पड़े वो क्या सच में भगवान हैं। बचपन से सुनता आया हूँ कि भगवन सब के हैं, सब भगवान के सामने बराबर हैं। तिरुपति के उस लाइन में जो मैंने देखा, और कईयों ने भी देखा होगा, वो देखकर ऐसा लगा कि या तो जो अभी तक सुना है वो गलत है, झूठ है, या फिर वहाँ भगवान हैं ही नहीं। किसी भगवान के दरवाजे पर उसके भक्त को औकात नहीं याद दिलाई जा सकती।
ये तो एक छोटी सी घटना थी जो उस यात्रा के आरम्भ में ही हमारे साथ घटित हुई। ऐसी कई घटनाएँ जगह-जगह पर उन 3 घंटों में हमने अनुभव की। 3 घंटे की उस यात्रा में मुझे नहीं याद कि कभी मेरे मन में भक्ति की कोई भावना जग सकी हो, ऊपर से इस बात की गारंटी मैं देता हूँ कि अगर किसी के मन में शुरुआत में ये भावना रही भी होगी तो अंत तक वो भावनाएं छू-मंतर हो ही चुकी होंगी। ये कैसी अजब परम्परा है वहाँ की मालूम नहीं। हमारे यहाँ बचपन से सिखाया गया है कि भगवन के दर्शन यथासंभव भूखे पेट ही करने चाहिए। फलाहार के साथ थोड़ी छूट हमें मिल जाती थी मगर कभी ये नहीं सोचा था कि घर में पूजा पर बैठना है तो आराम से अनाज और नमक खा कर पूजा कर लेंगे। वहाँ ये भी देखा। घर से तो छोडिये, लाइन में लगे-लगे वहाँ समोसे, बिस्कुट बेचने वाले मिल जाते हैं और भक्त-जन बड़े चाव से खरीद-खरीद खाते हैं। लाइन लगाने के लिए विशेष व्यवस्था बनायीं गयी है जिसे 'Queue Complex' कहते हैं। उसमे चप्पल पहन कर जाना मना है मगर खाने के जूठे टुकड़े गिराना नहीं। ये सिर्फ बालाजी के यहाँ ही देखा है मैंने। किसी और भगवान के दर पर ऐसा नहीं देखा। एक बार फिर सोच में पड़ गया। जिसके दर्शन करने आया हूँ वो सच में भगवान हैं या नहीं।
एक पुराना गाना सुना था, 'नाच मेरी बुलबुल के पैसा मिलेगा।' कुछ साल पहले एक और गाना प्रचलति हुआ, 'पैसा फेंक, तमाशा देख।' बताने की जरुरत नहीं कि जिस नाच का ज़िक्र पहले गाने में हुआ है वो कोई शाष्त्रीय आदरणीय नृत्य नहीं है, न ही वो तमाशा है जिसका ज़िक्र दुसरे गाने में हुआ है। अगर ये गाने किसी भगवान के दर्शन के समय किसी को याद आ जाएँ तो आप उसे पागल या धर्म-भ्रष्ट ही कहेंगे। अगर इस बात को मानते हैं तो कहिये मुझे पागल, मानिए मुझे धर्म-भ्रष्ट। मगर जरा उस भगवान के बारे में भी सोचिये जिनके दर्शन के लिए जो जितने अधिक पैसे दे वो उतनी जल्दी दर्शन करे। 500 का टिकट लिया तो 3 घंटे लगेंगे, 300 में 6, 100 में बारह, तो 50 में 24 घंटे। अगर आपके पास कुछ भी नहीं तो शायद जिंदगी भर लाइन में ही लगे रहना पड़ जाए। ये कैसे भगवान हैं बालाजी। ये तमाशा नहीं तो और क्या। अमीर हो तो दर्शन होंगे, नहीं तो जाओ भांड में। पैसे देकर भगवान के दर्शन करना मेरे लिए तो अपच है। हाँ अगर मंदिर की सुंदरता देखने के लिए पैसे दिए जा रहे हैं तो कुछ बात हजम भी होती है। लेकिन अगर ऐसा है तो फिर क्या अंतर रह गया बालाजी के मंदिर और मुमताज़ के मकबरे में। कोई टिकट खरीद कर आसानी से इससे कम समय में ताज महल के दर्शन ही क्यूँ न कर ले।
यहाँ पर जो कुछ भी लिख रहा हूँ, ये सब शायद बालाजी के भक्तों को बुरा लगे। शायद कई लोग मुझे नास्तिक भी समझें। पहले अपने आप के बारे में ही बता देना चाहता हूँ। मैं पूर्णतया नास्तिक नहीं हूँ, और कहा जाए तो सही मायनों में पूरा आस्तिक भी नहीं। राम के अस्तित्व पर सवाल करता हूँ मगर रामायण पर नहीं। कृष्ण-लीलाओं की सच्चाई खोजता हूँ मगर भगवद-गीता के उपदेशों की नहीं। बस इतना मानता हूँ की ये राम और कृष्ण मानव-रचित कहानियों के पात्र हैं जिन्हें हमारे ऋषि-मुनियों ने रचा है ताकि हम उनसे प्रेरणा लेकर एक उच्च-जीवन बसर कर सकें। अगर इससे आप मुझे नास्तिक समझते हैं तो जरूर समझें। मगर इतना जरूर कहूँगा कि बालाजी की तरह अमीरों के दो-चार भगवान और मिल जाएँ तो सच में नास्तिक हो जाऊँगा। मुझे हिंदू धर्म पर अपनी आस्था का पूरा यकीन है। यही यकीन है जिसके बल पर ये कह रहा हूँ कि यदि तिरुपति वाले बालाजी ऐसे हैं तो वो भगवान नहीं हैं!

6 comments:

mahadev said...

मै भी तीर्थ स्थलो पर जाता हुं तो कई बार पंडो के व्यवहार एवम प्रबन्धकारिणी समिति की उदासिनता देख दुखी हो जाता हुं। लेकिन निंदा से काम नही चलने वाला । सम्बन्धित अधिकारियो से मिल कर अपनी विचारधारा से अवगत कराए। मै भी मंदीरो मे दर्शन के लिए टिकट की व्यवस्था को अच्छा नही मानता - लेकिन कुछ लोग है जो ईसे अच्छा बताते है। मन चंगा तऽ कठवती में गंगा।...

Aashu said...

यही तो बात है महादेव जी! अपने धर्म में बाकी किसी भगवान के पास मन चंगा तो कठोती में गंगा मगर बालाजी के पास मन से नहीं चलने वाला वहाँ धन चाहिए. 'तन-मन को मारो गोली और धन के साथ खेलो होली' बस यही है बालाजी के यहाँ का मूलमंत्र!

गिरिजेश राव said...

तिरुपति एक औद्योगिक घराना है । यहाँ की तीर्थयात्रा एक उद्योग में इनवेस्टमेंट जैसा है जिसका रिटर्न पुण्य है। ऐसा सोच कर देखिए न ! :)
बाकी मन चंगा तो कठौती में गंगा। हाँ, सांस्कृतिक झाँकी आ आनन्द लेने के लिए पर्यटन किया जाय तो बात ही अलग हो जाती है। फिर बाला जी नहीं, बाला जी के परिवेश से जुड़ने और उसकी विशिष्टताओं को परखने में ही परमानन्द है।

Aashu said...

@गिरिजेश राव जी! कुछ ऐसी ही बात मैं अपने पोस्ट के माध्यम से कहना भी चाह रहा था. अगर तिरुपति मन में भक्ति-भावना से जाएँ तो वो सब कुछ देखकर दुःख होता है. यही कहना चाह रहा था कि यदि वहाँ जाना है तो पर्यटन की सोच के साथ ही जाएँ और बालाजी को एक व्यवसायी ही मानें. उन्हें कुछ देंगे तभी वो वापस आपको कुछ दे पायेंगे. खैर, अपने देश में जहां भ्रस्टाचार हर तरफ फैला हुआ है वहाँ हम अपने भगवान से भी उम्मीद कर सकते हैं की वो भी हमारा काम करने के लिए कुछ घूस जरूर लेंगे.
धन्यवाद आपकी टिप्पणी और आपके विचार के लिए!

Shri Ram Ayyangar said...

Kanyakumari se Kashmir tak, Dharam ke naam chor ek jaise hi hain!

Richik Sinha said...

Eesana Sarva Vidyanam, Esvarah Sarva Bhutanam Brahmadhi Patir Brahmanodhi Patir Brahma Sivo Me Astu, Sada Sivom.Sara sanssar ishwaar kaaa hi hai....Log aisa maante hai ki kalyug hai yaa scientific age hai;hum samjhdaar hai ...... 21st century hai...Lekin fir bhi aap bhool jatey hai ki bhagya hi apke jiwan ko banata hai! Aur jo bhi ho raha hai,ishwar ki iksha se hi hota hai.Iss prakaar se aap nishcintt rahye aur apne jiwan ka sahi upayog kijiye!