Friday, April 09, 2010

नहीं करूंगा मैं दंतेवाड़ा के शहीदों को सलाम!

आज रात साढ़े 8 बजे NDTV इंडिया पर दंतेवाड़ा में हुए शहीदों के ऊपर बनी डौक्युमेंटरी देख रहा था। प्रोग्राम का नाम नहीं मालूम, शायद, 'ग्राउंड जीरो से' था। मूलतः शहीदों के परिवार पर आधारित था यह प्रोग्राम। कोई 10-11 परिवारों को शोक मनाते दिखाया गया। कहीं एक बुढा बाप अपने बेटे से एक घर की आस लगाये इंतज़ार कर रहा था तो कहीं एक पत्नी अपने कोख के लाडले को उसके पिता से मिलवाने का इंतज़ार कर रही थी। कहीं एक भाई दुसरे भाई के कमज़ोर दिल के होने की दुहाई देकर उसे पिता के चले जाने की खबर नहीं दे पा रहा था तो कहीं एक बच्ची सिर्फ यह कहकर फफक पड़ी की पापा उसे घुमाने ले जाया करते थे। मरने के ठीक पहले एक जवान ने अपने घर बात भी की। कितना बोझ होता है एक जवान के ऊपर। देश के लिए मर जाने का जज्बा भी है ओर साथ में परिवार की फिक्र भी। 2 मिनट की उस बात में उस जवान ने अपनी पत्नी से सिर्फ इतना कहा, 'बच्चों का ख्याल रखना।' उसके लाडलों का ख्याल तो किसी तरह रोते-फफकते ही सही मगर उसकी पत्नी रख ही लेगी मगर अपने इस लाडले का ख्याल हमारी भारत माता क्यूँ नहीं रख पायी।
जिस दिन सुबह में अखबार के पहले पन्ने पर मोटे-मोटे अक्षरों में हमले की खबर और तस्वीरों को देखा है, उस दिन से मन विचलित हुआ जा रहा था। एक बार भी कभी कोई समाचार चैनल देखने का जी नहीं कर रहा था। हमेशा डर लगा रहता था। लगता था पता नहीं कब कोई तस्वीर ऐसी दिख जाए या कोई खबर ऐसी सुनाई पड़ जाये जिससे मन और बैठ जाये। आज किसी तरह से हिम्मत जुटाया और दिलेरी के साथ सारा प्रोग्राम देख गया। ताज होटल के हमले ने भी इस तरह अन्तःमन को नहीं झकझोरा था जैसा आज हुआ। दिमाग सन्न हो कर रह गया। गला सूख गया। रोने का मन हुआ तो आँखों में आंसू भी नहीं आये। कुछ बोलने के लिए जब जुबान को हिलाना चाहा तो वो भी संभव नहीं हो सका। बस साँसें चलती रही और दिल धड़कता रह गया। ज़िन्दगी की यही दो निशानियाँ उस वक़्त थी जिससे दिलासा हुआ कि जिंदा हूँ।
जब थोड़ी सुध आई तो प्रोग्राम ख़त्म हो चुका था। थोडा जोर देकर सोचा तो तरस आया अपने आप पर। कितनी आसानी से शिथिल हो गया सिर्फ एक प्रोग्राम देखकर। कहने को तो जवान हूँ मगर तरस आया अपनी जवानी पर जब उस बूढ़े बाप को देखा अपने बेटे की अर्थी उठाये। कहने को तो मर्द हूँ पर तरस आया अपनी मर्दानगी पर जब देखा उस लड़के को पूरे सम्मान के साथ अपने पिता को मुखाग्नि देते हुए। अब तो रोना भी नहीं आ रहा था। खुद अपने आप को नीचा दिखाने का मन हो रहा था। जब बिजली कटती थी तब उसकी शिकायत होती थी पिताजी से। आज जब पिताजी ने इनवर्टर लगवा दिया है तब शिकायत होती है कि बिजली जाने के बाद AC नहीं चल पाता। पिताजी जेनरेटर का भी इंतजाम करा ही देंगे। तब शिकायत होगी कि कोई है नहीं जो रात में आकर AC चला दे और सुबह बंद कर दे। इंतजाम उसका भी हो जायेगा। AC कमरे में बैठे, LCD टीवी पर आराम से फिर किसी नक्सल हमले की खबर देखूंगा। 2-4 दिन फिर विचलित रहूँगा। फिर सब ठीक। सारा ध्यान एक बार फिर IPL की चकाचौंध की ओर चला जायेगा। हो सकता है एक और ब्लॉग लिख दूंगा अपने आप को गाली देते हुए, अपने आप पर लांछन लगाते हुए। थोडा कम विचलित हुआ तो खड़ा कर दूंगा सरकारी नीतियों के खिलाफत का पहाड़।
और क्या करूँगा, कुछ भी तो नहीं। कुछ कर भी सकता हूँ क्या। कुछ भी तो नहीं। अपनी डाक्टरी छोड़ कर चल तो नहीं दूंगा एक ऐसे जगह जहां 100 किलोमीटर की दूरी तय की जाती है 10 घंटे में, जहां बिजली नहीं, पानी नहीं, रहने को घर तक नहीं। ऊपर से नक्सलियों की गोली का शिकार कभी भी बन सकने का डर। AC के लिए कम्प्लेन करने वाला कैसे वहाँ जाकर रह सकता है। वो कैसे अपनी ज़िन्दगी वहाँ गुजारने की सोच सकता है। वो कोई और नहीं, वो मैं भी नहीं, वो है एक आम हिन्दुस्तानी, वो वहाँ जाकर नहीं रह सकता। वहाँ रह सकता है तो कोई ख़ास हिन्दुस्तानी। वहाँ रह सकता है तो सिर्फ CRPF का वो जवान जो इतनी दिक्कतों के बावजूद भी कभी कम्प्लेन नहीं करता। जहां जाकर हम दो बूँद पसीना बहाने को तैयार नहीं वहाँ वो आये दिन खून बहाता रहता है। पता नहीं कहाँ से आता है वो जज्बा उनके पास। इतना सब कुछ हो जाता है फिर भी पीछे नहीं हटता वो। मुख से एक ही बात हमेशा निकलती है, "आ देखें ज़रा किसमे कितना है दम!" ऐसे ख़ास हिन्दुस्तानी को सलाम करने का मन नहीं करता। सोच रहे होंगे कि क्यूँ सलाम करना नहीं चाहता। क्यूँ करूं मैं सलाम। आखिर औकात ही क्या है मेरी। कुछ भी हुआ नही कि बस बैठ गए ब्लॉग पर भड़ास निकालने। निकाल दिया और हो गए खुश कि रख दी सब के सामने अपनी बात। अरे क्या होगा ये लिखकर। नहीं करूंगा मैं सलाम उस ख़ास हिन्दुस्तानी को। नहीं करूंगा उसका अपमान अपनी सलामी से। एक अर्जी है आप भी तब ही करियेगा उन्हें सलाम जब लगे कि आपका सलाम उनके चरणों के धुल के भी बराबर है। छोटी सी अर्जी है सोचियेगा जरूर और यथासंभव मानियेगा भी!

12 comments:

डॉ महेश सिन्हा said...

हर आदमी जो अपना काम ईमानदारी से कर रहा है इस देश का एक सैनिक है .
बाकी जाकी रही भावना जैसी

बैरागी said...

"आप भी तब ही करियेगा उन्हें सलाम जब लगे कि आपका सलाम उनके चरणों के धुल के भी बराबर है। छोटी सी अर्जी है सोचियेगा जरूर और यथासंभव मानियेगा भी! "

बहुत ही अच्छा लिखा है
हमें कुछ तो करना चाहिए अपने देश के वीर जवानो के लिए

Rahul said...

"The Best" Post on ur blog ... !!!

Suman said...

nice

मो सम कौन ? said...

आपकी व्यथा जायज है। हम लोग अपने घरों में बैठकर सभी सुख सुविधायें भोगते हुये कितनी आसानी से इन्हें इग्नोर कर जाते हैं।
शर्मिंदा हैं खुद पर।

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

महेश जी से सहमत. पर आपने चिंतन को हवा दी, इसके लिए धन्‍यवाद.

nitesh said...

gr8 writing skills

मिहिरभोज said...

मुझे तोङ लेना बनमाली उस पथ पर देना तूं फैंक
मातृभूमि पर शीश चढाने जिस पथ जायें वीर अनेक
.....शत् शत् नमन्
आपका आलेख सचमुच हिला देने वाला है....

Pushpendra said...

wanted to say something but don't know what to say.....

Kulwant Happy said...

सलाम करना बनता है हमारी सरकारों को, जिनकी बदौलत हर रोज न जाने कितने घरों के चिराग शहीदों का रुतबा हासिल कर जाते हैं।

किसी बात के लिए शहीद करवा दिए जाते हैं माओं के बेटे, पत्नियों के सुहाग। अगर शहीद होना ही बड़ा रुतबा है इस देश में तो नेता खुद को नहीं हासिल कर लेते इस ताज को। क्यों नहीं करते अभियानों की अगवाई, क्यों नहीं नेताओं के बेटे फौज की तरफ रुख करते।

Aashu said...

@कुलवंत जी: आप हमारे ब्लॉग पर आये और अपनी बहुमूल्य टिप्पणी दी, इसके लिए आभार। आपके विचारों के प्रति पूरे सम्मान के साथ इतना कहना चाहता हूँ कि अब बस भी कीजिये सरकार की टाँगे खीचना। कब तक हम इस तरह हर किसी चीज का ठीकरा यूँही नेताओं के ऊपर फोड़ते रहेंगे। बंद कीजिये ये सब। चलिए अब थोड़ा आगे बढ़ें ओर पहचाने अपने दायित्वों को। देश हमसे ही बदलेगा, हमारे मंत्रियों से नहीं। न चिदंबरम साहब ने अपने फायदे के लिए नक्सलियों को भड़काया है न ही अपने फायदे के लिए CRPF के जवानों की तैनाती की है। नक्सलियों ने हमला किया, जवान मारे गए। इनके बीच में सरकार तो कहीं नहीं आती। आज जब युद्ध का रास्ता अख्तियार किया और ये कांड हुआ तो कहते हैं कि बातचीत से मामला सुलझाना चाहिए था और पहले जब युद्ध-विराम के समय हमले हो रहे थे तो उस समय रट लगी हुई थी कि कब तक हम यूँही चुप बैठे रहेंगे। सरकार के साथ ये पुरानी मुसीबत है, किसी भी नीति से वो किसी को खुश नहीं कर सकती। छोड़िये सरकार से दुखी होने का काम विपक्ष के ऊपर और चलिए अपनी जिम्मेदारी समझने की ओर कदम बढ़ाते हैं!

Sanjiv Kavi said...

बस्तर के जंगलों में नक्सलियों द्वारा निर्दोष पुलिस के जवानों के नरसंहार पर कवि की संवेदना व पीड़ा उभरकर सामने आई है |

बस्तर की कोयल रोई क्यों ?
अपने कोयल होने पर, अपनी कूह-कूह पर
बस्तर की कोयल होने पर

सनसनाते पेड़
झुरझुराती टहनियां
सरसराते पत्ते
घने, कुंआरे जंगल,
पेड़, वृक्ष, पत्तियां
टहनियां सब जड़ हैं,
सब शांत हैं, बेहद शर्मसार है |

बारूद की गंध से, नक्सली आतंक से
पेड़ों की आपस में बातचीत बंद है,
पत्तियां की फुस-फुसाहट भी शायद,
तड़तड़ाहट से बंदूकों की
चिड़ियों की चहचहाट
कौओं की कांव कांव,
मुर्गों की बांग,
शेर की पदचाप,
बंदरों की उछलकूद
हिरणों की कुलांचे,
कोयल की कूह-कूह
मौन-मौन और सब मौन है
निर्मम, अनजान, अजनबी आहट,
और अनचाहे सन्नाटे से !

आदि बालाओ का प्रेम नृत्य,
महुए से पकती, मस्त जिंदगी
लांदा पकाती, आदिवासी औरतें,
पवित्र मासूम प्रेम का घोटुल,
जंगल का भोलापन
मुस्कान, चेहरे की हरितिमा,
कहां है सब

केवल बारूद की गंध,
पेड़ पत्ती टहनियाँ
सब बारूद के,
बारूद से, बारूद के लिए
भारी मशीनों की घड़घड़ाहट,
भारी, वजनी कदमों की चरमराहट।

फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

बस एक बेहद खामोश धमाका,
पेड़ों पर फलो की तरह
लटके मानव मांस के लोथड़े
पत्तियों की जगह पुलिस की वर्दियाँ
टहनियों पर चमकते तमगे और मेडल
सस्ती जिंदगी, अनजानों पर न्यौछावर
मानवीय संवेदनाएं, बारूदी घुएं पर
वर्दी, टोपी, राईफल सब पेड़ों पर फंसी
ड्राईंग रूम में लगे शौर्य चिन्हों की तरह
निःसंग, निःशब्द बेहद संजीदा
दर्द से लिपटी मौत,
ना दोस्त ना दुश्मन
बस देश-सेवा की लगन।

विदा प्यारे बस्तर के खामोश जंगल, अलिवदा
आज फिर बस्तर की कोयल रोई,
अपने अजीज मासूमों की शहादत पर,
बस्तर के जंगल के शर्मसार होने पर
अपने कोयल होने पर,
अपनी कूह-कूह पर
बस्तर की कोयल होने पर
आज फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार, कवि संजीव ठाकुर की कलम से