Wednesday, December 01, 2010

यूँही फुर्सत में: कुछ ख्याल!

चंद रोज़ बेगारी के,
कुछ पल कामचोरी के,


कई सफहों को कलम फिर गंदा कर गयी!

वो जब कुछ नहीं करता तो कितना कुछ कर देता है या कितना कुछ कर देने की शक्ति रखता है. कमरे में अकेले किताबों के बीच बैठा हुआ. बड़ी मुश्किल से ध्यान वहीँ बगल में रखे अपने लैपटॉप पर से हटा पाता है. किताबों की पतली-मोटी अक्षरें उसका ध्यान अपनी तरफ खींच पाने में अक्सर असफल हो जाती हैं. कमरे के बाहर सड़क पर से गुजरती हुई वो 'उमर बिजली मलहम' की प्रचार गाड़ी उन अक्षरों को हमेशा मात दे देती हैं. कमरे के बाहर का कुछ भी उसे कितना भाता है. उसका मन हमेशा यूँही कुछ ख्यालों में खोया रहता है. बेतरतीब से कई ख्याल, कुछ ढंग के, बाकी सारे बेढंगे, बिना सर पैर के. ख्यालों की कोई निश्चित दिशा नहीं होती, इसका प्रमाण वो हर रोज़ अपनी ज़िन्दगी में देखता है. घर के बाहर काम कर रहे मजदूर के चेहरे पर के झुर्रियों से जो उड़ान ख्याल भरते हैं उनकी लैंडिंग न जाने कहाँ कहाँ हो जाती है. एयर ट्रैफिक कंट्रोल वालों को कितनी मुश्किल होती होगी. कभी आगे से, कभी पीछे से, कभी ऊपर से, कभी नीचे से, अचानक, ख्यालों का एक्सीडेंट न जाने कितनी बार हवाई जहाज़ों से होता होगा.
न जाने कितने ख्याल कुछ मिनटों में उसका मन बुन लेता है. कुछ ख्याल ऐसी सवालों के शक्ल में आते हैं जिनका जवाब कोई नहीं दे सकता. 'मनमोहन देसाई न होते तो "खोया-पाया" फिल्मों का वजूद क्या होता?'.......'अमिताभ बच्चन की ऊंचाई थोड़ी कम होती तो ड्रीम हसबैंड की ऊंचाई का मानक कौन होता?'.......'माधुरी दीक्षित की चोली के पीछे इतनी हलचल क्यूँ रहती थी?'.........'विनोद मेहरा के शर्ट के ऊपर के चार बटन नदारद क्यूँ होते थे?'.........'हेलेन आंटी का पीठ हमेशा खुला ही क्यूँ होता था'.......'हंगल साहब अपने बेटे की अर्थी उठाते उठाते खुद कभी क्यूँ नहीं मरे?'........'सचिन तेंदुलकर बैटिंग के पहले टाँगे क्यूँ फैलाता है?'........'सिद्धू के मुहावरों की गंगोत्री हिमालय के किस भाग से निकलती है?'.........ऐसे ही कई सौ सवाल है..........जवाब न मिलता है, न मिलने की ख्वाहिश होती है. बस एक ख्वाहिश रहती है ऐसे सवालों के हमेशा जिंदा रहने की. शायद मन को घूमने का इक आयाम देती हैं ये. उनकी उड़ान के लिए पंखों का सहारा बनती हैं ये. शायद इसीलिए जवाब ढूंढता भी नहीं वो. कहीं जवाब मिल गए तो मन की उड़ान बंद न हो जाये.....
कई ख्याल ऐसे भी होते हैं जो उसे कुछ सोचने को मजबूर करती है. कई दिन की चिलचिलाती धूप के बाद वो कुछ घंटों के लिए बादलों का घुमड़ना.......हवा के झोकों में किसी लड़की का दुपट्टा फिर से उड़ना.........दिन भर काम करते उस मजदूर का झुर्रियों भरा चेहरा.........अस्पताल में इमरजेंसी में एक गरीब की अपनी किस्मत से हार........उस दिन टेलीफोन पर प्रेमिका से झगडा........न जाने और क्या क्या........रेखा के मन को बहकने के लिए बेली के महकने की दरकार होती थी, उसके मन के लिए ऐसी कोई जरुरत नहीं. बहकना उसके मन का शौक है, मजबूरी नहीं. बिना किसी सीमा के किसी भी गली में कभी भी घुस जाता है उसका मन. मंजिल तक पहुचने की कोई लालसा नहीं, बस राह चलते रहने की अभिलाषा होती है.
कुछ ऐसे ही बेगारी भरे दिन बीते पिछले कुछ दिन. कई ख्याल मन में उमड़ते रहे. कुछ नाकाम रह गए तो कुछ ने शब्दों की शक्ल ले ली. ऐसे ही कुछ ख्याल यहाँ पेश करने के कोशिश कर रहा हूँ. उम्मीद है पसंद आयेंगे!
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उस रोज़ सूरज ने आँखें मूंदी थी
या बादल के साए में छुप गया था.

चाँद दो पल के लिए ही सही, मुस्करा रहा था!
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ज़ालिम हवा के वो झोंके
उड़ता हुआ वो तुम्हारा दुपट्टा

उफ़! खुली आँखों के ये सपने बड़े जालिम होते हैं!
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चाँद आया था धरती और सूरज के बीच
तारे भी उस रोज़ मुस्करा रहे थे.

बीच दोपहर में भी रात आती है कभी!
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वो झुर्रियों भरा चेहरा आज भी ईंट ढो रहा था.
आसमान में आज बादल छा गए थे

आख़िरकार आज सूरज ने भी हार मान ही ली!
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वक़्त की बेवफाई कहूं
या शुबहे की दगाबाजी थी.

जागे हुए बड़ी लम्बी गुजरी थी वो रात!
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ज़िन्दगी और मौत की जद्दोजहद में
गाँधी के चंद हरे-लाल चेहरों ने फिर बाजी मार ली

ये बीमारियाँ गरीबों का पेटेंट ही क्यूँ नहीं करा लेती?
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8 comments:

ana said...

बहुत अच्छी पोस्ट

मनोज कुमार said...

इस रचना की संवेदना और शिल्पगत सौंदर्य मन को भाव विह्वल कर गए हैं।

डॉ. नूतन - नीति said...

आपकी रचना बहुत अच्छी लगी .. आपकी रचना आज दिनाक ३ दिसंबर को चर्चामंच पर रखी गयी है ... http://charchamanch.blogspot.com

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बढ़िया लगीं आपकी त्रिवेणियाँ

babanpandey said...

bahut khub //
main bhi patna ka hi hun //
aaj charchamanch par meri bhi ...ek kavita li gaii hai //...
mere bhi blog par padharee //

अनुपमा पाठक said...

बढ़िया पोस्ट!

Aashu said...

आप सब को धन्यवाद!

Aashu said...

@डा. नूतन: धन्यवाद मेरी पोस्ट को चर्चामंच पर शामिल करने लिए!