Monday, February 01, 2010

पप्पू के माँ की खोज!

मैंने अपने पिछले पोस्ट में अपने कॉलेज जीवन में जातीयता की यात्रा की शुरुआत का ज़िक्र किया है। हालांकि ये यात्रा सही रूप से कॉलेज के माहौल से ही शुरू हुई है मगर इसके बीज काफी पहले ही पड़ चुके थे। बिहारी होने का एक मतलब इस बीज के साथ पैदा होना भी होता है। इस तरह के generalisation से हालांकि मुझे बचना चाहिए था मगर कुछ भी हो, घरेलु ग्रामीण परिवेश में ये बात बिहारियों पर जरूर लागू होती है (अपवाद हर नियम में होते हैं और ये नियम खुद कोई अपवाद नहीं)। आज अपनी स्कूल की ज़िन्दगी का जिक्र करने जा रहा हूँ जहाँ जातीयता के साथ अल्हड़ जवानी के रंग भी देखने को मिलेंगे।

10वीं बोर्ड की परीक्षा पास करके 11वीं में फिर उसी स्कूल में एडमिशन ले लिया था। पुराने ज्यादातर दोस्त स्कूल बदल चुके थे या फिर दुसरे विषयों का चयन करके अलग अलग सेक्शन में चले गए थे। मैं जिस सेक्शन में था वहां मेरे साथ उसी स्कूल के पढने वाले कुछ पुराने लोग भी थे जिनमे 2 लोग ऐसे थे जिनके साथ की मेरी अच्छी दोस्ती थी। हम तीन उस समय के 3 idiots थे। फिल्म के तीनों पात्रों से सब की तुलना नहीं करना चाहूँगा और न ही किसी एक को किसी एक ख़ास पात्र से जोड़ना ही चाहूँगा। अगर किसी को रैंचो का किरदार दे दूं तो शायद ये उन बाकी बचे 2 लोगो की क्षमताओं के साथ नाईंसाफी हो जाएगी। हम तीनों में हर पात्र की कही न कही कोई झलक जरूर मिलती थी।

खैर, हम 3 idiots साथ में एक ही बेंच पर बैठा करते थे। कभी हमारे मन में एक दुसरे के प्रति जातीय भेदभाव की भावना नहीं आई थी मगर फिर भी बिहारी होने का एहसास उम्र के साथ हमारे परिपक्व हो रहे दिमाग को हो रहा था। इसी एहसास का कारण था कि एक दिन हमने आपस में एक दुसरे की जाति पूछ डाली। ये अजीब संयोग ही था कि हम तीनों समजातीय ही निकले। इस बात को जोर देकर यहाँ पर कहना चाहता हूँ कि हमारी दोस्ती में कोई बदलाव नहीं आता अगर हमें ये पता चलता कि हम एक जात के नहीं हैं मगर फिर भी, इस बात से इनकार भी नहीं करना चाहता कि ये जानकर कि हम समजातीय है हमारी दोस्ती और प्रगाढ़ हुई।

क्लास में सुबह का पिरीयड शुरू होने वाला था। हम सब प्रार्थना सभा से तुरंत क्लास में लौटे ही थे और हमारे क्लास टीचर का भी आगमन हो चुका था। रोल कॉल हो रहा था कि तभी दरवाजे से एक पतली सी आवाज आई, "May I come in sir"। हमारी नजरें उस पतली आवाज की तरफ दौड़ गयी. एक 5 फीट 1-२ इंच लम्बी, कुछ हद तक गोल-मटोल लड़की, छोटी छोटी आँखों पर मोटे मोटे चश्मे लगाये हुए क्लास टीचर के जवाब का इन्तेजार कर रही थी। ग़ालिब की रुबाईयां हों या खय्याम के गीत, आपको खूबसूरती के कही बेहतर नज़ारे कई जगह मिल जायेंगे। कही से भी कोई आकर्षण वहा मौजूद नहीं था मगर फिर भी आखिर हम तो थे मर्द ही। नयी नयी चढ़ रही मर्दानगी का ही असर था कि कही भी कोई ढंग की लड़की देखते ही घंटियाँ बजनी शुरू हो जाती थी। कुछ ऐसा ही उस दिन भी हमारे साथ हुआ।

वो लड़की क्लास के अन्दर आई और क्लास टीचर को बताया कि उसका नया नया एडमिशन इस सेक्शन में हुआ है। तब तक हमारे बीच बाते होने लगी थी कि साली आखिर है कौन। नाम जानने की उत्सुकता ने हमें उसके और हमारे टीचर के बीच हो रहे वार्तालाप को सुनने पर मजबूर कर दिया। अंततः उस वार्तालाप में हमें उसका नाम पता चल ही गया। नाम सुनना ही क्या था कि हम में से एक ने कहा, "रे साला! जाते बहिन है।" "बहिन मत बोल बे साले। जब देखो तब जिसको मन तिसको साला बहिने बना लेता है," मेरा जवाब था। जाति-बोध का एक ज्ञान किसी के उपनाम (title) से उसकी जाति का अंदाज लगाना भी होता है। बिहारी परिवेश में पले बढ़े होने के कारण हम इस ज्ञान के काफी धनी थे। हालांकि उपनाम से जात का अंदाज शत प्रतिशत सही तो नहीं होता मगर ज्यादातर सही ही लग जाता है। खैर, मेरा अपने दोस्त को ये जवाब देना ही काफी था कि मुझे उसके साथ जोड़ने में वे दोनों शुरू हो गए। हमने भी शर्माने लजाने से बेहतर इसे स्वीकार कर लेना ही समझा हालांकि कही से भी ऐसी कोई भावना मेरे मन में नहीं आई थी।

बात आई गयी हो गयी। हम सब भूले तो नहीं थे इस बात को मगर इसे पीछे छोड़ कर काफी आगे बढ़ गए। 12वी में पहुंच चुके थे। Physics की क्लास हो रही थी। गुरुदेव, जिन्हें हम प्यार से 'कप्पूआ' बुलाया करते थे, वो क्लास ले रहे थे। उनके tuition के ऑफर को ठुकराना मेरे लिए काफी भारी पर रहा था क्युंकि हर क्लास में उनके निशाने पर मै ही हुआ करता था। किसी न किसी बहाने से मुझे बेईज्जत करना उनकी आदत बन चुकी थी और उनके ही बाण उन्ही पर वापस चलाना मेरी काबिलियत में शुमार हो चुका था। Physics के सिद्धांतों को समझाने में उनके कई सारे उदहारण सीधे मेरी इज्जत को भेदते हुए चले जाते थे। उन्ही में से एक था एक बार मुझे बाप बना देना किसी काल्पनिक पात्र 'पप्पू' का। बस क्या था मिल गया मेरे दोस्तों और पूरे क्लास को मेरा मजाक उड़ाने का एक जरिया। मैं बन चुका था पप्पू का बाप। कुछ समझदार दोस्तों ने उसकी मां के बारे में सवाल उठाने शुरू किये। शुरू हो गयी पूरे स्कूल में पप्पू के माँ की खोज। बाप यहाँ बैठा अपनी बेईज्जती पर मन ही मन आंसू बहा रहा है, बेटे के अस्तित्व का कोई अता पता नहीं है, और फिर भी तलाश जारी है उसकी माँ की।

ये सब चल ही रहा था कि हम तीनो में से एक को एक साल पहले घटी उस घटना की याद आ गयी जिसमे उन्होंने मुझे उस लड़की के साथ जोड़ा था। बस क्या था मिल गयी मेरे दोस्तों को मेरे पप्पू की मम्मी। पप्पू के बाप से एक बार पूछा भी नहीं गया कि उसे पप्पू की मम्मी पसंद थी या नहीं। बस दोस्तों को पसंद आ गयी और हो गया काम। हमने एक बार फिर इनकार करने से बेहतर इसे स्वीकार कर लेने को ही समझा। सोचा ऐसा करने से मेरे ऊपर ब्यंग्य के बाण कम चलेंगे। हुआ भी ऐसा ही। आखिर हमने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली थी। बस क्या था, इधर दोस्तों को मेरी स्वीकृति मिली और उधर उन्होंने उस लड़की का पंजीकरण मेरे साथ पप्पू के मम्मी के तौर पर करा दिया। अगले ही दिन लड़को के द्वारा वो लड़की अपने नाम से कम और पप्पू की मम्मी के रूप में ज्यादा जानी जाने लगी। बात सिर्फ यही तक नहीं रुकी, उस लड़की की एक सहेली भी थी जिसे पप्पू की मौसी का नाम दे दिया गया था। पप्पू की मम्मी से ज्यादा उसकी मौसी ही फेमस हो गयीं थी। कई लोग ऐसे थे जो पप्पू की और उसके मम्मी और मौसी के उपज के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे मगर फिर भी वो मौसी को मौसी के रूप में ही जानते थे। हालत आज भी कुछ ऐसी है कि मुझे पप्पू की मौसी का असली नाम नहीं याद।

पप्पू को मम्मी भी मिल गयी और साथ में एक मौसी भी मगर फिर भी पप्पू का बाप अकेला ही रह गया। कभी उस लड़की से कोई बात नहीं हुई। दोस्तों का मनोरंजन करने के लिए कभी कभार कुछ हरकतें उसकी ओर कर भी दिया करता था मगर मन में कुछ भी न था। पप्पू कही न कही मन में जरूर ज़िंदा था और इसलिए उसके माँ की तलाश भी मन ही मन में जारी थी। कॉलेज तो इस सोच के साथ आया था कि यहाँ इधर उधर भटकना नहीं है और इसलिए शुरूआती दिनों में कभी पप्पू के बिन माँ के होने की पीड़ा को ज्यादा तवज्जो नहीं दे पाया। मगर धीरे धीरे वक़्त के साथ सब कुछ बदला। अपनी प्रेम-कहानी का ज़िक्र पिछले पोस्ट में कर चुका हूँ। इसी प्रेम कहानी के साथ पप्पू के माँ की खोज भी समाप्त हो गयी..........

9 comments:

Rahul said...

hmmmm ... Interesting !!!!!!
kaun thi pappu ki mummy ????

Aashu said...

@rahul: Dear, now at least you dont ask who was she......

Rahul said...

kyo bey ???
okay if nt her name den giv sum hint at least , i ll guesss !!!!

Aashu said...

Ok! u might not be remembering her quite well since u couldn't attend school in 12th. She was Shreya Sharma!

Rahul said...

yeah ... only faint memories of her !!
keeep posting nostalgic events ... feels goood . [:)]

मनोज कुमार said...

बेहतरीन। लाजवाब।

Anonymous said...

nice one, i just added up lots of bran-new emo backgrounds 4 my blog
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werewolf said...

are kya mast likhta hai tu .maaza aa gaya

Anonymous said...

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