Friday, June 25, 2010

माँ ऐसी ही होती है, थोड़ी सी सीधी, थोड़ी अजीब होती है

ये कविता यूँही बैठे-बैठे कल रात माँ को सोच कर लिख दिया। लिखने के बाद हिम्मत नहीं हुई इसे पोस्ट करने की। समझ नहीं आ रहा था कि कैसा लिख पाया हूँ। कवियों के बारे में सुनता हूँ कि कोई उनकी कविता सुनने वाला नहीं मिलता, पर मेरे साथ बात कुछ अलग थी। किसी को सुनाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। अंततः, मैंने अपनी 'उन्हें' सुनाने का निर्णय लिया। डर तो था कि पता नही मेरी कविता सुनकर कही भाग न जाए पर अपने प्यार पर भरोसा रखकर रिस्क ले ही लिया। सुनकर वो कुछ भी नहीं बोली, मैं डर गया था। लगा जैसे अपने प्यार पर मेरा भरोसा गलत था, तभी फ़ोन पर उधर से आवाज आई, 'सुनो ना! कविता के नीचे मेरा नाम लिख देना', और साथ में एक ठहाका भी आया। नाम तो नहीं लिख रहा हूँ पर गुजारिश करता हूँ कि आप उसके नाम से ही पढ़ें इस कविता को! हा हा हा!


माँ! मैं बाहर जा रहा हूँ,
कहाँ जा रहा है?
दोस्तों के साथ जा रहा हूँ,
कुछ काम है या यूँही?
बस ऐसे ही घुमने फिरने,
आने में तो देर ही होगी तुझे,
इंतज़ार तो नहीं ही करना होगा मुझे,
खाना तो बाहर ही हो जायेगा
कोई बात नहीं चूल्हा आज फिर नहीं जल पायेगा,
खाने की मेज़ आज फिर नहीं सज पाएगी,
आज फिर तेरी माँ यूँही कुछ भी खा के सो जाएगी।

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आ गया तू, बड़ी देर कर दी,
दोस्तों के साथ हो गयी मस्ती?
हाँ माँ थोड़ी देर हो गयी,
उम्मीद से ज्यादा दोस्तों से मुलाक़ात हो गयी।
जानती है माँ, बड़े पुराने यार थे वहां,
लौट आया हमारे बचपन का वो सारा जहां।
ज़रा इधर आ तो, नशा तो नहीं किया न,
सिगरेट, शराब तो नहीं पी, गुठका तो नहीं खाया न?
माँ तू भी न, देख ले कुछ नहीं किया मैंने
विश्वास रख, इतनी जल्दी तेरी दिखलाई राह से नहीं भटकूँगा
तुझसे लडूंगा, जिरह करूँगा, मगर तेरा विश्वास नहीं तोडूंगा।

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क्यूँ रे आज दिन में खाना खाने नहीं आया,
फिर कहीं से कुछ ऐरा गैरा खा आया?
कल ही तो पेट खराब हुआ था, मानता क्यूँ नहीं,
बाहरी चीज़ें खराब होती हैं जानता क्यूँ नहीं।
माँ, तू फिर शुरू हो गयी, भूख लगी है कुछ खाना तो दे
अरे फिल्म देखने गया था, कुछ बोलने का मौका तो दे।
किसके साथ गया था?
दोस्तों के साथ।
लड़कों के साथ या लड़कियों के?
माँ, मेरा खाना नहीं पच सकता बिना तेरी झिडकियों के!
क्यूँ लड़कियों के साथ कभी नहीं जाता?
क्या सोचता है मुझे कुछ समझ नहीं आता?
कल ही तेरी जेब में ये कान की बाली मिली है,
मुझे नहीं पता चलेगा, क्या सोचता है माँ इतनी भोली है?
अरे माँ हूँ तेरी, तेरी सांस तक की गिनती जानती हूँ,
तेरी हर एक हरक़त को पहचानती हूँ,
क्या छुपाता है मुझसे,
क्यूँ कुछ कह नहीं पता है मुझसे
बता न, बता न।
खैर न बता न सही
सोच लेना, कहीं पापा बुरा मान जाएँ नहीं।
आगे पीछे की सोच लेना,
घर में लड़की लाने के पहले, थोड़ी हमारे बारे में भी सोच लेना।
बड़ा हो गया है तू,
सोच सकता है तू,
हमारी इज्ज़त की न सही, लड़की के इज्ज़त की सोच लेना।
माँ! खाना खा लूं???
थोडा रुकेगी तो एकाध सांस ले लूं!

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क्या हुआ माँ, गुस्से में लग रही है,
क्या हुआ दिसम्बर की सर्दी में क्यूँ तप रही है?
अरे कुछ नहीं, यूँही पड़ोसन से अनबन हो गयी
तुझे लेके उससे बकझक हो गयी।
वो बोल रही थी कि दोस्तों के साथ हुल्लड़बाजी कर रहा था तू,
और एक दिन सिगरेट पीकर धुंआ उड़ा रहा था तू।
एक दिन किसी लड़की के साथ भी देखा था तुझे,
जाने क्या क्या बता रही थी मुझे।
मुझसे रहा नहीं गया,
सारा गुस्सा वहीँ निकल गया।
तू भी न माँ, बड़ी अजीब है,
समझ में नहीं आता तू क्या चीज है।
रोज़ देर से आने पर पता नहीं मुझे क्या क्या सुनाती है
और जब दूसरा ये बातें करता है तो भड़क जाती है।
तू भी न माँ, बड़ी अजीब है,
समझ नहीं आता तू क्या चीज़ है।
माँ हूँ न रे, ऐसी ही हूँ,
तो क्या हुआ थोड़ी अजीब हूँ,
मैं कुछ भी कहूं अपने पूत को
कोई क्यूँ कपूत कहेगा मेरे सपूत को?
माँ ऐसी ही होती है,
थोड़ी सी सीधी, थोड़ी अजीब होती है

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