Wednesday, November 24, 2010

नीतीश कुमार की जीत: वक़्त ख़ुशी मनाने का या आगे देखने का?

बिहारी चुनाव समर आज आखिरकार अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँच गया. वोटों की गिनती और परिणाम घोषित होने के साथ पूर्ण बहुमत की सरकार बनने का रास्ता साफ़ हो गया. नीतीश कुमार नीत जदयू-भाजपा गठबंधन की सरकार के शपथ लेते ही एक महीने से चल रही इस पूरी लीला का पटाक्षेप हो जायेगा. आज घोषित हुए ये परिणाम अपने आप में अद्भुत ही नहीं अद्वितीय मालूम पड़ते हैं. नीतीश कुमार के पिछले 5 सालों के विकास-राज ने आज लालू यादव के गुंडा-राज को अंततः दफ़न कर दिया. बिहार की राजनीति में ऐसा पहले कभी न हुआ होगा जब जात-पात को छोड़कर इस तरह की वोटिंग हुई हो और ऐसा जनादेश मिला हो.
'70 के दशक में इंदिरा गाँधी के तथाकथित तानाशाह और उसके बाद इमरजेंसी के विरोध में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में एक बयार बिहार समेत पूरे देश में चली थी जिसका नतीजा केंद्र में पहली दफा गैर-कांग्रेसी सरकार के रूप में आया था. हालांकि जेपी आन्दोलन अपने आप को देश भर में दीर्घकालिक नहीं बना सका था मगर बिहार की राजनीति में इसका प्रभाव लम्बे समय तक आने वाला था. इसी छात्र आन्दोलन की देन बिहार को लालू यादव और नीतीश कुमार के रूप में मिली जो इस विधानसभा चुनाव में एक दूसरे के खिलाफ खड़े थे. ये चुनाव सिर्फ दो पार्टियों की लड़ाई नहीं थी मगर छात्र आन्दोलन के दो धुरी रहे इन दो नेताओं की साख की लड़ाई थी. एक ही विचारधारा से जुड़े राजनीति में कदम रखने वाले इन दो नेताओं की राहें आज इतनी जुदा हो चुकी हैं जिसका अनुमान आज के चुनाव परिणाम से ही लगाया जा सकता है.
'90 के दशक में कांग्रेस को हराकर सत्ता पर काबिज होने वाले लालू यादव ने एक भूल कर दी थी. जिस तानाशाही का विरोध करके उन्होंने राजनीति में अपनी पहचान बनायीं थी, वो खुद उसी तानाशाही की तरफ बढ़ने लगे थे. 'जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेगा बिहार में लालू' का नारा तक देने में उन्हें उस जनता की याद नहीं आई थी जिसने उन्हें सर आखों पर बिठाया था. बिहार को अपनी बपौती और बिहारियों को अपनी प्रजा समझने की भूल उन्हें 2005 में अपना राज खोकर चुकानी पड़ी. 15 साल से रुके हुए बिहार की इंजन को दुरुस्त करके उसे पटरी पर लाने का एक असाधारण काम नीतीश कुमार ने अपने 5 सालों में कर दिखाया. जिस विकास की बयार नितीश कुमार ने बिहार में इन पांच सालों में बहाई उसका नतीजा आज एक स्पष्ट जनादेश के रूप में उन्हें मिला है.
हर ओर बिहार में आज ख़ुशी का माहौल है. दो तिहाई बहुमत की बात तो छोड़ ही दी जाए, यहाँ तो नौ-दहाई के आसपास का बहुमत एनडीए गठबंधन को मिल चुका है. एक असाधारण फैसला ही लगता है. बिहारी जनता की बात करें तो हर कोई इस विकास की गाड़ी को आगे चलते देखना चाहता था मगर मन में कही न कही इसके ठोकर खाकर रुक जाने का डर सताया हुआ था. आज का ये फैसला उनके डर को सिर्फ समाप्त ही नहीं करता मगर एक नए बिहार के निर्माण के सपने का बीज भी बो रहा है. बिहारी जनता खुश है विकास की इस जीत को देखकर.
ऐसे स्पष्ट जनादेश का मतलब बहुत साफ़ है. नीतीश कुमार के किये गए कामों को हर जगह से स्वीकृति मिली है. मगर सवाल ये है कि कही ऐसा जनादेश देखकर खुद नीतीश बाबु ही अपने आप को न संभाल पाए. कई बार उम्मीद से अधिक मिल जाने पर मन बावला हो उठता है. अगर ऐसा ही कुछ हो गया तो शायद बिहार के लिए इससे बुरी बात और कुछ नहीं रह जाएगी. जिस गफलत का शिकार लालू हो गए थे अगर उसी ने नीतीश को घेर लिया तो अनुमानों से परे नुकसान बिहार को उठाना पड़ सकता है. ऐसा भी हो सकता है कि नीतीश ऐसे जनादेश को देखकर कुछ सुस्ताने की सोच बैठे. जनता का समर्थन अपने ओर देखकर अगर वे निश्चिंत हो गए तो शायद फिर कभी कोई बिहारी निश्चिंत नहीं हो पायेगा. ऐसे में इस जीत पर ख़ुशी मनाकर शायद हम एक भूल कर रहे हैं, समय-पूर्व ख़ुशी मनाने की. ये समय ख़ुशी मनाने का नहीं, आलोचनाओं का है. नीतीश की पिछले 5 सालों में नाकामियों को गिनाने का है और आगे की जरूरतों पर रौशनी डालने का है. समय है नीतीश कुमार को जगाये रखने का, अपनी तरक्की की और विकास की ओर ध्यान लगाये रखने का.

 

8 comments:

Vishal Sinha said...

best written :)

Rahul said...

until last para, the article was kind of being part of flock.
Well concluded in last few lines.

maheshwar said...

यह एक राजनीतिक पार्टी की जीत नहीं बल्कि सच्चाई और प्रतिबद्धता की जीत नहीं है. इस नई पीढ़ी और उत्पादक विचार की जीत है. और मैं एक और बात का उल्लेख करना चाहता हूँ , बिहार के मतदाताओं ने फिर से उनके क्रांतिकारी साहस और क्षमताओं औचित्य किया है और बिहार जाति की राजनीति की पारंपरिक प्रवृत्ति को तोड़ते हुए विकास की राजनीति की एक नई क्रांतिकारी विचारों को विकसित किया हैं और यह इस आधुनिक युग की राजनीती में एक मील का पत्थर साबित होगा और सभी प्रान्त की जनता इस बारे में अवश्य चिंतन करेगी. और आज के परिणाम देख के तो यही लग रहा है की बिहार की भूमि से एक और नई विचारधारा का जन्म हुआ है.

मनोज कुमार said...

यह अवसर खुशी मनाने का ही है। आगे देखने की नीतियों के कारण ही तो यह आया है। हम तो ७७ के बाद पहली बार किसी चुनाव के परिणाम (बिहार के संदर्भ में) के कारण खुश हैं।
इस बार हमें अपनी बिहारीनेस पर नाज़ है। पूरा देश इस परिणाम से सीख ले।

ranjeeta said...

Nice post with fabulous last paragraph..........

Some irrelevant points for you...

1. In large areas voting pattern was fully on caste lines. It is a different matter that the Lalu's equation didn't scored on turf as expected by him.

2. J P Andolan was not against Emergency, in fact, it was the Sampoorna Kranti, Total Revolution, which was the prime reason behind the Emergency.

3. Total Revolution was not omnipresent in the whole country as mentioned by you. In fact, it is a paradox that the area which came under the influence of J P was subsequently become a backward one, saving Kernataka. A revolution without any ideology always gives disgusting result. That was what happened with JP Andolan.

4. The Bihar election was not fought mainly between two parties, but between two alliances.

5.

Aashu said...

@vishal, @rahul, @maheshwar, @manoj: thanks everybody for your support!

Aashu said...

@"ranjeeta": :), first of all thanks for the appreciation. Must tell you that all your points are relevant for me! hehehe! Let me reply with little bit of knowledge that is not quite mine but I somehow managed to gain over the years.... :)

1. I never said that with this election in Bihar, casteism has got a setback here. No, it can never be in Bihar. For me, I have suffered the casteism the most in last five years. So that's never been my point!

2. Totally agree to your point that JP andolan led to the emergency but there I also mentioned about the, so-called dictatorship of Indira Gandhi which led to a situation where he had to initiate the Bihar Revolution (later known as Total revolution).

3. I never mentioned that Total revolution was omnipresent nationwide. What I wanted to say was that this revolution gave an idea to the nation that even a non-congress govt can be formed at the centre. Indira Gandhi's congress lost the elections post-emergency but the changes were only shortlived, as only 3 years later Indira came back with a similar mandate that Nitish has got here!

4. In the present day situation, where the politics in India has limited itself to the regional parties, the authenticity of the party system has been decreasing day by day. Alliances have been formed, and fortunately, are being carried forward with some sort of consistency. In such a situation, the two alliances can well be taken as parties, though, I firmly admit my mistake there!!!

5. ???

(Disclaimer: My knowledge of history or politics is too mediocre and when it comes to the regional politics, it is somewhere near a zero. So, Bhaavnaon ko samjhe!!! hehehe)

xvivek said...

Yah wakt aage dekhne ka hi hona chahiye, Kyonki Asli Khusi to isi me hai, agar nitish Ji hum Janata ke kasauti par apne samay ke pahle din se khare utre to agle vidhan sabha chunao ke natije kahin 100 phisadi na ho jaye,

Is sarthak bahas ke liye Dhanyawad, AApke isi lekh ko Aapke naam Ke saath Koshi Ke online Portal www.KoshiLive.com par editorial me Jagah di gayi Hai,

Dhanyawad,
Editor
www.KoshiLive.com