Thursday, June 19, 2008

एक बार फ़िर...........

My first attempt at writing something that can be called a literary work ended in a disaster for me……. “Dil Chahta Hai”……………….This is my second attempt towards this and the first in the field of short stories………..Hope, this time you won’t be disappointed………………..



कमरे
के रोशनदान से डूबते हुए सूरज की आखिरी किरणें अन्दर रही थी. दिवार से लगी आराम कुर्सी पर बैठी अवंतिका कुछ सोच रही थी. 27-28 साल की अकेली लड़की इस छोटे से कस्बे के इस कमरे को किराये में लेकर रहती थी. यहाँ उसका कोई था. बचपन से ही वो अनाथ अकेली ही रही थी. अब तो जिंदगी में अकेले रहने की आदत हो गई थी. यहाँ भी उसे अपना कहने वाला कोई नही था. किसी से भी उसकी कभी कोई बात नही हुई थी. मानो वो किसी से बात करना ही नही चाहती थी. ऐसे ही सबसे अलग रहकर वो अपनी जिंदगी गुजार रही थी. वैसे भी मिलिटरी कैंट के अलावा इस कस्बे में और था ही क्या.सुबह उठकर मील दूर अखबार के एक दफ्तर में typist की नौकरी करने जाती थी. दिन भर काम करके शाम को वो वापस आती थी.

रोज़ की तरह वो आज भी उसी सब्जी मंडी वाले रस्ते से होकर लौट रही थी. वो सब्जी खरीदने के लिए वहीँ ठहर गई. “ये परवल कैसे दिए?”,सब्जी वाली से उसने पूछा. “16 रुपये किलो मालकिन”. पाव परवल तौलने के लिए कहकर अवंतिका की नज़रें यूँही इधर उधर दौड़ने लगी. थोरी दूर सड़क के उस पार बस स्टाप पर उसकी नज़र जैसे ठहर गई मानो किसी चेहरे को पहचानना चाह रही हो. तभी सड़क से मिलिटरी की गाड़ियों का एक काफिला गुजरने लगा. गाड़ियों की बिच से उसकी नज़रें उसी चेहरे को देखने की कोशिश कर रही थी. तभी सब्जी वाली की आवाज़ उसके कानों में पहुची, “हाँ मालकिन ये लो अपने पाव परवल.” उसे उसके पैसे देकर अवंतिका आगे बढ़ी. अभी भी उसकी नज़रें उसी चेहरे को खोज रही थी. काफिले के ख़त्म होने के बाद फ़िर वो उस चेहरे को नही देख पाई. मगर उस चेहरे की पल भर की झलक ने ही उसे उसकी यादों की तरफ़ जाने को मजबूर कर दिया. तेज़ क़दमों के साथ वो अपने कमरे में वापस गई.

धीरे-धीरे अँधेरा होने चला था, शाम ढल रही थी, सूरज डूब रहा था और चांदनी अपनी चादर से इन वादियों को ढक रही थी. अवंतिका जैसे अपनी कुर्सी में बैठी कहीं खो सी गई थी. वहीँ पर बैठी बैठी वो -१० साल पहले मसूरी के अपने कॉलेज के दिनों को याद करने लगी. इंग्लिश के प्रोफ़ेसर क्लास में बैठे विद्यार्थियों पर shakespere की कोई छाप छोड़ने की कोशिश कर रहे थे . बाहर काफ़ी मूसलाधार बारिश हो रही थी. अवंतिका हर रोज़ की तरह उस दिन भी अकेली ही खिड़की के बगल वाली बेंच पर बैठी थी. वहां भी उसका कोई दोस्त था. बारिश के फुहारे हवा के ठण्ड झोकों के साथ रह-रह कर उसके पास आकर उसके मन को अपने साथ बाहर ले जाने का प्रयास कर रहे थे. Shakespere के शब्दों और प्रकृति की पुकार के बिच एक अनोखा द्वंद्व अवंतिका की आंखों के सामने चल रहा था. क्लास में बैठ कर प्रोफ़ेसर की बातों की तरफ़ अपने आप को एकाग्र करने की उसकी हर कोशिश नाकाम हो रही थी.

तभी बाहर से बारिश की पानी में भींगता हुआ एक हट्टा-कट्टा गबरू जवान क्लास के अन्दर आया और आकर अवंतिका के सीट के बगल में बैठ गया. अवंतिका के लिए एक नया अनुभव था क्यूंकि उसके साथ आजतक कॉलेज में कभी कोई नही बैठा था. वो हमेशा अकेली ही बैठा करती थी. उसे कभी किसी से दोस्ती ही नही हुई थी शायद इसीलिए कोई उसके साथ नही बैठा करता था. उसे उस दिन बार ही आश्चर्य हुआ. अब बारिश की फुहार और shakespere के शब्द दोनों उसके पास अपनी कोई छाप छोड़ने में नाकाम हो रहे थे. उसका सारा ध्यान उस अजनबी पर चला गया था जो अचानक हवा के झोंके की तरह आकर उसके बगल में बैठ गया था. चाहते हुए भी उसकी नज़रें उसे एकबार अच्छे से देखने को बेताब हो रही थी. अवंतिका का ध्यान अपने क्लास के लड़के-लड़कियों की तरफ़ कभी नही गया था मगर आज एक अजनबी के आने से अचानक जाने उसे क्या हो गया था. उसे ख़ुद भी ये सब कुछ अटपटा लग रहा था. क्यों एक अजनबी की तरफ़ वो ऐसे बहकी जा रही थी. क्या था उस अजनबी में जो उसे अपनी और खींचे जा रहा था. उसकी समझ में कुछ भी नही रहा था.

क्लास ख़त्म होने के बाद उस नए लड़के का परिचय पूरे क्लास के साथ हुआ. उसका नाम आकाश था. वो मसूरी के पास ही किसी गाँव का रहने वाला था और कॉलेज में admission अभी कुछ दिन पहले ही हुआ था. वो कॉलेज में नया था. उसके बाद से हर रोज़ अवंतिका की आँखें क्लास में उसे ही खोजा करती थी. जब तक वो नही जाता था तब तक उसे चैन नही आता था. वो आता और आकर अवंतिका की साथ वाली सीट पर बैठा करता था. अवंतिका उस से बात करने के लिए बेकरार रहती थी मगर कभी उसे हिम्मत नही हुई. और सभी लड़कों से आकाश की बात होती थी. अवंतिका उन बातों को बरे ध्यान से चुपके-चुपके सुना करती थी. उसी से उसे पता चला था की वो एक गरीब अकेली बीमार माँ का अकेला लड़का था. हर हफ्ते आकाश को अपनी बीमार माँ के पास अपने गाँव जाना पड़ता था. बाकी दिन वो कॉलेज के हॉस्टल में ही रहता था. पढ़ने में काफ़ी अच्छा था और मिलिटरी में जाना चाहता था.

कई दिन बीत गए थे. आकाश यूँही अवंतिका के साथ वाली सीट पर बैठा करता था. कभी उन दोनों की बात नही हुई थी मगर अवंतिका उस से बात करना जरुर चाहती थी. एक दिन अचानक आकाश ने ही उस से बात की. शायद वो भी उस से बात करना चाहता था. उस दिन अवंतिका की बेकरारी थोड़ी कम हुई. धीरे धीरे उन दोनों के बिच अच्छे से बातें होने लगी थी. अवंतिका के मन में बातों का सैलाब उमरता रहता था मगर वो इसे बाहर निकलने से हमेशा डरती रहती थी. उसकी बेचैनी उसकी सबसे बरी दुश्मन बन चुकी थी. अपनी दबी हुई सारी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए जहाँ एक और वो बेताब थी वहीँ दूसरी और हिम्मत जुटाने में वो हमेशा नाकाम ही रहती थी. उसकी नाकामी उसे खाए जा रही थी.

समय बीतने के साथ सब कुछ बदलता जा रहा था. आकाश की अब क्लास में सब लोगों से अच्छी दोस्ती हो चुकी थी. वो पूरी तरह से इस नए माहौल में घुल-मिल सा गया था. अवंतिका से भी उसकी बातें हुआ करती थी. अगर कुछ नही बदला था तो वो था आकाश का अवंतिका के साथ बैठना और फ़िर भी अवंतिका की अपने दिल की सारी बातें कह पाने की नाकामी. शायद अवंतिका ने ही अपने आप को रोके रखा था. एक अनजाने डर ने उसके मन में घर कर लिया था. वो ख़ुद ही आकाश के दिल में रहना चाहती थी मगर कुछ था जो उसे अपनी इस भावना को व्यक्त करने से रोक रहा था. दोनों काफ़ी समय एक दूसरे के साथ बैठते थे, बातें करते थे. दोनों का काफी समय साथ में गुजरा करता था. इन सब के बावजूद अवंतिका कभी भी खुल कर आकाश से बातें नही कर पाती थी. उसका दिल पूरी तरह से आकाश का हो चुका था. उसे ऐसा लगने लगा था की आकाश भी शायद उसे पसंद करता था मगर उसी की तरह ही उसे भी हिम्मत नही होती थी कुछ कहने की. ये अवंतिका का सिर्फ़ ख्याल था या फ़िर आकाश की एक सच्चाई वो तो सिर्फ़ आकाश ही जानता था मगर इसने अवंतिका को प्यार के रिश्ते के बरे में कुछ सोचने को मजबूर कर दिया था.

अवंतिका ऐसे किसी रिश्ते के पूरे होने या उसके अंजाम तक पहुचने के बरे में चिंतित रहती थी. क्या ये सही है? क्या इसका अंजाम सही होगा? कहीं उसे बाद में पछताना पड़े? इन सब सवालों ने अवंतिका के कदमो को बाँध सा दिया था. चाहते हुए भी उसने आकाश से अपनी दूरी बढ़ाने का निर्णय कर लिया. मगर क्या ये आसान था? साल भर की अपनी दोस्ती जो शायद दोस्ती से कुछ ज्यादा हो चुकी थी, उसे यूँ पल भर में छोड़ देना, ख़त्म कर देना क्या किसी के लिए इतना आसान हो सकता था? उसने ज्यादा कुछ नही सोचते हुए निर्णय लिया की वो आकाश के साथ रहने के बावजूद भी उसके बारे में अपने दिल में कोई ख़याल नही लाने की कोशिश करेगी. कामयाबी का उसे कोई विश्वास नही था मगर कोशिश करने की एक मजबूरी जरुर थी.

दोनों के साथ रहते लगभग साल भर बीत चुके थे. उसने अपने निर्णय को पूरी तरह से अबतक निभाया था मगर आकाश के साथ उसकी नजदीकी दिनोदिन भरती ही जा रही थी और साथ में आकाश के लिए उसकी कमजोरी भी. उसे अब अपने आप को रोके पाना मुश्किल होता जा रहा था. कई रातें उसने यूँही जगे हुए गुजार दी थी अपने मन में चलते हुए द्वंद्व के कारण. उसका दिल हमेशा उसके दिमाग की सोच को धोका देना चाह रहा था. वो आकाश को सब कुछ बता देना चाहती थी मगर उसके शब्द हर बार होठों तक आकर रुक जाते थे. शायद उसकी जबान पर अभी भी उसके दिमाग का दिल की तुलना में जायदा जोर चल रहा था. आकाश ने भी कभी उस से ये बातें नही की थी. अवंतिका को ये डर भी था की कहीं उसके सब कुछ बोल देने से कहीं आकाश उस से दूर चला जाए. कभी यह भी सोचती थी की ही बोल कर कौन सा आकाश उसके पास है.

अभिव्यक्ति के इस तूफ़ान में अवंतिका कहीं खोयी सी जा रही थी. आकाश से उसकी एक पल की जुदाई भी अब उसकी जान निकल देने के लिए काफी हो चुकी थी. वो हमेशा अपने-आप को आकाश के सामने रखना चाहती थी. हमेशा उसकी आँखें आकाश को देखने के लिए ही बेताब रहती थी.

आजकल आकाश जाने क्यूँ रोज़ क्लास नही आया करता था. अवंतिका की आँखें अक्सर तरसती ही रह जाती थी आकाश की एक झलक तक देंखने को. बहुत हिम्मत करके एक दिन अवंतिका ने आकाश से इसका कारण पूछा. पता चला की उसकी माँ की तबियत थोड़ी बिगड़ गई थी. अवंतिका के मन में चल रहे द्वंद्व में उसके दिल ने उसके दिमाग पर जीत हासिल कर ही लिया था. उसने आकाश को अपने दिल की बात बताने का निर्णय कर लिया था. बहुत हिम्मत करके अवंतिका ने आकाश को बताया की वो उस से कुछ कहना चाहती थी. आकाश ने इस बात की तरफ़ कोई ख़ास तवज्जो नही दी. शायद उसकी माँ की तबियत के बारे में उसके चींते के सामने उसने अवंतिका की इस बात को कोई ख़ास वजन नही दिया था. लंबे चले उस द्वंद्व के बाद जुटाए हुए अवंतिका के हिम्मत को आकाश की इस बेरुखी ने एकदम ही पूरी तरह से तोड़ कर रख दिया. अब तो अवंतिका के लिए कुछ भी कहना मुश्किल हो रहा था. उसके मन में रोज़ एक नया तूफ़ान उठ खड़ा होता था मगर आकाश की बेरुखी को देखकर वो ख़ुद इस तूफ़ान को दबा देती थी. अब तो इस तूफ़ान को दबाना भी उसके लिए भारी पड़ता जा रहा था.

एक रात पढ़ते पढ़ते अचानक ही उसने निर्णय लिया की आकश की बेरुखी के बावजूद भी अब वो नही रुकेगी. उसका डर उसकी बेचैनी के सामने बौना बन चुका था. उसके प्यार के सामने आकाश की बेरुखी का कोई स्थान नही रह गया था. उसे पूरा यकीं था की आकाश भी उसे चाहता था. शायद ये उसकी चाहत थी की आकाश भी उसे चाहे जो उसके यकीन के रूप में बाहर रही थी. उसने चिट्ठी लिख कर आकाश को सब कुछ बताने का निर्णय कर लिया. चिट्ठी लिखने के लिए अवंतिका ने अपने notepad के पीछे से एक कागज़ फाड़ा. उसके बाद वाले पन्ने में कुछ लिखा हुआ था. इतनी दिन साथ में रहने के कारण उसे पहचानने में कोई दिक्कत हुई की वो लिखावट किसी और की नही पर आकाश की ही थी. उसने उसे पढ़ने में कोई देर नही की. उसके चेहरे से पसीने निकलने लगे थे. आंखों से आंसू एक या दो बूँद धीरे से बाहर आने का रास्ता देख रहे थे. उसे विश्वास नही हो रहा था की आकाश ने ये सब कुछ लिखा है. उसे पता नही चल पा रहा था की आकाश ने ये सब कब लिख दिया. कुछ महीने पहले आकाश ने उसकी कॉपी ली थी कुछ नोट्स उतारने के लिए. शायद तभी उसने ये सब कुछ लिख दिया था. ये सब कुछ पढ़कर वो बेचैन हो चुकी थे. खुश तो वो होना चाहती थे उस सब से जो उस चिट्ठी में लिखा था पर अपने ऊपर उसे गुस्सा रहा था. उस चिट्ठी में वो सब कुछ लिखा था जो वो अपनी चिट्ठी में लिखना चाह रही थे. ये चिट्ठी आकाश ने उस वक्त लिखी थी जब अवंतिका के मन में उन दोनों के रिश्ते को लेकर एक अनजाना सा डर, एक अजीब से द्वंद्व ने घर कर लिया था और फलस्वरूप वो आकाश से दूर जा रही थे.

अवंतिका के सामने सब कुछ पानी की तरह साफ़ हो गया था. आकाश की बेरुखी उसकी अपनी थी शायद वो अवंतिका की अपनी बेरुखी का ही परिणाम थी. अवंतिका अपने आप को ख़ुद अपना और आकाश का भी दोषी मान रही थी. उसने निश्चय कर लिया की वो अगले दिन सुबह ही कॉलेज में जाकर आकाश से सब कुछ बोल देगी. रात भर उसने करवट बदलने और सोचने में ही बिता दिए. रात भर शब्दों के साथ एक अजीब सी लड़ाई उसके मन में चल रही थी. वो समझ नही पा रही थी की आकाश के सामने वो कैसे अपनी बात रखेगी. कुछ भी हो उसने निर्णय कर लिया था की कल उन दोनों के बिच सब कुछ साफ़ हो जाएगा.

अगले सुबह इसी उद्देश्य के साथ अवंतिका कॉलेज पहुची. एक अनदेखी सी चमक उसके चेहरे पर थी उस दिन. आज जिंदगी में पहली बार उसका उतना समय आईने के सामने गुजरा था. आईने में वो अपने आप को आकाश की नज़रों में देखना चाह रही थी. पहली बार आज उसने सजने सवरने का काम किया था. सब कुछ आकाश के लिए. वो इतने दिनों से उसी की तो हो कर रह गई थी. आज तक जो दोस्ती या जो सम्मान आकाश ने उसे दिया था, वो उसके लिए पूर्ण रूप से एक नया अनुभव था. आकाश के पास जाने को उस से हर बात कह देने को वो बेताब हुई जा रही थी. क्लास में बैठी तो थी पर पढ़ाई पर उसका कोई ध्यान नही जा रहा था. हर पल उसकी नज़रें दरवाज़े की तरफ़ ही लगी थी. गलियारे में होने वाले हर क़दमों की आहट से उसे आकाश के आने का ही आभाष होता था मगर हर बार उसका दिल छोटा पर जाता था. इतना अकेलापन उसे जिंदगी में कभी महसूस नही हुआ था. शुरू से ही जिस सीट पर वो अकेली बौठा करती थी, उसी सीट पर अकेले बैठना उसे बिल्कुल अच्छा नही लग रहा था. हर पल उसका दिल भगवान से दुआ कर रहा था की आज कम से कम आज आकाश उसे मिल जाए. दिन बीत गया, कॉलेज का समय ख़त्म हो गया, आकाश नही आया. अवंतिका पलके बिछाए यूँही बैठी रह गई. अभी भी उसे लग रहा था की शायद आकाश उस से मिलने जाए. शाम हो गई, सब जा चुके थे. अवंतिका अभी भी आकाश का वही इन्तज़ार कर रही थी जहाँ वो दोनों अक्सर साथ समय बिताया करते थे. आकाश वहाँ भी नही आया. अवंतिका उस दिन के लिए हार मान चुकी थी.

हर सुबह अवंतिका इस उम्मीद के साथ कॉलेज जाती थी की शायद आकाश आज उसे मिल जाए. वो फिर कभी नही आया. कुछ रोज़ के बाद नोटिस बोर्ड पर एक नोटिस लगा था जिसमे आकाश के कॉलेज छोड़ के जाने के बारे में लिखा हुआ था. उस दिन अवंतिका की रही सही उम्मीद भी ख़त्म हो गई. उसने इस सब के लिए अपने आप को ही दोषी माना. उसने कभी अपने आप को माफ़ करने का निश्चय कर लिया था. फिर कभी उसे आकाश बारे में कोई ख़बर मिली सिवाय इसके की उसकी माँ चल बसी थी. अवंतिका आकाश के अकेलेपन के लिए अपने आप को दोषी मान रही थी. उसे लग रहा था की आकाश को वैसे बुरे समय में जरुर एक साथी की जरुरत होती जो शायद वो ही थी. मगर…………………………………………………………..


तभी अचानक दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी. खोल के देखा तो मकान मालिक का पोता आया था. उसने कमरे की बत्ती जला देने को कहा और उसे उसकी कोई चिट्ठी, जो डाकिये ने दिन में दिया था, देकर चला गया. सूरज डूब चुका था, चांदनी अपनी चादर बिछा चुकी थी, रात ने अपने पांव पसार लिए थे. सड़क पर streetlamps जल रहे थे और अवंतिका उन्हें ही देखती-देखती सोच रही थी. एक वो दिन था जब उसने अपने आप को आकाश से दूर कर लेने का फ़ैसला कर लिया था और उसका परिणाम वो अपने प्यार को खो कर भुगत रही थी. एक आज का दिन था जब फ़िर से उसे आकाश दिखा था और फ़िर से वो दूर ही रह गई थी. एक वो दिन था जब उसने उसके पास जाने का निर्णय लिया था मगर तब तक देर हो चुकी थी. एक आज का दिन था जब फ़िर से उसके पास जाने के पहले ही वो जा चुका था.एक वो दिन था जब उसने अपने प्यार को खोया था, एक आज का दिन था जब फ़िर से उसने अपने उसी प्यार को खोया.

एक बार फ़िर ...............................................................................................………………………………..

Saturday, June 14, 2008

SARKAR & Ram Gopal Varma

Finally, got the opportunity to watch “Sarkar”, a Ram Gopal Varma directed and produced film. I wanted to watch the movie ever since it’s release in 2005. I don’t know why but couldn’t watch it that time and lack of motivation since then didn’t allow to watch it till now. The motivation was back and so was my desire to watch it with the release of its so-called sequel “Sarkar Raj”.

I don’t want to say that I am a big fan of RGV films though some of my favourites in the last 10-12 years have come from his factory especially those directed by him. Be it Rangeela(1995), Satya(’98), Company(’02), Bhoot(’03) and others, all of these are, I think, the best from a long list of the RGV films.

I watched Rangeela when I had not much of the wit to understand the whole film but liked it then only and got to understand the feelings of different characters and their portrayal of an extremely common theme of a love triangle in an even-more extremely different fashion which is one of the hallmarks of the RGV films. Maybe, the other reason why I like Rangeela is the presence of Aamir Khan, my most favourite bollywood actor……….

Satya came up with the favourite subject matter of RGV, the Mumbai based world of the underworld. The title character of Satya didn’t much impress me but what did impress me was undoubtedly, Manoj Bajpayee playing the role of Bhiku Mahatre and Saurabh Shukla playing the role of Kallu Mama. I am a bit confused about whom I liked more, Manoj Bajpayee as Bhiku Mahatre or Bhiku as a character himself. I was so impressed by this character that wherever I get a chance to dance I try to impersonify his famous style of unvanquishable bindaas dance…………….

Company was again based on the same underworld, this time, a bit more realistic with the rumours(or may be the fact, you never know with RGV) that it was based on the tussle between underworld dons Dawood Ibrahim and Chhota Rajan. The powerful acting of Vivek Oberoy in his debut film is something that I can never forget. The cool, calm and firm character of the bhai played by Ajay Devgan is another highlight of the film alongwith the powerful support from Manisha Koirala and another debutant Antara Mali. The next best thing about the film after Vivek Oberoy was RGV’s direction which saw his directoial revival after some flops like Daud, Mast, Jungle and Kaun. Another reason why I liked Company was that finally, Ramu was able to get rid of Urmila Matondkar (though not completely, she appeared in a song at the starting while the castings were running).


Bhoot, an old concept of horrifying the audience in a completely new face free from the shackles of Ramsay Bros. RGV was with Urmila again and I think after 8 years of Rangeela, they were again at thier best in a combo pack. Simply the most horrifying movie I have ever seen. Maybe, many people won’t agree with this but it’s a sole opinion of mine. Mahal (Ashok Kumar, Madhubala starrer) Gumnaam (Manoj Kumar starrer, my first ever encounter with such a movie) are among others which I have seen and put among top of the list.

Now comes Sarkar, another of the RGV directed movie and a typical product of RGV Film Company. Apart from the story and the cast nothing is different. The same RGV style of making films. Apart from lead roles, the supporting cast is also quite the same. The same old breed of all the powerful actors from south and Marathi films alongwith the renowned stage performers can be seen again. Whenever you see such a cast, you, undoubtedly, can ascertain that it’s a RGV film.

Amitabh Bachchan and his portrayal of Sarkar is simply brilliant. The cool, calm yet devastating Amitabh shows a glimpse of Vijay from Deewar. Nothing much to tell about him and his acting………simply awesome…………….best part is his eyes speaking more than his tongue.

Abhishek Bachchan as Shankar, a loyal son, worthy son of worthy father, is at his lifetime best (Guru came long after Sarkar). The best part of his role comes in the 2nd half when he acts as sarkar though temporarily and starts taking revenge of his father’s attempted murder, especially the sequence after he killed his own brother and goes to his father to inform him about this. The sheer silence of all the characters says everything and then Abhishek says “मैंने भैया को मार दीया” is simply above all the sequences of the film and undoubtedly one of the best in the history of Indian films. The dialogue here was just not necessary as everything was already told from everybody eyes. The sequene is much comparabale to the silence in Vaastav when Reema Lagoo kills Sanjay Dutt or Mother India when Nargis kills Sunil dutt or Deewar after the death of Amitabh in the lap of his mother. The scene when Abhishek kills the character of Rashid (fantastically played by Zakir Hussain, who is one of the best in the cast) is also among the highlights of the movie.

Kaykay Menon is above any of the other from the cast. He has done complete justice to his character of an arrogant, stubborn, foul-mouthed Vishnu. I am short of adjectives to describe his character or his acting and I am sorry about this, I can’t help.

Supriya Pathak Kapoor, the dikhayi diye yun fame actress is among the finest actors in the industry and she has acted in the film as simply brilliant as she always does. I remembered her for “Jaane Bhi Do Yaaron” but now I will remember her for “Sarkar”. She has used her eyes to speak as if there is no place for tongue for her. She is superb………….

Katrina Kaif as pooja has not to do much in the film but to whatever she has to do she has done justice. Rukhsar as wife of Vishnu, Tanishaa as Abhishek childhood lover, Ishrat Ali as Khan, the right hand of Sarkar or Ravi Kale as chander who gives a glimpse of Nana Patekar are all superbly brilliant and so are many others. Writing about everybody is not possible for me. One word with which I can describe all of them is SUPERB.

Finally, the direction of RGV, do I really need to write anything about it? It is better to witness it yourself. He leaves behind his own direction of Company which I think is the best if seen from the perspective of his direction. All other of his hits have one or more characters that bring life to the film but in company it’s the direction of RGV that brings life. In Sarkar, there are characters to go with the exquisite direction of RGV that makes it one of his best films. The flawless use of different camera angles and the background score somewhat takes us to company. The film starts with a statement from him “Like countless directors all over the world, I am deeply impressed by “THE GODFATHER”. “SARKAR” is my tribute to it.” I have not seen Godfather so can’t comment much on it. I don’t want to get myself involved in the argument whether it was based upon Godfather or the real life character of Mumbai politician Bala Sahab Thackrey as neither I watched The Godfather nor I know much about Bala Sahab in detail. Although this wikipedia article about Sarkar shows that all its charcters were taken from The Godfather. Whatever the case may be, it’s a fantastic movie a must watch one.