Monday, February 01, 2010

पप्पू के माँ की खोज!

मैंने अपने पिछले पोस्ट में अपने कॉलेज जीवन में जातीयता की यात्रा की शुरुआत का ज़िक्र किया है। हालांकि ये यात्रा सही रूप से कॉलेज के माहौल से ही शुरू हुई है मगर इसके बीज काफी पहले ही पड़ चुके थे। बिहारी होने का एक मतलब इस बीज के साथ पैदा होना भी होता है। इस तरह के generalisation से हालांकि मुझे बचना चाहिए था मगर कुछ भी हो, घरेलु ग्रामीण परिवेश में ये बात बिहारियों पर जरूर लागू होती है (अपवाद हर नियम में होते हैं और ये नियम खुद कोई अपवाद नहीं)। आज अपनी स्कूल की ज़िन्दगी का जिक्र करने जा रहा हूँ जहाँ जातीयता के साथ अल्हड़ जवानी के रंग भी देखने को मिलेंगे।

10वीं बोर्ड की परीक्षा पास करके 11वीं में फिर उसी स्कूल में एडमिशन ले लिया था। पुराने ज्यादातर दोस्त स्कूल बदल चुके थे या फिर दुसरे विषयों का चयन करके अलग अलग सेक्शन में चले गए थे। मैं जिस सेक्शन में था वहां मेरे साथ उसी स्कूल के पढने वाले कुछ पुराने लोग भी थे जिनमे 2 लोग ऐसे थे जिनके साथ की मेरी अच्छी दोस्ती थी। हम तीन उस समय के 3 idiots थे। फिल्म के तीनों पात्रों से सब की तुलना नहीं करना चाहूँगा और न ही किसी एक को किसी एक ख़ास पात्र से जोड़ना ही चाहूँगा। अगर किसी को रैंचो का किरदार दे दूं तो शायद ये उन बाकी बचे 2 लोगो की क्षमताओं के साथ नाईंसाफी हो जाएगी। हम तीनों में हर पात्र की कही न कही कोई झलक जरूर मिलती थी।

खैर, हम 3 idiots साथ में एक ही बेंच पर बैठा करते थे। कभी हमारे मन में एक दुसरे के प्रति जातीय भेदभाव की भावना नहीं आई थी मगर फिर भी बिहारी होने का एहसास उम्र के साथ हमारे परिपक्व हो रहे दिमाग को हो रहा था। इसी एहसास का कारण था कि एक दिन हमने आपस में एक दुसरे की जाति पूछ डाली। ये अजीब संयोग ही था कि हम तीनों समजातीय ही निकले। इस बात को जोर देकर यहाँ पर कहना चाहता हूँ कि हमारी दोस्ती में कोई बदलाव नहीं आता अगर हमें ये पता चलता कि हम एक जात के नहीं हैं मगर फिर भी, इस बात से इनकार भी नहीं करना चाहता कि ये जानकर कि हम समजातीय है हमारी दोस्ती और प्रगाढ़ हुई।

क्लास में सुबह का पिरीयड शुरू होने वाला था। हम सब प्रार्थना सभा से तुरंत क्लास में लौटे ही थे और हमारे क्लास टीचर का भी आगमन हो चुका था। रोल कॉल हो रहा था कि तभी दरवाजे से एक पतली सी आवाज आई, "May I come in sir"। हमारी नजरें उस पतली आवाज की तरफ दौड़ गयी. एक 5 फीट 1-२ इंच लम्बी, कुछ हद तक गोल-मटोल लड़की, छोटी छोटी आँखों पर मोटे मोटे चश्मे लगाये हुए क्लास टीचर के जवाब का इन्तेजार कर रही थी। ग़ालिब की रुबाईयां हों या खय्याम के गीत, आपको खूबसूरती के कही बेहतर नज़ारे कई जगह मिल जायेंगे। कही से भी कोई आकर्षण वहा मौजूद नहीं था मगर फिर भी आखिर हम तो थे मर्द ही। नयी नयी चढ़ रही मर्दानगी का ही असर था कि कही भी कोई ढंग की लड़की देखते ही घंटियाँ बजनी शुरू हो जाती थी। कुछ ऐसा ही उस दिन भी हमारे साथ हुआ।

वो लड़की क्लास के अन्दर आई और क्लास टीचर को बताया कि उसका नया नया एडमिशन इस सेक्शन में हुआ है। तब तक हमारे बीच बाते होने लगी थी कि साली आखिर है कौन। नाम जानने की उत्सुकता ने हमें उसके और हमारे टीचर के बीच हो रहे वार्तालाप को सुनने पर मजबूर कर दिया। अंततः उस वार्तालाप में हमें उसका नाम पता चल ही गया। नाम सुनना ही क्या था कि हम में से एक ने कहा, "रे साला! जाते बहिन है।" "बहिन मत बोल बे साले। जब देखो तब जिसको मन तिसको साला बहिने बना लेता है," मेरा जवाब था। जाति-बोध का एक ज्ञान किसी के उपनाम (title) से उसकी जाति का अंदाज लगाना भी होता है। बिहारी परिवेश में पले बढ़े होने के कारण हम इस ज्ञान के काफी धनी थे। हालांकि उपनाम से जात का अंदाज शत प्रतिशत सही तो नहीं होता मगर ज्यादातर सही ही लग जाता है। खैर, मेरा अपने दोस्त को ये जवाब देना ही काफी था कि मुझे उसके साथ जोड़ने में वे दोनों शुरू हो गए। हमने भी शर्माने लजाने से बेहतर इसे स्वीकार कर लेना ही समझा हालांकि कही से भी ऐसी कोई भावना मेरे मन में नहीं आई थी।

बात आई गयी हो गयी। हम सब भूले तो नहीं थे इस बात को मगर इसे पीछे छोड़ कर काफी आगे बढ़ गए। 12वी में पहुंच चुके थे। Physics की क्लास हो रही थी। गुरुदेव, जिन्हें हम प्यार से 'कप्पूआ' बुलाया करते थे, वो क्लास ले रहे थे। उनके tuition के ऑफर को ठुकराना मेरे लिए काफी भारी पर रहा था क्युंकि हर क्लास में उनके निशाने पर मै ही हुआ करता था। किसी न किसी बहाने से मुझे बेईज्जत करना उनकी आदत बन चुकी थी और उनके ही बाण उन्ही पर वापस चलाना मेरी काबिलियत में शुमार हो चुका था। Physics के सिद्धांतों को समझाने में उनके कई सारे उदहारण सीधे मेरी इज्जत को भेदते हुए चले जाते थे। उन्ही में से एक था एक बार मुझे बाप बना देना किसी काल्पनिक पात्र 'पप्पू' का। बस क्या था मिल गया मेरे दोस्तों और पूरे क्लास को मेरा मजाक उड़ाने का एक जरिया। मैं बन चुका था पप्पू का बाप। कुछ समझदार दोस्तों ने उसकी मां के बारे में सवाल उठाने शुरू किये। शुरू हो गयी पूरे स्कूल में पप्पू के माँ की खोज। बाप यहाँ बैठा अपनी बेईज्जती पर मन ही मन आंसू बहा रहा है, बेटे के अस्तित्व का कोई अता पता नहीं है, और फिर भी तलाश जारी है उसकी माँ की।

ये सब चल ही रहा था कि हम तीनो में से एक को एक साल पहले घटी उस घटना की याद आ गयी जिसमे उन्होंने मुझे उस लड़की के साथ जोड़ा था। बस क्या था मिल गयी मेरे दोस्तों को मेरे पप्पू की मम्मी। पप्पू के बाप से एक बार पूछा भी नहीं गया कि उसे पप्पू की मम्मी पसंद थी या नहीं। बस दोस्तों को पसंद आ गयी और हो गया काम। हमने एक बार फिर इनकार करने से बेहतर इसे स्वीकार कर लेने को ही समझा। सोचा ऐसा करने से मेरे ऊपर ब्यंग्य के बाण कम चलेंगे। हुआ भी ऐसा ही। आखिर हमने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली थी। बस क्या था, इधर दोस्तों को मेरी स्वीकृति मिली और उधर उन्होंने उस लड़की का पंजीकरण मेरे साथ पप्पू के मम्मी के तौर पर करा दिया। अगले ही दिन लड़को के द्वारा वो लड़की अपने नाम से कम और पप्पू की मम्मी के रूप में ज्यादा जानी जाने लगी। बात सिर्फ यही तक नहीं रुकी, उस लड़की की एक सहेली भी थी जिसे पप्पू की मौसी का नाम दे दिया गया था। पप्पू की मम्मी से ज्यादा उसकी मौसी ही फेमस हो गयीं थी। कई लोग ऐसे थे जो पप्पू की और उसके मम्मी और मौसी के उपज के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे मगर फिर भी वो मौसी को मौसी के रूप में ही जानते थे। हालत आज भी कुछ ऐसी है कि मुझे पप्पू की मौसी का असली नाम नहीं याद।

पप्पू को मम्मी भी मिल गयी और साथ में एक मौसी भी मगर फिर भी पप्पू का बाप अकेला ही रह गया। कभी उस लड़की से कोई बात नहीं हुई। दोस्तों का मनोरंजन करने के लिए कभी कभार कुछ हरकतें उसकी ओर कर भी दिया करता था मगर मन में कुछ भी न था। पप्पू कही न कही मन में जरूर ज़िंदा था और इसलिए उसके माँ की तलाश भी मन ही मन में जारी थी। कॉलेज तो इस सोच के साथ आया था कि यहाँ इधर उधर भटकना नहीं है और इसलिए शुरूआती दिनों में कभी पप्पू के बिन माँ के होने की पीड़ा को ज्यादा तवज्जो नहीं दे पाया। मगर धीरे धीरे वक़्त के साथ सब कुछ बदला। अपनी प्रेम-कहानी का ज़िक्र पिछले पोस्ट में कर चुका हूँ। इसी प्रेम कहानी के साथ पप्पू के माँ की खोज भी समाप्त हो गयी..........

Wednesday, January 27, 2010

हम और हमारी वो...

इधर कई दिनों से समसामयिक गतिविधियों पर कुछ पोस्ट मैंने अपने इस ब्लॉग पर लिखे हैं। इन पोस्ट के बारे में मैं जब हमारी 'उन्हें' बताता था तो हर बार एक ही जवाब उधर से मिलता था, "भै! तुम तो हमेशा ऐसा ही सब बात पर लिखते हो जो हमरे पल्ले ही नहीं पड़ता। पता नहीं कोई तुम्हारा ब्लॉग पढता भी है या नहीं। हमको तो नहीं लगता। के ई सब आएं बाएं पढ़ेगा। अरे हमरे बारे में लिखो तो लोग को अच्छो लगेगा!" इतनी प्यार और मिठास के साथ उसका बोलना ही काफी था कि आज मैं यूँही उसके बारे में कुछ लिखने जा रहा हूँ.

पटना मेडिकल कॉलेज में जब साढ़े चार साल पहले एडमिशन लिया था तो यहाँ के माहौल के बारे में खासी जानकारी नहीं थी. बस एक विचार ही था कि बढ़िया डाक्टर बनना है तो बाबू मन लगा के पढ़े पड़ी, एन्ने ओन्ने मन के दौड़ावे से काम ना बनी. इसी विचार के साथ हमने कॉलेज में अपना पहला कदम रख दिया. उस समय रैगिंग पर पूरी तरह से रोक नहीं लगी थी और हम फ्रेशर के लिए कॉलेज में एक ड्रेस कोड था जिसमे उजले शर्ट और पैंट पहनने पड़ते थे और साथ में एक हरे रंग की टाई. लड़कियों के लिए उजला सलवार समीज और एक हरा दुपट्टा हुआ करता था. पहली ही दिन हमलोग को पकड़ कर हॉस्टल के छत पर ले जाया गया. रैगिंग क्या होता है जब तक ये जान पाते कि तभी एक बॉस ने पूछा, "फाईलम का है रे?" "जी, chordata",
इस सोच के साथ कि बौसवा तो खुश हो जायेगा, एक भले पढ़े लिखे जीव विज्ञान के छात्र की तरह हमने भी तपाक से जवाब दे दिया. शाबाशी की आस मन में लगाये बॉस के जवाब का इंतज़ार कर रहे थे कि सामने से तपाक से झाड पड़ी, "रे! साला हमलोग non-chordata हैं का रे. साला फाईलम chordata बताता है, हमनी तो जैसे इन्सेक्ट है. का रे, का बूझ लिया है, ढेर स्मार्ट है का तुम." चुप चाप सुनकर सोच ही रहे थे कि हमसे क्या गलती हुई है तभी एक और सीनियर के बोलने पर एक batchmate ने आ कर कान में कहाँ, "फाईलम का मने यहाँ पर caste होता है, अपना जात बता दीजिये."

यही से शुरू हुई हमारी जातीयता कि यात्रा. इसे हम फ़ाईलमबाजी कहते हैं. बिहार में कही भी जाएँ और अपनी जात का ज़िक्र न हो तो शायद बिहार अधूरा ही रह जाये. हर ओर बिहार की तरक्की गूँज रही है मगर आज भी यहाँ सबसे ज्यादा बोलबाला समाज के जातीय बनावट का ही है. इस बात की पुष्टि मुझे कॉलेज के उस पहले ही दिन मिल गयी. खैर फाईलम बता कर हमे कुछ बौस समजातीय मिल गए जिन्होंने हमे वहा की रैगिंग से छुटकारा दिला दिया. उसके बाद शुरू हुआ अपने बैच में अपनी फाईलम के लोगों को ढूंढना. लड़के और लड़कियां दोनों. पहले एक मिला, उसने दुसरे से मिलवाया फिर तीसरे से और इस प्रकार हमारे फाईलम के सभी लोग बैच में मिल गए. इसी क्रम में हमारी 'उनसे' पहली मुलाक़ात हुई. वो पहली ही दिन कॉलेज आई थी. दो और लड़कियां उसे लेकर हम लड़को के पास आई, ये बताने कि ये भी हमारी ही फाईलम की है और वही हुई हमारी पहली मुलाक़ात. हमने भी बड़े शान से पूछ लिया, " ओह, तुम भी अपनी ही फाईलम हो." अपनी मीठी सी जुबान से उसने जवाब दिया, 'हाँ.' बस यही थी हमारी पहली वार्तालाप.

अच्छा डाक्टर बनने के लिए मन में जो विश्वास
लड़कियों के खिलाफ बनाया था वो तब भी जारी था. पढाई पर ध्यान लगाना और लड़कियों को दूर रखने के लिए बेजा हरकतें करना हमारी आदत और फिर एक पहचान बन गयी. इन सब बातों में मैं उस पहली मुलाक़ात को कही भूल ही गया. शुरुआत में उसकी तरफ कोई आकर्षण भी नहीं हुआ करता था और न ही कोई अनायास बातचीत. वो अपने रास्ते चलती थी, मैं अपने. सपने में भी कभी नहीं सोचा था कि हम कभी इतने करीब आयेंगे जितना आज हैं. सच पुछो तो याद नहीं कि फिर कब उस से दुबारा बात हुई थी.

वक़्त गुजरता गया, धीरे धीरे एक सेमेस्टर भी बीत गया. तब तक रैगिंग ख़त्म हो चुका था और फ़ाईलमबाजी के नाते एक-आध बार और हमारी बात हो चुकी थी. मेडिकल कॉलेज कि थोड़ी हवा हमें भी लग चुकी थी और लड़कियों की हमेशा खिलाफत करने वाला मैं थोड़ा नरम हो चुका था. बदलाव अभी जारी ही था और धीरे धीरे दिल और पिघल रहा था. २-३ लड़कियों से काफी बातें होने लगी थी और उनके वाया ही कभी कभार हमारी 'उनसे' भी बात हो जाया करती थी. धीरे धीरे बातों का दौड़ कैन्टीन तक चलने लगा. उसकी वो मुस्कराहट, वो भोलापन, वो सादगी, वो बचपना सब धीरे धीरे मन को भाने लगा. उस के साथ वक़्त गुजारना अच्छा लगने लगा. मन ही मन में वो चाहत शायद फूट चुकी थी जिसका एहसास मुझे पहली मर्तबा उस से उसके जन्मदिन के दिन फ़ोन पर बात करने के बाद हुआ.

इस एहसास को उसे बयां करने में 4 महीने लग गए. 25 सितम्बर की वो सुबह मुझे आज भी याद है. हम सड़क पर मिले. दोस्तों की बदौलत उसे मेरे मन की बात पता चल चुकी थी और मुझे भी पता चल चुका था कि मन ही मन में वो भी मुझे चाहती थी. फिर क्या था हो गयी बात. मैंने उसे बड़े ही रोब के साथ कहाँ, "देखो तुम सब कुछ जानबे करती हो कि मेरे मन में क्या है और हमको भी तुम्हरे बारे में पते है. तुमको कोई प्रॉब्लम नहीं हमको भी कोई दिक्कत नहीं. तो चलो और बात ही क्या करना है, हो गया बात, क्या?" और फिर एक बार वो ही मिठास भरी आवाज में उसका जवाब था, "हाँ." वो पहली मुलाक़ात की 'हाँ' और इस 'हाँ' में कोई फर्क न होते हुए भी कितना बड़ा फर्क था. आज भी उसकी इसी एक 'हाँ' के तो हम दीवाने हैं....................



Saturday, January 23, 2010

सही हुआ पाकिस्तानियों के साथ!

इन दिनों क्रिकेट के गलियारों में अगर किसी खबर ने सुर्खियाँ बटोरी है तो वो है IPL कि नीलामी में पाकिस्तानियों का न लिया जाना। IPL का तीसरा संस्करण शुरु होने वाला है और इसके लिए तैयारियां भी जोड़ों से चल रही है। खिलाड़ियों की नीलामी भी इन्ही तैयारियों का एक हिस्सा थी। IPL फ़्रैंचाईजी टीमों के मालिक अपनी अपनी टीम के लिए नामी-गिरामी खिलाडियों की बोली लगा रहे थे। पुरानी हिंदी फिल्मों में कई बार नीलामी के सीन देखने को मिल जाया करते थे। हीरो का परिवार कर्ज नहीं चुका पाता था और जालिम सेठ उसकी सारी संपत्ति को नीलाम करके अपना कर्ज वसूल कर लिया करते थे। कहीं कोई आश्चर्य नहीं होता था, आखिर नीलामी में बिकते तो सामान ही थे; सामान, जो बिकने और खरीदने के लिए ही बने होते थे। यहाँ IPL की नीलामी में बोली उसी तरह लग रही थी मगर फर्क इतना था कि बोली सामानों की नहीं बल्कि इंसानों की लग रही थी। कभी सोचता हूँ तो लगता है कि क्या यहाँ कोई फर्क था। व्यवसायीकरण के इस युग में जहां हर चीज का वस्तुकरण हो रहा है वहां इंसानों को भी सामान समझा जाना उन फ़्रैंचाईजी मालिकों के लिए शायद गलत नहीं है। खैर, ये खुद में एक मुद्दा है जिसकी चर्चा कभी बाद में करूँगा।
इसी नीलामी के ख़त्म होने के पहले ही एक अलग ही मुद्दा जोड़ पकड़ चुका था। 13 में से एक भी पाकिस्तानी खिलाड़ी को नहीं ख़रीदा गया था। कोई इसका कारण इन खिलाड़ियों के लिए वीसा मिलने में होने वाली दिक्कतों को बता रहा था तो कोई आरोप IPL प्रशासन की ओर लगा रहा था कि उनके आदेश के अनुरूप ही किसी टीम ने इन खिलाड़ियों के लिए बोली तक नहीं लगायी। कोई तो यहाँ तक कह रहा था कि ये सब भारत सरकार की ही करनी थी। जितने मुंह उतनी बातें। सच क्या है और झूठ क्या इसका पता हम जैसे क्रिकेट प्रेमियों को कभी नहीं चल पायेगा। देखा जाये तो जानने कि जरूरत भी नहीं है। तात्कालिक कारण कुछ भी हो, जड़ में तो भारत-पकिस्तान के बिगड़ते रिश्ते ही हैं। कितनी बार इस बदलते-बिगड़ते रिश्ते ने इन दो मुल्कों के बीच क्रिकेट-संबंधों पर पानी फेरा है, इसका तो हिसाब लगा पाना भी मुश्किल हो चला है। एक और बार सही।
नीलामी हुई, नीलामी में वे खिलाड़ी नहीं चुने गए। इनके साथ 30 और खिलाडी नहीं चुने गए। किसी ने कोई आवाज़ नहीं उठाई। पाकिस्तानियों का गुस्सा फूट पड़ा। भारत सरकार और क्रिकेट बोर्ड दोनों पर आरोप पर आरोप लगाये जाने लगे। रमीज़ राजा साहब को तो जैसे रोज़गार ही मिल गया। पिछले एक हफ्ते से वे सभी न्यूज़ चैनल पर छाये हुए हैं। आफरीदी औस्ट्रैलिया में हार रहे हैं फिर भी दिमाग में IPL की नीलामी ही चल रही है। कहते हैं कि उनकी कौम का अपमान हुआ है। अरे काहे कि कौम आफरीदी साहब! ये आपका यही कौम था जिसने कराची में खेलने गए हुए श्रीलंकाई खिलाड़ियों के ऊपर गोले दागे थे। क्या बिगाड़ा था उन खिलाड़ियों ने आपकी कौम का?
सोचता हूँ अगर IPL में इतना पैसा छिपा रहता तो भी क्या पाकिस्तानी इतनी ही मार करते यहाँ खेलने के लिएबिल्कुल नहींक्रिकेट को पूछ कौन रहा है, यहाँ तो सबको पैसे कि पड़ी है। करोड़ों कमाने का एक आसान तरीका भारत ने पाकिस्तानियों के हाथ से छीन लिया हैकोई ज्यादती नहीं कीपैसे कमाना है कमाओ अपने मुल्क मेंसाल भर से एक भी मुकाबला तो करवा नहीं पाए अपने मुल्क में और मरे जा रहे हैं भारत के घरेलू मुकाबले में खेलने के लिए
मैं ये मान लेने को भी तैयार हूँ कि भारत ने जानभूझ कर ही इन पाकिस्तानी खिलाड़ियों को IPL का हिस्सा न बन पाने के लिए ये सब किया है। अगर कोई कहे कि ये मुंबई पर हुए हमले के कारण है तो शायद मैं कहू कि तब ये गलत है मगर पकिस्तान में हमले सिर्फ आम लोगो पर ही नहीं हुए हैं। वहां हमले क्रिकेट खिलाड़ियों पर भी हो चुके हैं। उस हमले को श्रीलन्काइओं से ज्यादा कोई समझ भी नहीं सकता। अगर उस हमले की सजा भारत के एक घरेलु टुर्नामेंट में न खेल पाने के रूप में पाकिस्तानियों को मिल रही है तो क्या ज्यादती हो रही है उनके साथ। है औकात तो करा लें खुद के यहाँ एक PPL और आराम से खेलें वहां। जितनी इज्ज़त मिलनी थी भारत में मिल चुकी पाकिस्तानियों को। इतनी बार पीठ में छुरा घुप चुका है कि अब उसके लिए भी एक भी जगह नहीं बची है। कुछ भी गलत नहीं हुआ है उनके साथ। उन्हें अपनी करनी की ही सजा मिल रही है और कुछ नहीं। जिसकी भी सोच हो पाकिस्तानियों को IPL से अलग रखने की, उसने बिल्कुल सही किया है। मेरी और से शत शत धन्यवाद!!!

Thursday, January 21, 2010

बिहारी होने का अफ़सोस करूँ या हिन्दुस्तानी होने का ग़म

कल समाचारों में ब्रेकिंग न्यूज़ आ रहा था, महाराष्ट्र में टैक्सी परमिट के सम्बन्ध में। टैक्सी परमिट के लिए मराठी बोलने, समझने, और पढ़ने की अनिवार्यता के साथ १५ साल से महाराष्ट्र का निवासी होना भी आवश्यक कर दिया गया था। दूसरा ही समाचार ऑस्ट्रेलिया से आ रहा था। भारतीयों पर एक और हमला हुआ था वहाँ। लोग इस पोस्ट का title पढ़कर समझ ही गए होंगे कि इन दोनों समाचारों का ज़िक्र यहाँ पर क्यूँ किया गया है।
ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हो रहे जुर्म की गाथा अब कई महीने पुरानी हो चली है। एक पर एक समाचार आ रहे हैं। विदेश मंत्रालय बार-बार दिलासा दिलाने में लगा हुआ है। न्यूज़ चैनल भी भिड़े हुए हैं ऑस्ट्रेलिया की छवि को यहाँ के 'होने-वाले-प्रवासियों' के मनों में धूमिल करने में। कोई एक भी कसर नहीं छोड़ रहा। सब अपनी औकात से इस खबर को सनसनीखेज बनाने में लगे हुए हैं। प्रथम-दृष्ट्या मुझे भी आश्चर्य हुआ एवं ख़राब लगा कि ये हम हिन्दुस्तानियों के साथ क्या हो रहा है विदेशो में। अचानक से ये अंतर क्यूँ आ गया। कुछ साल पहले ऐसी ही घटनाएँ अमेरिका और यूरोप में भी घट रही थी। वो मामले अब शांत हो चुके हैं और आशा है कि ऑस्ट्रेलिया वाला मामला भी शांत हो ही जायेगा। मगर सोचने वाली बात ये जरूर है कि क्या सच में ऐसी घटनाएँ भारतीय विशेष पर हो रही हैं या ये उस देश की एक साधारण लचर कानून व्यवस्था है जो इस रूप में सामने आ रही है। हो सकता है वहाँ हिंदुस्तानियों के अलावा और भी देश के लोगो के साथ ऐसा हो रहा हो या फिर खुद वहाँ के लोगो के साथ भी ऐसा हो रहा हो। वो खबरे शायद हमतक पहुचती भी नहीं हैं इस लिए हम इसे भारत विरोधी मान कर हाय तौबा मचा रहे हैं। अब अपने देश को ही ले लीजिये। दिल्ली में आये दिन किसी विदेशी लड़की का बलात्कार हो जाता है। कुछ हफ्ते पहले ही गोवा में एक रूसी लड़की के बलात्कार की खबर आई थी। उसे लेकर रूस में भी ऐसा ही बवाल मचा होगा जैसा भारत में ऑस्ट्रेलिया की खबरों को लेकर मच रहा है। मगर क्या इसका मतलब ये है कि हम रूस-विरोधी हो गए हैं। कतई नहीं।
खैर आज इस पोस्ट को लिखने का मेरा मकसद विदेशो में हो रहे भारतीयों पर अत्याचार के बारे में ही लिखना नहीं है। आज यहाँ पर मैं भारत और बिहार के बीच एक समानता की रेखा खीचना चाह रहा हूँ। जो कुछ भारतीयों के साथ विदेशो में हो रहा है वो सब कुछ क्या हम बिहारी अपने देश में ही नहीं झेलते। शिव सेना और अब उनके साथ महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने महाराष्ट्र में मराठी मानुष के हकों के नाम पर बिहारियों या यूँ कहे हिंदी-भाषियों पर जो कहर ढाए हैं उनकी प्रति मिलना नामुमकिन ही लगती है। मगर ज़रा नजर दौडाएंगे तो पाएंगे कि सिर्फ महाराष्ट्र में ही ऐसा नहीं हो रहा। हम बिहारी मजदूरों के रूप में पंजाब में पिट रहे हैं तो छात्रों के रूप में असम में। चैन से हमें कोई नहीं जीने दे रहा. उत्तर भारत हो या दक्षिण, गुजरती हमपर वही सब है जो महारष्ट्र में।
कही न कही भारत और बिहार में समानता तो जरूर है. आज विश्व मंदी के इस दौड़ में भारत की और मुंह बाए खड़ा है, उम्मीद लगाये हुए। देश में बिहार की इज्ज़त भी बढ़ रही है। अब हम बिहारियों को भी इज्ज़त की नजरो से देखा जा रहा है। हम बिहारियों के लिए लोगो की आवाज़ में अचानक एक बदलाव आ चुका है जो दिख रहा है। कुछ ऐसा ही भारत के साथ विश्व मंच पर भी हो रहा है। भारतीयों के लिए दुनिया भर के लोगो के मनों में इज्ज़त बढ़ रही है। देश के अन्दर बिहार तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है तो बाहर वैश्विक स्तर पर भारत की प्रगति का कोई जोड़ नहीं। इन सब के साथ भारत और बिहार में एक और समानता भी है। बिहारी देश के अन्दर दूसरे प्रांतो में पिट रहे हैं तो भारतियों को विदेशो में हिंसा का सामना करना पर रहा है। सोचता हूँ अगर कोई मराठी है तो उसे तो बस इस बात का ही दुःख उठाना है की भारतीय विदेशों में असुरक्षित हैं। हम बिहारियों को तो यहाँ double झटके मिलते हैं। समझ में नहीं आता की भारतीय होकर विदेशो में पिटने का गम मनाउँ या बिहारी होकर अपने ही देश में अपमानित होने का दंश झेलू।
लानत है हर उस आदमी पर जिसने ऑस्ट्रेलिया में हो रहे हमलों की निंदा की है और कभी बिहारियों पर हो रहे जुर्म की तरफ देखा तक नहीं है। अरे दूसरो के द्वारा किया गया अन्याय अपने देशवासियों के द्वारा दिए गए ग़मों के आगे कहाँ ठहरता है। मन तो बस इतना ही सोचता है कि बिहारी होने का अफ़सोस करूँ या हिन्दुस्तानी होने का गम!

Sunday, January 17, 2010

Facebook latest abuse: What colour's your bra??

Almost a week back, I witnessed quite an interesting flood of status messages from my female friends at facebook. I think most of you who use facebook must be knowing this. The status messages consisted of just one word, a colour. There was black, there was white, golden, red, and many others. I was a bit confused what exactly that was. I even asked one of them as to what that is but no reply came. The next day I saw an article in The Times Of India about it telling that all this followed a series of mails asking women and girls for writing the colour of their bra in order to spread awareness about breast carcinoma. The mail asked to write down just one word, the colour, and nothing else.
In a way, I was shocked reading the news in the daily. I don't know what kind of an organisation this was that initiated this move. I learned about it being an american NGO or something but does it really matter. There has been so many fruitful programmes on raising the awareness of this deadly disease, breast cancer. Can a campaign like this really do some good in this regard?
I don't really understand what kind of awareness could these colours raise but it certainly managed to give me much insight into female undergarments. I didn't know that a golden bra also comes in the market. There were many other colours too that I didn't know about. Certainly, it did arose some awarenesss for me (and many others like me). Some of us were even commenting on such colours. Some comments read like 'wow!', 'hot!', 'ooooohhhhhhhh!' and many others depicting the lusty expressions of the mankind. Was the campaign meant for comments like that. Isn't it a disgusting way of promoting something that is too important an issue?
The limit was crossed when some staus messages started coming saying 'nothing.' Such messages were flooded with highest number of comments showing in all respect what regards we boys have for that part of a female's body. I won't say that we boys are not guilty of throwing in such comments, we really are. But are not the girls guilty as much? What exactly do they want to propagate about the cancer by telling their bra's colour. I would have certainly felt a lot embarrassed if I had seen a status message like that one from my sister.
For me, the colour of undergarments in no way provoke any idea inside me for the disease. What could it do at the most was make me a little horny and nothing else. I don't want to be a 'moral police' here neither I want to act like one. I am not saying that it in any way is violating the element of decency in the society. Everybody has a right to express themselves, that they can do in any way of their likings. Maybe, this is what they were doing. Not all the girls on facebook were busy writing in such status messages. There were many who avoided it.
My only point lies in that what kind of an expression was it to tell the colour of your bra to the public. It didn't provoke anybody to form a fan club or community on facebook to fight against breast cancer. What it did provoke was a fan club named "I Really Dont Care What Color Your Bra Is." Now is it not evident enough of what kind of an idea it provoked in people's mind. Everybody has an idea of their own to do something. It lies only on the conscience of the followers to look into the matter, think over it and when it seems followable, then do follow it. May be one day I will see somebody posting a half-nude picture of herself on facebook and saying this is to raise the awareness about breast cancer and for that matter, I would certainly hope nobody raises her voice for cervical or vaginal cancer. We won't be able to tolerate that.
I want to put again my point very clearly that I am not against a move meant to raise awareness about any disease. Being a medical student, I have seen people dying of such diseases; diseases from which people could have been saved with early diagnosis and prompt treatment. I would welcome anything that in reality raises some awareness for this disease. I only hope that people don't indulge in something that is meaningless, disgraceful or in anyway hurting to somebody (like the brothers and fathers who must have felt emabarrassed with such messages). Hopeful for some meaningful use of facebook next time!!!

{NOTE: The link to the TOI article shows only a part of the published article. I couldn't find the full article on web. One can see the bottom of front page of TOI, 8th Jan. isssue.}

गुरु-शिष्य: बदलते रिश्ते!

बहुत पहले की बात है. पापा के साथ किन्हीं के घर गया था. मालूम नहीं था कौन थे वो. अभी भी अच्छी तरह से नहीं याद. पापा ने बताया था उनके कोई शिक्षक थे. कोई ४० साल पुराने. सुनकर बड़ा अजीब लगा था. ४० साल पुराने शिक्षक के साथ सम्बन्ध आज भी बने हुए थे. शिक्षक और शिष्यों के बीच रहने वाले सम्बन्ध के बारे में कई बार पापा बता चुके थे. किस्सा सुनाया करते थे कुछ शिक्षकों का जिनके सड़क से गुजरने वक़्त उनके शिष्य साइकिल से उतरकर किनारे खड़े हो जाया करते थे.

अक्सर सुनता आया हूँ किस तरह पुराने दिनों में शिक्षकों को सम्मान मिला करता था. आज मै भी कॉलेज का विद्यार्थी हूँ. कुछ सालो में शायद खुद भी शिक्षक बन जाऊँगा. जब उन सारे कहानियों के बारे में सोचता हूँ तो यही लगता है कि क्या वो सारी बाते सच में कहानियों तक ही सीमित रह गयी हैं. आज के समय में हम अपने शिक्षकों को वो सम्मान तो बिल्कुल ही नहीं दे रहे और ये आशा रखना कि हमारे शिक्षक बनने पर हमें वो सम्मान मिलेगा, ये बेमानी ही होगी.

वो समय कुछ और था जब शायद लोग गुरु जी को उनके नाम से पुकारते तक नहीं थे. मास्टर साहब बोल कर ही काम चलाया जाता था. कोई दबाव नहीं था मास्टर साहब बोलने का. बात अंतरात्मा से ही निकलती थी. उसके बाद समय आया जब गुरु जी को नाम से पुकारा जाने लगा. नाम के आगे सर या मैडम लगा दिया जाता था जो सम्मानसूचक हुआ करते थे. अगर मात्रा में देखा जाए तो सम्मान पहले से कमा था मगर फिर भी एक critical value से ऊपर ही था. आज का समय है. हम अपने गुरु जी को न नाम से पुकारते हैं ना ही सर या मैडम जैसे कोई संबोधन का प्रयोग करते हैं. आज के समय में झा जी झउआ बन गए हैं, सिंह जी सिंघवा, मंडल जी मंडलवा और तिवारी जी तिवरिया. जिनके उपनाम ऐसे हैं जिन्हें इस प्रकार से सुशोभित नहीं किया जा सकता उन लोगो के नामो का ही उपयोग कर लिया जाता है. सुधीर सुधिरवा बन जाते हैं और रीता रितिया. कुछ लोगो के नाम ऐसे होते हैं जिसके किसी भाग को ही इस तरह सुशोभित करना मुश्किल ये विचारनीय. बात है वाले गुरुओं के लिए सरवा या मैडमिया ही काफी होता है. ऐसे संबोधन मात्र से पता चल सकता है कि हम आज के समय में कितना सम्मान अपने ग्रोन के लिए रखते हैं.

बदलाव आया है. गुरु-शिष्य संबंधों में गिरावट ही आई है. अगर थोड़ी अतिशयोक्ति कि इजाज़त दी जाये तो ये कहना चाहूँगा कि गुरु-शिष्य सम्बन्ध अब नदारद ही हो चुके हैं. बदलाव सच में आया है जो गिरावट के शक्ल में दिख रहा है. अब बदलाव आया है तो कुछ कारण तो होगा ही. परिवर्तन संसार का नियम है; गीता के इस दर्शन का उपयोग मात्र कर के ही हम इस बदलाव को परिभाषित नहीं कर सकते. कही न कही कुछ अंतर तो हुआ जरूर है. ये शिक्षको के बदलते स्तर से जुड़ा है या विद्यार्थियों कि बदलती सोच से ये विचारणीय बात है.

पहले के समय में जो गुरु जी हुआ करते थे उनके पास ज्ञान का भण्डार हुआ करता था. ऐसा नहीं है कि आज के समय में शिक्षको को ज्ञान की कमी है, मगर उस ज्ञान को बाटने कि क्षमता और योग्यता जितनी पुराने शिक्षको में थी उतनी शायद आज नहीं रह गयी है. विद्यार्थी भी शायद अब पहले से ज्यादा आज़ाद हो गए हैं. Competition के इस युग में शायद उनकी निर्भरता अपने शिक्षको पर से कम गयी है. self-study का बोलबाला बढ़ गया है और इसके फैलने से शिक्षको कि महत्ता में खासी कमी आ गयी है.

सम्मान उनके लिए ही मन में आता है जो कि हमारे लिए कुछ सकारात्मक लेकर आते हैं. मानव स्वभाव है ये. हम उनको ही सम्मान देते हैं जिनसे हमें कुछ फायदा होता है.आज के समय में विद्यार्थियों को शायद शिक्षको से कोई फायदा नहीं मिल रहा. भाग दौड़ के इस युग में सब एक रेस में लगे हुए हैं. आगे निकल जाने की, सब को पछार देने की एक होड़ लगी हुई है. इस होड़ में विद्यार्थी को खुद से ज्यादा किसी पर भरोसा नहीं है. देखा जाए तो ये गलत भी नहीं है. खुद से ज्यादा वैसे भी किसी पर भरोसा नहीं करना चाहिए. अपने तकदीर के निर्धारक हम खुद हैं. इसे निर्धारित करने के लिए हमें किसी की जरूरत नहीं. ये कह कर शायद मैं विद्यार्थियों को justify कर रहा हूँ. शायद मैं यही कह रहा हूँ की दोष किसी का नहीं है, समय की आवश्यकता है ये बदलाव. हो सकता है आज मै एक विद्यार्थी हूँ और इसी हैसियत से ही लिख रहा हूँ. इसलिए विद्यार्थियों के पक्ष में ज्यादा लिखा है. कुछ साल बाद जब खुद एक शिक्षक बनू तो शायद उचित सम्मान न मिल पाने की झुंझलाहट में इसी ब्लॉग पर शिक्षको की और से भी कुछ विचार लिख सकू। खैर अभी के लिए इतने पर ही विचार काफी है।

Tuesday, January 12, 2010

ये मैं हूँ, एक हिन्दुस्तानी!

आज बड़े भाई का जन्मदिन है। माँ को लेकर महावीर मंदिर गया था। पटना जंक्शन पर जो भी आये होंगे उन्होंने बहार निकलने के बाद भूके-नंगे भिकडियोँ के अलावा सबसे पहले इस मंदिर को ही देखा होगा। थोड़ा और आगे जायेंगे तो चौराहे पर चाचा नेहरु खडे मिलेंगे। हाथ में सफ़ेद कबूतर लिए हुए। जब से होश संभाला है चाचा को वही खड़ा पाया है। बचपन में सोचता था कि शायद नेहरु जी को कबूतरों से बहुत लगाव था इसलिए उसे लेकर खड़े हैं। बाद में कबूतर उड़ाने का सही मतलब समझ आया। पहले देखने का नजरिया ही नहीं था। २३ साल इस दुनिया में भटका तो थोड़ी बहुत परिपक्वता आई और अब किसी भी चीज को देखता हूँ तो सोचने को मजबूर हो जाता हूँ। थोड़ा अवलोकन और थोड़ा विश्लेषण समय के साथ आदमी सीख ही जाता है। अभी समय और भी है इसलिए सीखने कि प्रक्रिया चलती ही रहेगी।
२ महीने पहले उसी चौराहे को १४ नवम्बर कि तैयारी के लिए काफी सजाया गया था। चाचा को नहलाया धुलाया गया था। शायद चेहरे को पोलिश भी किया गया हो। चाचा चमक रहे थे। जीवंत प्रतीत हो रहे थे। फूल मालाएं पहनाई गयी, बल्ब-रोशनियाँ लगायी गयी थी। आज दो महीने बाद उसी प्रतिमा में वो फूल-मालाएं वैसे ही लटके हुए थे। फर्क इतना था कि वे अब सूख चुके थे। चमकता चेहरा अब धूमिल हो गया था और चिड़ियों के प्रसाद से सुशोभित हो रहा था। ज्यादा बताने कि जरुरत नहीं कि वो प्रसाद क्या है। चाह रहा था कि एक तस्वीर भी लगा सकूँ इस ब्लॉग पर मगर साथ में कैमरा न था। शायद बाद में कभी लगाऊं। वैसे लगाने कि जरुरत भी नहीं है। ये कोई नयी बात नहीं है। विशेषतया पटना की बात हो या नेहरु की मूर्ति के साथ ही ऐसा होता हो, ये भी नहीं है। ये तस्वीर भारत के हर शहर हर गाँव की है। हर महान व्यक्ति के साथ यही सुलूक होता है।
कुछ दिन पहले केन्द्रीय राज्य मत्री श्री शशि थरूर ने नेहरु जी के विदेश नीति पे कुछ टिपण्णी की थी जो हमारे राजनेताओं को पसंद नहीं आई थी। अखबारों ने उस टिप्पणी को काफी तवज्जो दी थी। पहले पन्ने का बड़ा भाग उस खबर को गया था। थरूर जी को इस टिप्पणी के लिए प्रधान मंत्री को स्पष्टीकरण भी देना पड़ा।
ये अलग मामला है कि क्या थरूर सही थे। विस्तार में बाद में कभी। मगर यहाँ ये जरूर कहना चाहता हूँ कि समय के साथ सब बदलता है। आन्तरिक नीतियों को न भी बदला जाये तो कोई बात नहीं मगर विदेश नीतियाँ समय के अनुसार ही चलनी चाहिए क्यूंकि उनके निर्धारक सिर्फ हम नहीं बल्कि "विदेश" भी है जो समय के साथ बदल रहे हैं। बहरहाल...
नेहरु जी कि उसी नीति की द्योतक यह प्रतिमा आज जिस हालत में शहर के बीचो बिच खड़ी है उसे देख कर यही लगता है कि राजनेताओं का वो नेहरु प्रेम कही न कही एक छलावा ही था। अखबारों को थरूर कि टिप्पणी पर टिप्पणी करने का समय आसानी से मिल गया मगर इस प्रतिमा तक किसी की नजर तक नहीं गयी। गयी भी हो तो क्या। इसमें मसाला कहाँ है, विवाद कहाँ है। मसाला नहीं, विवाद नहीं तो TRP नहीं। TRP नहीं तो न्यूज़ नहीं। आज की मीडिया TRP तक ही सीमित रह गयी है। समाज सुधारक का वो काम जो उनके जिम्मे है वो कही दूर रह गया है।
मीडिया को दोषी ठहराना और राजनेताओं के उदासीन रवैये पर ऐतराज जता देना ही क्या हमारा कर्त्तव्य है। क्या हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। मुझको ही ले लीजिये। मैंने उस मूर्ति को देखा, देख कर सोचा। सोचा तो मन उदास हुआ। फिर भी मैं आगे बढ़ा। रुक नहीं सकता था, पीछे कि गाड़ियों के होर्न से कान फटा जा रहा था। घर लौटने कि तरफ आगे बढ़ा तो थोड़ी दूर पर एक ऑटो वाले ने गाड़ी के बिल्कुल करीब से ही अपना ऑटो आगे बढ़ा लिया। नेहरु जी कि शांति नीति के बारे में सोचते हुए कुछ सेकंड ही गुजरे थे, शायद मन में तब भी वही चल रहा था। मगर उस ऑटो वाले कि उस हरकत को देखते ही शांति गयी तेल लेने और दिल में उसके लिए सम्मान के दो चार शब्द (F... words वाले) अपने आप आ गए। आगे बढ़ता गया। गाड़ी का होर्न बजता गया। पैदल और रिक्शों को पिछाड़ता हुआ होर्न कि आवाज में मशगूल हो शांति को भूल ही गया।
ये मैं हूँ। मैं जो अपने आप को हिन्दुस्तानी कहता हूँ। भारत का मतलब नहीं जानता और कहता हूँ कि भारत महान है। सीना चौड़ा करके कहता हूँ I PROUD TO BE AN INDIAN! ये मैं हूँ, एक हिन्दुस्तानी!

Monday, January 11, 2010

कुछ यूँ ही!

काफी दिनों से ये ब्लॉग बिना किसी हलचल के रुका हुआ था। इन दिनों में कई ऐसे विषय सामने आये जिसपे कुछ लिखने का मन हुआ पर लिख न पाया। फिल्मो में रूचि होने के कारण ही शायद 3 Idiots इन सभी विषयों में सबसे ऊपर था। फिल्म देख कर काफी अच्छा लगा, खैर इसके बारे में बाद में विस्तार से कभी। इसी फिल्म कि कहानी को लेकर हुए विवाद पर भी कुछ लिखना चाहा था पर लिख न पाया। MBBS अंतिम वर्ष कि परीक्षा चल रही है और ये एक बड़ा कारण है कि मैं कुछ लिखने के प्रति ज्यादा समय नहीं दे पाया। मगर जहाँ तक समय देने की बात का सवाल है तो ये तर्क मेरे कुछ न लिखने के लिए कतई सही नही हो सकता क्यूंकि इसी बीच में मैंने अपने इसी ब्लॉग में कई तरह के बदलाव भी किये। हो सकता था कि इन बदलावों में लगाए गए समय को मैं किसी ज्यादा सृजनात्मक कार्य, जैसे ब्लॉग लिखने, में लगा सकता था मगर ब्लॉग लिखना मेरे लिए सिर्फ समय देना ही नहीं बल्कि अपनी सोच को शब्द देना भी है जिसमे दिमाग का काफी इस्तेमाल होता है। परीक्षा के समय पढ़ाई के अलावा दिमाग को कही और लगाना शायद अनुचित होता इसलिए मैंने न ही लिखने का निर्णय किया।
बहरहाल जैसा की मैंने पहले कहा की इन दिनों इस ब्लॉग पर कुछ बदलाव किये गए हैं जिनका ज्यादातर सम्बन्ध इसकी प्रतीति से ही है। ब्लॉग template के अलावा २-३ gadgets जोड़े गए हैं जिनका कोई ख़ास मतलब नहीं है मगर बस यूँ ही। आशा है ये बदलाव पढ़ने वालो को आकर्षित करेंगे।
परीक्षा के बावजूद भी कुछ समय इन्टरनेट के लिए निकल ही जाता था और आजकल इन्टरनेट पर प्राथमिकताओ में सबसे ऊपर twitter रहा। अपना twitter link दे रहा हूँ, अगर चाहें तो उस सफ़र में भी साथी बन सकते हैं। twitter के बारे में सबसे अच्छी जो चीज मुझे लगी वो है काफी कम समय में अपने विचारो को आप व्यक्त कर सकते हैं। मेरे जैसे लोगो के लिए जिन्हें ब्लॉग में ज्यादा समय दे पाना मुश्किल हो जाता है या जो आलस की वजह से कई बार कुछ विषयो पर लिखने की सोचने के बावजूद लिख नहीं पाते उनके लिए twitter का microblogging एक ज्यादा आरामदायक और संतोषजनक सफ़र है। ब्लॉग और tweet में टेस्ट क्रिकेट और २०-२० का ही सम्बन्ध है और टेस्ट क्रिकेट की तरह ही ब्लॉग भी सदा सभी की प्राथमिकताओं में ऊपर ही रहेंगे।
twitter के अलावा इन दिनों मेरा आकर्षण हिंदी ब्लॉग की तरफ भी कुछ बढ़ा। रविश कुमार और मनोज जी के ब्लॉग पढ़ के काफी अच्छा लगा। बिहारी होने के गर्व का एहसास हुआ और हिंदी में कुछ लिखने की प्रेरणा भी मिली। शायद आगे चलकर हिंदी में कुछ ज्यादा लिख सकूँगा और फिल्मों के अलावा भी कई विषयों पर अपने विचार रख पाऊँगा।

Tuesday, December 15, 2009

My 50th Post...................PAA...


Its been again a long time since my last post. Was genuinely busy with studies for my final MBBS exams. Anyways, I was going through my blog one day when I noticed I had already posted 49 posts and next one was to be my 50th one. Here it comes, my 50th post in a time of 20 months (of course, not a good speed but is OK with me presently). This is about the new release I recently saw............PAA..
Paa, the latest release in bollywood is a much promoted and and as much praised movie. Having seen promos of the movie so many times on the TV with a large-headed, wrinkled, old-looking, young boy dancing his favourite monkey dance with everybody else had created much interest inside me as to what and how the movie is actually like. It was already known to us that this boy was suffering from an extremely rare genetic disorder of premature accelerated aging called Progeria. This was sufficient in itself for anybody to make an idea that the film was going to focus on the gloomy life of such a challenged child (maybe something like Taare Zameen Par did for dyslexia) but let me clear at this very opportunity that the movie was nothing like that. What I had thought of it to be like, it wasn't. Anyways...
The movie is directed by ad-maker R Balki, who comes with this straight after Cheeni-Kum. The two movies are not similar in any way yet they have some similarities, the biggest one being the witty humour of the two movies. Paa stars Abhishek Bachchan, Vidya Balan, Arundhati Nag, Paresh Rawal and introduces Amitabh Bachchan (as given in opening credits). The movie starts with the name AB Corp Ltd, a quite surprising name to see indeed. Already knowing Abhishek and Amitabh are in the movie and the name of ABCL being associated with it, one very innocently think why Jaya and Aishwarya are not in it and in comes Mrs. Jaya Bachchan with her ever smiling, ever fresh face reading out the opening credits; of course a fresh idea of sorts but fails to create much magic for someone like me and for many others it was like why really.
The movie is about a child (Amitabh) who is witty, is intelligent, lives with his unwed mother (Vidya Balan), and in the end brings his separated (well before his birth) parents (Abhishek and Vidya) together. The same age-old saga in the form of both of them pursuing their studies at the Cambridge when they come together, have an affair, she becomes pregnant, he refuses to marry for his upcoming career and she decides to give birth to the child. They both are separated for 14 long years when he somehow meets his son. These two don't know about their relationship, become friends and ultimately the ailing child brings his parents together in form of his last wish. Well, this is all about the plot of the movie; nothing special, nothing new in it.
Anything else in the movie from this looked merely as a fill up to complete the timeline specified for a normal family drama in bollywood and was nothing but crap or shit! Abhishek plays a new-age politician/MP who is made to make one think of someone like Rahul Gandhi with a bright vision of future India, who move from house to house and meets common people, sits with them, talks to them and works to cure all their problems. For a film that is based on politics, his is a great protagonist role but I wonder what a character like him is doing in this very film. I think this part of his character that is a politician's, was stretched too far fo comfort. Moreover, he was too good to be a politician in India. He looked more like Mr. India or Superman, the messiah of sufferers or something like that. Some parts of the film like Abhishek's fight against the mediaperson was completely wasteful and indigestible.
The character of Auro, the progeriac child (Amitabh) with his great sense of humour, his innocence, childish yet mature activities was the real entertainer. It won the hearts of many and man! what did Big B do with this character. Despite being his fan, I had not expected this sort of performance from him. For me, this very performance was at the top with his performances in films like Sholay, Deewar or Zanjeer. With this, I think, he adds one more dimension to his already multi-dimensional career. One of the most illustrious careers in world cinema, I think, gets completed with this very role. In fact, it was this character and his performance that made me complete the movie otherwise I would have gone out of the theatre much before the end.
Vidya Balan as Auro's mom has looked beautiful and so has she performed. The best part for me was her look, where she looked gorgeous as the lover at Cambridge, she was mature too as Auro's mom. I have been an admirer of her acting right from Parineeta and this time too she fulfills well my expectations. Arundhati Nag as Vidya's mom is being praised for good work in some reviews that I went through. For me she was not impressive at all. I was completely disappointed in her. Paresh Rawal as Abhishek's father reminded me of his own role in Cheeni-Kum. The bechara baap!!!
Music by Illayaraja was OK, sometimes touching your heart sometimes not so, reminding many a times of Cheeni-Kum again. The direction was good. With screenplay I had serious problems. I have already mentioned some parts feeling like fill-ups, I was wondering why exactly there was so much of politics in that. The media-sequence was really bad both concept-wise and presentation-wise. It looked more like Ram Gopal Vemra films (that too the forgettable ones).
All in all, apart from Auro and Amitabh there is nothing in this movie to look for. Can watch it only for Amitabh's performance!!!

Wednesday, November 18, 2009

Recently Watched: from Bollywood

This time of the year has been very hectic for the last three years for me. I have been busy these days preparing for my final MBBS exam and hopefully these will be the last of those. Well, alongwith the exhaustive studies these days, as usual, movies haven't quite dried up for me. Every such time, frequency of my watching movies are quite high and this time it is simply at the top level in my lifetime till date. Movies almost at a rate of 1.5 movies for past 20 days or so are in no way infrequent. The variety of movies is also quite staggering that includes both Hindi and English movies, both first-timers and revised, of varied jenres and well of completely different moods. This post will be about some of the Hindi ones.

Ajab Prem Ki Gazab Kahani
: There is no particular reason to start with this very film. Anyways, this is a kiddish comedy directed by Raj Kumar Santoshi who holds the credit of seriously serious films like Damini, Ghayal, Ghatak, Lajja etc and for him to direct this comedy was a bit strange. Having said this, one is compelled to remeber Andaaz Apna Apna by him too and what a comedy that was. There was something common in between 'Andaaz...' and 'Ajab...'. The kind of comedy in both these films are quite similar, you go, you watch, don' think much, and just enjoy. Being somewhat kiddish no doubt, it was completely different from the kind of comedy being served to us these days by films like No Entry or Partner or Golmaal (of course the Ajay Devgan version) and Golmaal Returns. Today, mostly what we are getting in the name of comedy is a bunch of non-veg jokes with sexuality at its central theme. At such a time, APKGK brings us a refreshing, clean, with-the-family, cartoonish comedy which, as far as I am concerned, I enjoyed completely. So, not highly recommended but easily tolerable.

Ardh Satya: It is quite strange for even me to follow APKGK with this Govind Nihalani directed 1983 masterpiece starring Om Puri and Smita Patil. The two films are literally antonyms to each other in each and every respect. Where APKGK is a sheer comedy, this one is a damn serious movie. Being a well decorated film from India's golden era of parallel cinema, this has to be special. Its about the internal conflicts of the protangonist both as a police officer and as a human being. I won't deny the fact that there were some parts of the movie that I was not able to understand completely, yet overall, I could make out of it that this has to be one highly recommended movie for everybody. The story, the direction, the dialogues, the performances everything is just perfect. One special mention to Om Puri's performance, HATS OFF to you sir!!!

Sarfarosh: After already having watched it so many times, I still went up for it and was as overwhelmed as I was 10 yrs back when I first watched it. Personally speaking, this movie is something special for me. It gave me my superstar in form of Aamir Khan. I watched it, I liked it, I became his fan and I still am.

Black and White: Just a random selection, was on my too-watch list for quite some time. A strange movie, only this is what I have to say about it, a strange movie! Never expected Subhash Ghai to direct such a film. I knew that this film was his production but after watching it completely I rechecked for the director and found it to be Mr. Ghai himself. Well, this is about a suicidal terrorist attack. So many movies have been made on this topic now and this one is not different except it has no "दूध मांगोगे खीर देंगे कश्मीर मांगोगे चिर देंगे" kind of offensive dialogues against Pakistan and it has no "कोई माँ की कोख से आतंकवादी बन कर नही पैदा होता" kind of cliched concept. All in all, a good one!!!

Shaurya: Where having Rahul Bose in the lead role is enough for anybody to expect a high class performance, if you are given alongwith him Kaykay Menon and a serious version of Javed Jafffey, it had to be fantastic performance-wise. Again, recommended!!!

Haasil: I thought not to write about it yet I am doing this because this needs one special mention. I have not felt a more drastic transition of my feelings for a movie from more than very good to extremely bad as I felt with this one. After such a promising half an hour of student politics, it suddenly changes into a dirty game of love and lust and even good performances from Ashutosh Rana, Irrfaan or Jimmy Shergill couldn't save this one.

Alongwith these movies there were several others that I watched but I don't really feel like writing this time. Maybe some other time, I might be writing but here a passing mention of their names:
Sorry Bhai, Bawarchi, Jashnn, Mumbai Meri Jaan, Mithya, Wanted, No Entry, Bandit Queen etc.

Disclaimer: I have not written about these movies doesn't mean that I didn't like them. Some of them, I really liked and others were just useless.