Sunday, October 03, 2010

गाँधी, सिर्फ एक सोच या स्वतंत्रा संग्राम का प्रणेता भी?

"I want world sympathy in this battle of right against might."- M.K. Gandhi, 5/4/1930
आज सुबह से ही फेसबुक, ट्विटर, ब्लौगर हर जगह गाँधी जयंती की धूम मची रही. हर ओर पिछली सदी के इस महात्मा को जन्मदिन की शुभकामनाएं देने की होड़ लगी हुई थी. हर कोई इन्हें याद कर रहा था. इसी क्रम में फेसबुक पर मुझे ये तस्वीर मिली. 5 अप्रैल 1930 को गाँधी के हाथ से लिखे गए इस पंक्ति के नीचे उनके ही हस्ताक्षर भी हैं. इस पंक्ति के माध्यम से गाँधी दुनिया से सहानुभूति चाह रहे हैं सत्य की मजबूत के खिलाफ अपनी जंग के लिए. ज़रा ध्यान दीजिये, जिस शब्द का प्रयोग गाँधी कर रहे हैं वो है 'symapthy' यानि 'सहानुभूति.' इस एक शब्द ने न जाने कितने विचार मन में ला दिए. यदि ऊपर की इस पंक्ति से गाँधी के दस्तखत और बैकग्राउंड से उनकी तस्वीर हटा दी जाए और एक पल के लिए सोचा जाये कि एक आम भारतीय ने इस पंक्ति को लिखा है तो क्या ऐसा प्रतीत नहीं होता कि कोई अपने देश के लिए दुनिया से भीख मांग रहा है वो भी किसकी, तो सहानुभूति की. अगर गाँधी के परिप्रेक्ष्य से इस बात को पढ़ा जाए तो एक महान वक्तव्य प्रतीत होता है उस महान योद्धा का जिसने अपना न जाने क्या क्या कुर्बान कर दिया मुल्क की खातिर. मगर उस दृष्टिकोण से थोडा परे हटकर पढ़िए और तब सोचिये कि क्या इस पंक्ति ने हमारे देश को बेचारा बना कर पेश किया है या नहीं.
बचपन से थोडा गरम दिमाग का रहा हूँ, शायद इसीलिए गाँधी की कार्यशैली कुछ ज्यादा पसंद नहीं आई. फिर भी वो महात्मा, जो गाँधी हैं, उनकी इज्ज़त करता हूँ. इंसानी पीड़ा को समझने की उनकी क्षमता और इस ओर अपना सब कुछ न्योछावर करके लोगों को उनके अधिकार दिलाने के उनके शतत प्रयास को हमेशा मेरा शत-शत नमन है. गाँधी, जो एक सोच है, हमेशा उसका कायल रहा हूँ. 'सत्य' और 'अहिंसा' से अधिक विश्वास उनकी 'समानता' और 'निरपेक्षता' की सोच पर है. गाँधी को अगर गांधीजी कहता हूँ तो वो सिर्फ उस इंसान के लिए है जिसने सामाजिकता का ज्ञान भारत को दिया, उस गाँधी के लिए नहीं जिसे आसानी से लोग भारत का सबसे बड़ा स्वतंत्रा सेनानी मान लेते हैं.
गाँधी नाम के उस स्वतंत्रा सेनानी, जिसे आम तौर पर भारतीय स्वतंत्रा संग्राम का प्रणेता माना जाता है, उसपर कुछ ख़ास यकीन मैं नहीं रखता. पहले भी लिख चुका हूँ कि शायद इसका कारण मेरा गरम दिमाग का होना है. आज जब इस तस्वीर को देखा तो फिर से वो सारे विचार मन में आ गए जिनसे कई बार पहले भी साक्षात्कार हो चुका है. क्या सच में गाँधी भारत की स्वतंत्रा के लिए लड़े थे, क्या गाँधी के आन्दोलनों के पीछे की मंशा आज़ादी थी, क्या गाँधी को हमारी स्वतंत्रा के लिए उतना श्रेय दिया जाना चाहिए जितना उन्हें मिला है? मेरे लिए इन सभी सवालों का जवाब ना ही है.
अफ्रीका में सामाजिक द्वेष के खिलाफ अपनी लड़ाई के बाद जब गाँधी भारत आये तो उन्हें यहाँ के आम भारतीयों की हालत भी वैसी ही लगी. और तब शुरू हुई गाँधी की लड़ाई, लड़ाई मौलिक अधिकारों के लिए, लड़ाई सामाजिक एकता के लिए. कहीं भी इस लड़ाई का मकसद आज़ादी नज़र नहीं आता. वो चंपारण का सत्याग्रह हो या डांडी का नमक सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा आन्दोलन हो या असहयोग आन्दोलन कहीं भी आज़ादी की लड़ाई नहीं दिख रही थी. अगर अंग्रेज़ भारतीयों को उनके अधिकार दे देते और उनपर ज़ुल्म ढाना बंद कर देते तो शायद फिर गाँधी को अंग्रेजी हुकुमत से कोई परहेज नहीं था. 1942 के भारत छोडो आन्दोलन के पहले के लगभग 27 साल के उनके संघर्ष में कहीं भी भारत को आज़ादी दिलाने के बारे में कोई बात नहीं हुई.
बीसवीं सदी के पांचवे दशक तक आते आते दुनिया के हालात ऐसे हो गए थे जहां उपनिवेशवाद अपना अस्तित्व खोता जा रहा था. पूरी दुनिया में एक राय बन चुकी थी उपनिवेशवाद के खिलाफ. दो दो विश्व युद्ध देखने के बाद हुकूमतों की ऐसी हालत नहीं रह गयी थी कि वो इसका अस्तित्व बचा कर रख सके. इसी कड़ी का एक हिस्सा '42 का भारत छोडो आन्दोलन भी था और '47 की हमारी आज़ादी भी. शायद यही कारण है कि सोचता हूँ कि यदि गाँधी नहीं होते तो क्या हम आज़ाद नहीं हुए होते.
भारत-पाकिस्तान बंटवारे, भगत सिंह की फांसी, और सुभाष चन्द्र बोस पर उठते रहे विवादों के कारण भी मन गाँधी को मानने से इनकार करता रहा. अगर गाँधी ने कांग्रेस से नाता न जोड़ा होता तो शायद भारत का कभी बंटवारा नहीं हुआ होता. जिस वक़्त गाँधी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से सम्बन्ध बनाया था उस वक़्त जिन्ना एक मजबूत कांग्रेसी की तरह स्थापित हो चुके थे. जिन्ना की भव्य जीवनशैली के सामने गाँधी को नेहरु का खादी धारण करना ज्यादा पसंद आया. जिन्ना कांग्रेस से दूर होते गए और नेहरु की धाक जमती गयी. अंत क्या हुआ ये आप और हम सब जानते हैं. पाकिस्तान के रूप में एक नासूर हमें आज भी दर्द दे रहा है. नेहरु की इसी बढती धाक का एक और नतीजा सुभाष चन्द्र बोस जैसे सच्चे स्वतंत्रा सेनानी के नैतिक गिरावट के रूप में भी आया. भगत सिंह की फांसी का मामला किसी से छुपा नहीं है. 1931 के द्वितीय गोल मेज़ सम्मलेन में भाग लेने के लिए कांग्रेसियों को मनाने की अंग्रेजी हुकुमत की कोशिशें गाँधी-इरविन पैक्ट के रूप में कामयाब हुई. असहयोग आन्दोलन में गिरफ्तार किये गए सभी कांग्रेसियों की रिहाई इस पैक्ट का एक महत्वपूर्ण बिंदु थी. उस वक़्त भगत सिंह जैसे उन क्रांतिकारियों को छोड़ दिया गया जिनका मकसद भी वही था जो कांग्रेस का था सिर्फ रास्ते अलग अलग थे. ऐसी बातों से मन में विचार जरूर आने लगते हैं कि कहीं न कहीं गाँधी अपने अनुयायिओं के प्रति ज्यादा वफादार थे. हालांकि, गाँधी, जो एक सोच है, उसके हिसाब से ऐसा नहीं हो सकता मगर फिर भी इनकार नहीं करूंगा कि ऐसे सोच मन में कभी नहीं आते.
खैर, वैसे भी आज गाँधी को लेकर दोस्तों से इन्ही बातों पर काफी बहस हो चुकी है और अब यहाँ भी काफी कुछ अपनी बात रख चुका हूँ. जिस तरह से आम धारणाओं के विपरीत मैंने बातें की हैं उससे तो यही लग रहा है कि कई लोग मुझसे सहमत नहीं होंगे, मगर ये सिर्फ एक नजरिया है. ये मेरी सोच है, आपसे भिन्न हो सकती है. आपकी सहमति और असहमति दोनों का स्वागत है. धन्यवाद!

5 comments:

उपेन्द्र कुमार सिंह said...

बहुत ही उम्दा लिखा है
माफ़ कीजिएगा परन्तु आज धरती के लाल "लाल बहादुर शास्त्री जी" का जन्मदिन भी है उन पर आपका ध्यान क्यों नहीं गया.............

आइये उस धरती के लाल को नमन करें.........
प्रस्तुत हैं कुछ उनसे समबन्धित कुछ प्रेरक प्रसंग..

http://jeevandagar.blogspot.com/2010/10/blog-post_5771.html

Aashu said...

@उपेन्द्र: शास्त्री जी के ऊपर ध्यान न गया हो ऐसी कोई बात नहीं. सुबह में गाँधी पर गुस्सा थोडा ज्यादा फूट रहा था इसी बात पर कि क्यूँ गाँधी के सामने शास्त्री जैसे महानायक को भूल जाया जाता है. यहाँ पर बस, गाँधी को किसी के साथ तुलनात्मक तराजू में तौलना नहीं चाहता था इसलिए कुछ नहीं लिखा. वैसे आपको मेरी पोस्ट पसंद आई इसलिए धन्यवाद!

puravia said...

..es behas ka ek chota hissa mai bhi hun...mujha lgta ha gandhi hmesa samvad ke or le jate han...eslia samvad jruri ha...han...vivad ke lia koi samvad ho to wo bematlab ha...bhartbala production ka ek prmotional tv ad ke punch line ha...chlo hm es bat pr sahmat han ke hm ek dusra sa asahmat han...ashmati pr sahmati loktantra ke neev ha...

kumar said...

well written aur hindi ke shabdo ka umda prayog kiye ho. Well done. Research karke koi tippani deta hai to padhne wale ki ruchi badh jati hai

kumar said...

meri choti maa delhi ke Gandhi sanghralya ki director hain, main unse jaroor request karunga ki aane wale Gandhi ji ke jayanti par tumhe ek speech dene ka mauka den