Sunday, June 06, 2010

'राजनीति', कलयुगी महाभारत का खूनी खेल!!!


शुक्रवार को राजनीति फिल्म देखने गया था। काफी महीने हो गए थे कोई हिंदी फिल्म देखे हॉल में, इसलिए एक हफ्ते पहले काइट्स देखने की भी लालसा थी मगर एडवांस बुकिंग के चक्कर में टिकट नहीं मिल सका और जब समीक्षाओं को पढ़ा तो फिर देखने की हिम्मत नहीं हुई। भला मनाया एडवांस बुकिंग का जिसके कारण टिकट नहीं मिल सकी और पैसे बर्बाद होने से बच गए। राजनीति के प्रोमो देखकर फिल्म के प्रति जिज्ञासा बढती ही जा रही थी और इसलिए इस बार समीक्षा पढने का खतरा नहीं उठाना चाहा और एडवांस बुकिंग के पैसे बचाने के एहसान का बदला इस बार एडवांस में टिकट कटा कर चुका लिया।
प्रोमो देखकर और प्रकाश झा का नाम जुड़ा होने के कारण फिल्म के बारे में एक पूर्वानुमान बन गया था कि शायद गाँधी परिवार की कहानी बिहारी पृष्ठभूमि में दिखाई जायेगी। पूर्वानुमान पूर्णतया गलत साबित हुई। गाँधी परिवार से कोई सरोकार नहीं निकला इस फिल्म में। फिल्म देखकर लगा जैसे महाभारत की कहानी को कलयुगी चूल्हे पर 'The Godfather' का तड़का लगाकर 'सरकार' और 'सरकार राज' की चासनी में पड़ोस दिया गया हो। एक खिचड़ी पका दी गयी है जिसमे महाभारत के किरदारों को 'Godfather' की निर्ममता और क्रूरता प्रदान कर दी गयी है।
प्रथमार्ध का भीष्म पितामह (नाना पाटेकर) उत्तरार्ध का कृष्ण बन जाता है। ध्रितराष्ट्र अँधा नहीं अपाहिज बन जाता है, पांडू दुर्योधन (मनोज वाजपयी) को गद्दी से दूर रखने का हर संभव प्रयास करता है, युधिष्ठीर (अर्जुन रामपाल) धर्मराज नहीं रह जाता है मगर कलयुगी धर्मों का भरी भांति पालन करता है। कुंती अर्जुन (रणबीर कपूर) की जान की रक्षा के लिए कर्ण (अजय देवगन) के पास जाती है मगर माँ की ममता कहीं छोड़ देती है, साथ लेकर जाती है सिर्फ राजनीति। कर्ण रश्मिरथी वाला कर्ण नहीं है, दुर्योधन के सभी दुष्कर्मों का संयोजक है कर्ण, और जब मौका दुर्योधन की जान बचाने का आता है तो उसके कदम फिसल जाते हैं। अर्जुन के प्रति अचानक संवेदनाएं जाग जाती हैं। दुर्योधन मारा जाता है और कृष्ण के उकसाने पर कर्ण का भी वध अर्जुन कर देता है। पूरे खूनी खेल में युधिष्ठीर भी नहीं बचता, गद्दी अंततः द्रौपदी के हाथ में आती है। जिस गद्दी के लिए पूरा खूनी खेल होता है वो किसी खिलाडी को नहीं मिलता। सहानुभूति की सीढ़ी चढ़ती हुई द्रौपदी सीधे गद्दी तक पहुच जाती है।
राजनीति को विचारधाराओं की स्वच्छ लड़ाई समझने वालों के लिए इस फिल्म में कुछ नहीं। नीतियां कहीं दिखती नहीं, रह जाता है सिर्फ राज, रह जाती है राज करने के लिए न ख़त्म होने वाली रंजिश, और रह जाते हैं राज करने के लिए किसी भी हद तक जाने वाले खूनी खिलाड़ी। पारिवारिक रंजिश में राजनीतिक विचारधाराएँ को निर्देशक कहीं मिला नहीं पाता। शायद आज की राजनीति का सही चित्रांकन किया गया है। 30 साल पहले भाष्कर सान्याल (नसीरुद्दीन शाह) द्वारा पूंजीवाद के खिलाफ चलाया गया साम्यवादी आन्दोलन कई मायनों में यथार्थ के करीब लगा। पूरी फिल्म में एक वही समय लगा जब राजनीति विचारों के बूते पर लड़ी जा रही थी। बाकी पूरी फिल्म में आज की भारतीय राजनीति की तरह कोई विचारधारा नहीं, कोई मुद्दा नहीं बस निरंतर लड़ाई चल रही है। परमाणु मुद्दे पर BJP के विचार कांग्रेस से इतर नहीं मगर फिर भी लेफ्ट के अविश्वाश प्रस्ताव का समर्थन करता है। विचारों को ताक पे रखकर कुर्सी के लिए कुछ भी करने को तैयार है विपक्ष। संसद के गरिमा की चिंता किये बगैर नोटों की गड्डियां दिखाता है विपक्ष। फिल्म में जो खूनी खेल दिखाया गया है वैसा तो नहीं मगर एक खूनी खेल हमारे देश की राजनीति में हमें देखने को मिलता है जहां हर रोज़ खून होता है हमारे विश्वास का, जहां हर रोज़ हनन होता है हमारी सोच का। सच कहूं तो फिल्म का खूनी खेल ही ज्यादा अच्छा लगता है, कम से कम, जनता के साथ तो कोई खेल नहीं होता वहाँ। फिल्म में विचारों की कोई लड़ाई नहीं और शायद यही कारण है कि अंत में जब परिणाम आता है तो जनता भी विचारों के आधार पर वोट न डालकर सहानुभूति के आधार पर फैसला करती है। खेल का वो परिणाम निकलता है जिसे स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए कोई खिलाडी जिंदा नहीं बचता। शायद इस मामले में कहानी थोड़ी मात खाती है और राजनीति महान बनते बनते रह जाती है, हाँ, अच्छी जरूर बनती है मगर यादगार नहीं!!!
कई भाग में फिल्म की कहानी प्रकाश जा के नाम के अनुरूप सशक्त लगी मगर कुछ बातों में कमजोर भी। राष्ट्रवादी पार्टी के बंटवारे के पहले कहीं भी किसी विपक्षी पार्टी का कोई नामो-निशान नहीं मिला। राजनीति से ज्यादा फिल्म किसी रजवाड़े की लड़ाई जैसी लगी जहां दो भाई सिंहासन के लिए मारकाट पर तुले हैं। फिर भी, सशक्त अभिनय और बेजोड़ निर्देशन के बूते फिल्म दिल में जगह बनाने में सफल रही। नाना पाटेकर अपनी सूत्रधार की भूमिका में खूब जंचे, तो अरसे बाद मनोज वाजपयी अपने रंग में दिखे। अर्जुन रामपाल 'Rock On' की अपनी स्वर्णिम सफलता को यहाँ भी बरकरार रखने में सफल होते हैं। रणबीर कपूर ने अपना किरदार पूरी तन्मयता के साथ निभाया है। कटरीना कैफ कहानी के मुताबिक़ अपने दोनों शेड को बखूभी निभाती हुई शुरू में कामुक भी लगीं हैं और बाद में राजनेत्री के रूप में सशक्त भी। सब मिलाकर कहानी, कास्टिंग, निर्देशन और अभिनय के बल पर जो राजनीति बनकर तैयार हुई है काफी अच्छी लगी है।

Wednesday, June 02, 2010

आखिर क्यूँ नहीं आते भारत में ओलम्पिक पदक!!!

जब से मैंने होश संभाला है और ओलम्पिक खेलों के बारे में थोड़ा जाना है, तब से आजतक चार ओलम्पिक खेल हो चुके हैं। इन चार खेलों में भारत के पदकों की संख्या ६ रही है जिनमे से तीन हमने अंतिम ओलम्पिक में ही जीते थे। पहले के तीन खेलों में सिर्फ तीन पदक आये थे। उसके पहले के न जाने कितने ओलम्पिक हमारे लिए शिफर साबित हुए मुझे नहीं मालूम, मगर इतना जरूर मालूम है कि खेलों के इतिहास में कभी हमारी स्थिति ऐसी नहीं रही जिससे हम सीना फुला सकें। ले-देकर सबसे अच्छी स्थिति हमारी अंतिम खेलों में ही थी।
ओलम्पिक, राष्ट्रमंडल या एशियाड जैसे खेलों में अपनी स्थिति इतनी खराब क्यूँ है इसकी चर्चा कई बार हो चुकी है। आप भी कहेंगे, इस पगले को आज क्या सूझी जो अभी ये बात लेकर आ गया। आप में से कई ये बात सोच भी चुके होंगे कि अभी निकट भविष्य में तो ऐसा कोई खेल होने वाला नहीं है, फिर इस समय इस बात का क्या औचित्य है। आज खबर मालूम हुई कि भारतीय क्रिकेट टीम एशियाड के क्रिकेट स्पर्धा में हिस्सा नहीं ले रही। BCCI ने साफ़ कर दिया है कि उसी समय हो रहे टेस्ट मैचों के कारण टीम वहाँ नहीं जा रही और ऐसी सूरत में किसी 'बी' टीम को भी नहीं भेजा जा रहा। इस खबर को सुनकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ। BCCI से मुझे ऐसी ही उम्मीद थी। न वहाँ करोड़ों के TV rights हैं न अरबों के प्रायोजक। एक साधारण से रिबन में लटके एक पदक के लिए यदि BCCI अपनी टीम को वहाँ भेजती है तो इसमें तो उसकी हंसी ही उड़ेगी। इसलिए मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ ये जानकर कि BCCI का ऐसे किसी पदक के प्रति कोई झुकाव नहीं है। अभी तो एशियाड की ही बात है, अगर ओलम्पिक भी होता तो भी भारतीय टीम उसका हिस्सा नहीं होती। जिस देश में ऐसे खेल sangh हैं जो एशियाड के पदक को कोई महत्व नहीं dete उस देश में चार ओलम्पिक खेलों में ६ पदक आ जाते हैं, ये कोई कम बात नहीं।
BCCI ने जितनी आसानी से एशियाड से अपना पल्ला झाड़ लिया है उतनी आसानी से कोई और खेल संघ क्या अपना पल्ला झाड़ सकता है। नहीं, ये क्रिकेट है, इसे हमारा साथ मिला हुआ है, इसे 100 करोड़ भारतीय का साथ मिला हुआ है इसे कोई चिंता नहीं। BCCI कुछ भी करे लोग क्रिकेट देखते रहेंगे और उनकी जेबें भरती रहेंगी. क्या BCCI को दोषी ठहराना उचित है? दोषी तो हम ही हैं जिनके लिए क्रिकेट के सामने ओर कोई खेल खेल ही नहीं। एक उदहारण देता हूँ।

भारतीय क्रिकेट टीम ने 1983 में विश्व कप जीता
। कपिल देव कप्तान थे। जहां मोहिंदर अमरनाथ को सेमी-फ़ाईनल और फ़ाईनल दोनों में मैन ऑफ़ द मैच का खिताब मिला वहीँ रोजर बिन्नी मैन ऑफ़ द सीरिज के पुरस्कार से नवाजे गए। '87 में भारतीय टीम सेमी-फ़ाईनल से बाहर हुई तो '92 में सेमी-फ़ाईनल तक पहुँच भी नहीं सकी। '96 में एक बार फिर सेमी-फ़ाईनल से बाहर हुई हमारी टीम। इस तरह मुझे अभी तक के सभी विश्व कप में भारत का प्रदर्शन याद है। मुझे कोई शक नहीं कि ये सिर्फ मैं नहीं जिसे ये सब याद है, और भी कई लोग हैं जिन्हें ये सब याद है। अब हर उस आदमी से (मुझे लेकर), ये पूछिए कि '80 ओलम्पिक में जब भारतीय हौकी टीम ने आखरी स्वर्ण जीता था तो कप्तान कौन थे। छोड़िये ये, ये पुरानी बात है। पूछिए किसी से भी कि निशानेबाजी के कौन सी स्पर्धा में अभिनव बिंद्रा ने स्वर्ण जीता या राज्यवर्धन राठौर ने रजत हासिल किया। पूछिए कि कर्णम मल्लेश्वरी ने किस वजन-ग्रुप में पदक हासिल किया था या लिएन्डर पेस ने किसे हराकर कांस्य जीता था। कुछ को तो शायद ये भी नहीं याद होगा कि विजेंद्र सिंह और सुशील कुमार ने किस खेल में हमें पदक दिलाया था। खुशियाँ हमने हर पदक के बाद मनाया था, गर्वान्वित हम हमेशा हुए थे मगर सिर्फ कुछ देर के लिए।
आवाजें उठती हैं कि सभी खेल संघों में राजपाट की तरह लोग कुर्सी में काबिज होकर बैठे हैं। पदक न जीत पाने का सारा ठीकरा देश में काबिज अल्प-सुविधाओं पर फोड़ दिया जाता है। एक ओलम्पिक ख़त्म होता है, हम कुछ पदक से खुश होते हैं और साथ में दुखी होते हैं फिर से लचर प्रदर्शन के लिए। ओलम्पिक ख़त्म, सब कुछ ख़त्म। 4 साल बाद फिर सब कुछ वापस दोहराया जाता है। इन चार सालों में किसी को कभी याद भी नहीं आती ऐसे खेलों की। ओलम्पिक के बारे में तो फिर भी हमें कुछ मालूम होता है मगर राष्ट्रमंडल और एशियाड जैसे खेलों के बारे में हम कोई चिंता भी नहीं करते। अगर आप करते हैं तो बताइए कि पिछला राष्ट्रमंडल और पिछला एशियाड कहाँ खेला गया था। मुझे नहीं याद और शायद इसलिए आज मैं आत्म-भर्त्सना कर रहा हूँ। अगर आपको याद है तो बताइए, विकिपीडिया या मनोरमा इयर बुक का सहारा मत लीजियेगा।
सच सच बताइए कि आप कितनी चिंता करते हैं इन खेलों की। और ये भी बताइए कि कितनी गालियाँ देते हैं सरकार और सिस्टम को, जब एक भी पदक नहीं मिलता। कितना आसन होता है न सिस्टम को गरिया देना। बचपन से ही सिखाया जाता है। सिस्टम न हुआ गली का कुत्ता हुआ। कुछ भी हो सिस्टम को गाली पड़ती ही है। एक भगवान्, एक कलयुग और एक सिस्टम, इन तीनों को न जाने कितनों के किये की सजा गाली के रूप में मिलती है। कुछ हुआ नहीं कि बस 'हे भगवान्, ये तूने क्या कर डाला' या फिर 'क्या करोगे भाई, कलयुग आ गया है' और नहीं तो फिर सिस्टम तो है ही सब के लिए। अगर गलत बोल रहा हूँ तो बताइए। आगे से कभी भी इन तीनों को गरियाने के पहले सोचियेगा कि आपने क्या किया है।
सिस्टम को गलिया देने से कुछ नहीं होने वाला। जरुरत है खुद सुधरने की। हाँ ठीक है कि क्रिकेट आपको पसंद है मगर क्या आपने कभी दुसरे खेलों को पसंद करने की कोशिश भी की है। कभी करके देखिएगा, सभी खेल पसंद आयेंगे। आप साथ दीजियेगा तो भारत में पदक आयेंगे। हमारे यहाँ प्रतिभाओं की कमी नहीं, सुविधाओं की भी उतनी कमी नहीं जितनी प्रोत्साहन की है। हम अगर ओलम्पिक में पदक चाहते हैं तो खिलाड़ियों को प्रोत्साहन देना होगा। सब कुछ हमें ही करना है, चलिए कुछ कदम उठायें हम!!!

Sunday, May 30, 2010

भारत! अपने मन में बिहार की छवि बदलो, बिहार बदल रहा है!!!

आज यूँही ब्लॉग के समंदर में तैरते हुए इस ब्लॉग पर नजर पड़ गयी। नीतीश कुमार के बिहार, बिहार के विकास, पत्रकारों की भूमिका इत्यादि पर एस एन विनोद साहब ने बड़ी बड़ी बातें लिखी हैं। इस आलेख को पढ़कर समझ नहीं आ रहा है कि क्या प्रतिक्रिया दूं। हसूँ या रोऊँ समझ नहीं आ रहा। अपने आपको वरिष्ठ बताने वाले पत्रकार क्या क्या कर सकते हैं ये सोचकर अजीब लग रहा है। खैर, पढ़िए इस आलेख को इस लिंक पर क्लिक करके और बताइए कि मेरी परतिक्रिया जो मैंने लिखी है आज इस ब्लॉग पर वो सही है या गलत। बताइयेगा जरूर, इंतज़ार में हूँ!!!
नागपुर में बैठे-बैठे अपने किसी दोस्त की बात को मानकर बिहार के बारे में कोई छवि बना लेना मेरे हिसाब से सही नहीं है। विनोद जी के जिस मित्र का एक वरिष्ठ पत्रकार होना वो बता रहे हैं, उनकी बात की सच्चाई का प्रमाण क्या है? पत्रकारिता के जिस समाज को विनोद जी और उनके तथाकथित वरिष्ठ पत्रकार मित्र बिका हुआ और झूठा बता रहे हैं, वो शायद ये भूल गए हैं कि वो खुद भी उसी समाज से आते हैं। विनोद जी और उनके मित्र ने बिहारी पत्रकारों को नीतीश कुमार के हाथों बिका हुआ बता दिया और हम विश्वास कर लेते हैं। मैं विनोद जी और उनके मित्र को लालू यादव के हाथों बिका हुआ बताता हूँ, क्या आप मेरा विश्वास करेंगे? आप करें या न करें, इसका फैसला इस टिप्पणी को पढ़कर या मुझसे फ़ोन पर बात करके नही लिया जा सकता। हकीकत देखनी है तो आइये बिहार और देखिये। 5 साल पहले का बिहार और आज के बिहार में अंतर है। मैं पटना का हूँ और अभी अभी मैं रात के 1 बजे , 35 किलोमीटर की दूरी तय करके घर आ रहा हूँ। इस दूरी को तय करने में मुझे डेढ़ घंटे लगे। 5 साल पहले भी डेढ़ घंटे ही लगते थे मगर कारण अलग था। पहले सड़क में गड्ढे ही गड्ढे थे जिसके कारण गाड़ी रफ़्तार नहीं पकड़ती थी। आज सड़क पर रात के 1 बजे भी ट्रैफिक रहता है जिसके कारण गाड़ी रफ़्तार नहीं पकड़ पाती। क़ानून व्यवस्था में सुधार की इससे बड़ी मिसाल शायद आपको कहीं और न मिले।
किसी मित्र के बारे में झूठी अफवाह फैलाता हूँ मित्रों के बीच में कि उसकी शादी होने वाली है तो दो दिन के बाद मुझे ही कुछ और मित्र लड़की का नाम-गाँव इत्यादि भी बता देते हैं। बात निकलती है तो सच में दूर तलक जाती है। मेरी कही बातों में मिर्च-मसाले लगाकर दो दिन के बाद मुझे ही सनसनीखेज खबर के रूप में बताया जाता है। ये है हकीकत इंसानी मानसिकता की। मैं किसी को कुछ बोलूँगा वो उसी बात को किसी और से कुछ बोलेगा और आप तक पहुँचते-पहुँचते राम श्याम बन जाता है।
बिहार की ऐसी छवि पूरे देश में इन गुजरे हुए 15 सालों में बन चुकी है कि इसे 5 साल में बदल डालना किसी के बूते की बात नहीं। धीरे-धीरे ये स्वयं बदलेगा मगर इसमें सबसे बड़े बाधे ये लोग हैं जो ऐसी उलूल-जुलूल बातें फैलाते हैं। समय दीजिये बिहार को और देखिये ये कैसे बदलता है। विकास दर की स्थिति में बिहार भारत में सिर्फ गुजरात से पीछे दुसरे नंबर पर है। ये साक्ष्य आपको दिखाई नहीं देता विनोद साहब, आपको सिर्फ सुनाई देती है टेलीफोन पर आपके मित्र की बात। उस मित्र की बात जिसका नाम तक आप नहीं बताते, जिसकी प्रमाणिकता पर आप दो शब्द तक नहीं लिखते। और ऐसे किसी शख्श की एक बात पर अपने ही पूरे समाज को भ्रष्ट, चोर, बिका हुआ और न जाने क्या क्या बता देते हैं। थोडा शर्म कीजिये कम-से-कम अपने पत्रकारिता समाज के लिए।
विनोद जी से एक आग्रह है कि किसी से सुनी बात पर इतनी बड़ी छवि बना लेने से पहले तथ्यों को थोडा परख लें। आइये बिहार, देखिये इसे। 15 साल से गर्त में जा रहे बिहार को आज ज़मीन पर आते हुए देखिये। नितीश अगले 5 सालों के लिए आयेंगे या नहीं मालूम नहीं, मगर इतना जरूर है कि हर पढ़ा-लिखा बिहारी यही चाहता है। ये सच्चाई है। मैं पत्रकार नहीं, इसलिए इसे बिहारी पत्रकारों की सफाई मत समझिएगा। मैं विद्यार्थी हूँ MBBS का, आम नागरिक हूँ बिहार का और लिख भी रहा हूँ इसी हैसियत से। कम से कम किसी बिहारी का दिल न दुखाइए!!!

Wednesday, May 26, 2010

न लिखने का कारण!!!

दो हफ्ते से ऊपर गुजर गए, एक भी पोस्ट नहीं लिख पाया हूँ ब्लॉग पर। कुछ आलस, कुछ काम और कुछ घूमना-फिरना; दो हफ्ते कैसे बीत गए पता नहीं चला। पिछले हफ्ते माँ-पिताजी के साथ पुणे घुमने चला गया था। कोई ख़ास कारण नहीं था बस एक पारिवारिक छुट्टी थी। ज्यादा लम्बी भी नहीं थी, पुणे में सिर्फ 3 दिन ही रहना था, 3 दिन तो ट्रेन में ही बीत गए। खैर, एक सुखद यात्रा रही जिसमे काफी कुछ मिला जो लम्बे समय तक याद रहेगा।
आज जब अपने ब्लॉग की तरफ ध्यान दे रहा था तो पाया कि काफी दिनों से कुछ सही मायनों में लिखा नहीं। यूँही समय काटने जैसा ही रहा ब्लॉग की तरफ ध्यान। कुछ लिखना है इसलिए कुछ भी लिख दिया, सिर्फ यही बात रही और कुछ नहीं। लिखने के लिए कोई ढंग का विषय नहीं मिल पाया इन दिनों। अभी जब सोच रहा हूँ कि ये 'ढंग का विषय' आखिर चीज क्या है तो कुछ ठोस जवाब नहीं मिल पा रहा। ज़रा बुद्धिजीवी की तरह सोचूं तो जवाब आता है कि हर वो विषय जो कुछ सोचने को मजबूर करता है वो एक 'ढंग का विषय' है मगर यथार्थ की ओर जाता हूँ तो कुछ और ही जवाब मिलता है। यथार्थ तो सिर्फ ये कह रहा है कि हर वो विषय जिसपर किसी को गरियाने का स्कोप बनता है वो 'ढंग का विषय' है।
बचपन में जब हिंदी की कक्षा में यथार्थ और यथार्थवादी जैसे शब्दों को सुनता था तो मतलब समझ नहीं पाता था। आज यथार्थ का मतलब बड़ी अच्छी तरह से समझ सकता हूँ। जो मुझे मेरे औकात का दर्शन कराये वो यथार्थ है। बुद्धिजीवी बनकर एक 'ढंग के विषय' की खोज करता फिरता हूँ मगर वो विषय मिल जाने पर भी कुछ लिख नहीं पाता। कारण सिर्फ इतना कि उसमे किसी को गरियाने का स्कोप नहीं बनता। सच कहूं तो मूल कारण है कि बुद्धिजीवी हूँ ही नहीं मैं। मेरी औकात बस TRP के चक्कर में पड़े उस हिंदी न्यूज़ चैनल के जितनी है जो किसी भी समाचार के सिर्फ उस पक्ष को दिखाता है जिसमे मसाला हो, जिससे किसी की आलोचना आराम से की जा सके।
बड़ी आसानी से किसी को भी गरियाता चला जाता हूँ अपने ब्लॉग पर और बाद में खुश भी होता हूँ कि आज कुछ दमदार लिख दिया। कभी सरकार को गरियाता हूँ, कभी समाज को, कभी प्रशासन को तो कभी जनता-जनार्दन को। जब कोई नहीं मिलता तो खुद को गरियाने बैठ जाता हूँ। अब लीजिये यही पोस्ट देख लीजिये। आज जब कोई नहीं मिला तो खुद को गरिया रहा हूँ। इस नकारात्मकता से कब मुक्ति मिलेगी पता नहीं। पहले भी ये सवाल उठा चुका हूँ और कई ब्लॉगर साथियों ने भी उठाया है इस सवाल को मगर जवाब कभी नहीं मिला। अपेक्षा भी नहीं है। खैर छोडिये, लम्बे-लम्बे भाषण पहले ही दिए जा चुके हैं इस विषय पर। एक बार फिर से पकाने का कोई इरादा नहीं मेरा। नकारात्मकता के खिलाफ मोटे-मोटे अक्षरों में पोस्ट लिख दी जाएगी मगर जब पुनर्वलोकन होगा तो पाऊंगा कि ये पोस्ट भी नकारात्मकता से भरी एक साधारण पोस्ट है जिसमे मेरी औकात एक बार फिर सामने आ रही है। रहने दीजिये, मेरी औकात सबके सामने नहीं आये यही बढ़िया है। कम से कम मैं भी खुश रहूँ कि मैं हूँ एक बुद्धिजीवी, कि मैं भी लिखता हूँ उन 'ढंग के विषयों' पर। अभी के लिए नमस्कार! कुछ सवालों के साथ फिर हाज़िर होऊंगा। नमस्कार!!!

Wednesday, May 12, 2010

पाकिस्तान का देशप्रेम, वो भी चुराया हुआ!!!

Youtube वेबसाईट के बारे में आप सब जानते होंगे। बड़ी अच्छी साईट है। कभी भी कोई भी गाना सुनना हो आराम से खोजें ओर बेफिक्र होकर सुने। ऐसे ही कई गाने, खासकर पुराने गाने सुनने का शौक़ीन हूँ। जब भी मन करता है Youtube पर जाता हूँ और गाने सुन भी लेता हूँ। एक रात यूँही बैठे-बैठे देशभक्ति का जज्बा दिल में उबाल मारने लगा। बचपन में स्कूल में स्वतंत्रा दिवस ओर गणतंत्र दिवस के दिन कई गाने गाया करता था। उनमे से जो मेरा सबसे प्रिय गाना था वो था, जागृति फिल्म का 'आओ बच्चों तुम्हे दिखाएँ झांकी हिन्दुस्तान की।' उस रात भी इसी गाने की खोज में मैं Youtube पंहुचा। गाने को खोजा और उम्मीद मुताबिक़ तुरंत मिल भी गया। एक गाने की लिंक भी साथ में आ रही थी। गाना थोडा अटपटा लग रहा था इस लिए उसकी तरफ भी मुखातिब हुआ। वही संगीत और हुबहू वैसे ही बोल, फर्क सिर्फ इतना कि उस गाने में सैर पाकिस्तान की हो रही थी। माथा ठनका। फिल्म का पता किया तो मालूम हुई की 'बेदारी' नाम की एक फिल्म पाकिस्तान में बनी थी 1957 में जो बिलकुल 'जागृति' को उठा कर उर्दू में बनाई गयी एक फिल्म थी।
हम हिन्दुस्तानियों से 'जागृति' फिल्म की अहमियत छुपी नहीं है। अगर तीन सबसे बढ़िया देशभक्ति फिल्म के नाम लिए जायेंगे तो 'जागृति' जरूर उनमे से एक होगी। फिल्म की बात अगर थोड़ी देर छोड़ भी दी जाये और सिर्फ गानों की बात की जाये, तो इस फिल्म के गाने हमेशा हर हिन्दुस्तानी की जुबान पर रहते हैं। हमें हमारी हिंदुस्तानियत की याद दिलाते हैं इस फिल्म के गाने। जागृति में चार गाने हैं। बिलकुल वैसे ही चार गाने 'बेदारी' में भी हैं।
1954 में जागृति आई और इसके तीन साल बाद 1957 में पाकिस्तान में बनी बेदारी। सब कुछ जागृति जैसा। हिंदी के संवाद उर्दू में बोले गए, गानों की संगीत और सूरत के साथ कोई छेड़-छाड़ नहीं की गयी बस बोल बदल दिए गए। जहां जहां हिन्दुस्तान था वहाँ वहाँ पाकिस्तान कर दिया गया। जहां गाँधी की महिमा का गुणगान हो रहा था वहाँ जिन्नाह की शख्शियत बुलंद होने लगी। हेमंत कुमार साहब के संगीत से कोई छेड़-छाड़ नहीं हुई बस नाम फ़तेह अली खान साहब का लिख दिया गया। प्रदीप के बोलों को बखूबी मुनव्वर सुल्ताना ओर सलीम राजा ने पाकिस्तानी जुबां दे दी। बाकी सब कुछ वैसा ही। देशभक्ति के जज्बे में कोई बदलाव नहीं किया गया, जो जागृति में था उसे वैसे ही उठा कर पेश कर दिया गया। जागृति हमारे यहाँ कामयाब हुई और बेदारी ने पाकिस्तान में कामयाबी के झंडे गाड़े।
ज़रा सोचिये, जिस मुल्क को अपनी देशभक्ति दिखाने के लिए अपने पडोसी राष्ट्र, जिन्हें वो दुश्मन का दर्ज़ा देते हैं, से यदि गाने और फिल्म चुराने पड़े तो उस मुल्क के देशप्रेम को क्या आँका जाये। मैं ये नहीं कहता कि हमारे हिन्दुस्तान में फिल्म और संगीत चुराए नहीं जाते, मगर इतना जरूर है कि देशभक्ति के जज्बे की जब बात आती है तो वहाँ हमें किसी और से कुछ चुराने की जरुरत नहीं पड़ती। खैर, काफी संवेदनशील मामला है इसलिए ज्यादा नहीं लिखूंगा यहाँ पर, मगर जिनके अन्दर तिनके बराबर भी देशप्रेम है उनके लिए कुछ लिखना जरूरी भी नहीं। मैं कोई अलग नहीं हूँ जो मेरे अन्दर कुछ अलग भावनाएं आएँगी। निचे देखिये 8 गाने के लिंके दिए जा रहे हैं, 4 जागृति के और 4 बेदारी के। गानों को देखिये, उन्हें सुनिए और कुछ महसूस कीजिये। जो महसूस होगा ठीक वही भावनाएं मेरे अन्दर भी हैं, इसलिए कुछ लिख नहीं रहा। धन्यवाद!!!














Wednesday, May 05, 2010

कसाब हमारा मुजरिम है, सजा भी हम ही देंगे!

इधर फिर से कई दिनों से कोई पोस्ट अपने ब्लॉग पर नहीं लिख पाया। व्यस्तता के साथ-साथ उदासीनता भी एक कारण रही ब्लॉग पर न आने की। सच कहूं तो कोई ऐसा वाकया भी नहीं मिला जो मुझे कुछ सोचने और लिखने के प्रति मजबूर कर सके। डाक्टर बने हुए एक महीने पूरे हुए और इन एक महीने में, हालांकि, एकाध बात आपसे बाटने लायक हुई मगर समय की कमी यहाँ बजी मार ले गयी। खैर, आज समय निकला है तो कुछ बाँट रहा हूँ आप सब से। अभी समाचार चैनलों में कसाब की सजा के बारे में कई बातें बतलाई जा रही है। अभी परसों ही विशेष अदालत ने अजमल कसाब को मुंबई हमलों का दोषी करार दिया। क्या सजा मिलने वाली है इसका पूरे देश को बेसब्री से इंतज़ार है। मुझे भी हैं। जानना चाहता हूँ कि जिसने मेरी आत्मा को घायल किया था उसे हमारी न्याय-प्रणाली कितनी सजा देती है।
जब से पैदा हुआ हूँ, भारत में कई आतंकी हमले देख चुका हूँ। '93 मुंबई हमलों की याद नहीं मुझे, तब सिर्फ 6 साल का था। धुंधली सी कोई तस्वीर भी नहीं मन में उस हमले की दिल में। मगर उसके बाद कई हमले देखे। दिल्ली के बाजारों में हुए हमले हों या मुंबई के लोकल ट्रेन में हुए, जयपुर की गलियाँ दहली हों या अजमेर का पाक शहर, घायल हर बार पूरा हिन्दुस्तान हुआ, चोट हम सब की आत्मा पर सीधी जा के लगी। ऐसे ही कई हमले हुए जो शायद याद भी नहीं अभी। हफ्ते-दो-हफ्ते तक एक गुस्सा मन में रहा मगर जो निकला तो निकला ही रह गया। हालत ऐसी हो चुकी थी कि इतनी बार मन घायल हो चुका था और इतनी चोट लग चुकी थी कि एक नए हमले की खबर से कोई ख़ास असर नहीं पड़ता था। दिल्ली, जयपुर में हुआ हमला याद है मगर ज्यादा बाते नहीं। कई हमले तो बिलकुल नहीं याद। इन सब के बावजूद भी 26/11 आज भी अच्छी तरह याद है। एक-एक वाकया, एक-एक दृश्य हुबहू आँखों में हैं।
कुछ तो अलग बात थी उस हमले में। छुप कर वार करने वालों इन आतंकियों में अचानक इतनी हिम्मत आ गयी की खुले-आम, सरे-शाम मौत का एक तांडव उन्होंने मुंबई में खेल लिया। मुझे मुंबई हमला सिर्फ इसलिए नहीं याद कि इस बार चंद दहशतगर्दों ने सीना तान कर आमने सामने की लड़ाई छेड़ी थी हमारे साथ मगर इसलिए भी कि इस बार अपने लोगों को मरते हुए अपनी आँखों से TV पर देखा था हम सबने। शहीद करकरे को जैकेट और हेलमेट पहनते सीधा देखा था हमने। उन्हें पिस्टल लेकर समर-क्षेत्र में उतरते पूरा राष्ट्र देख रहा था। मैं भी अपने घर में TV से चिपका बैठा था। करकरे साहब की मौत की खबर से मन दहल उठा था। अपने किसी अतिप्रिय, अति-परिचित को खोने जैसा दुःख हुआ था उस रात। हमले के 3 साल पहले मुंबई गया था। गेटवे-ऑफ़-इंडिया के सामने खड़े होकर लाखों लोगों की तरह ताज को मैंने भी निहारा था। जब उसी ताज के गुम्बद को जलता हुआ देखा तो लगा जैसे किसी ने मेरे तन-बदन में आग लगा दी हो। ये हमला कोई साधारण हमला नहीं था, सीधे-सीधे करोड़ों हिन्दुस्तानियों की आत्मा को छलनी किया था इस हमले ने। भारत की आत्मा पर हमला था ये हमला।
आज जब कसाब को दोषी करार दिया गया है तो एक ख़ुशी भी है और एक गुस्सा भी। कसाब हमसब का मुजरिम है, सजा तो मिलनी ही चाहिए। मगर क्या इस सजा के लिए हमें इतना वक़्त लेना चाहिए था। इन डेढ़ सालों में, भारत में राष्ट्रपति के बाद सबसे ज्यादा सुरक्षित यदि कोई व्यक्ति था तो वो कसाब था। क्या इस तरह का व्यवहार उचित था? करोड़ों हिन्दुस्तानियों के उस मुजरिम के लिए क्या किसी सुनवाई की जरुरत भी थी?
आज जब सजा का एलान नहीं हुआ है अभी तक, कई बहस हो रहे हैं कि फांसी देनी चाहिए या नहीं। मैं कसाब के लिए किसी भी तरह की रहम की कोई उम्मीद नहीं रखता और मेरे हिसाब से किसी को भी नहीं रखनी चाहिए। वो हमारा मुजरिम है, उसे सजा भी वही मिलने चाहिए जो हम चाहें। सिर्फ फांसी से काम नहीं चलने वाला। हमें इस तरह खून के आंसू रुलाने वाले के लिए इतनी आसान मौत हमें मंजूर नहीं। न्याय-प्रणाली पर पूरा भरोसा है मुझे पर इस बार हमें उसकी जरूरत नहीं। फांसी की आसान मौत का उसके जुर्म के सामने कोई मोल नहीं। अगर सौ बार फांसी लगायी जाए तो भी शायद उसकी सजा कम ही रहेगी। एक अर्जी करता हूँ, छोड़ दीजिये कसाब को। घुमने दीजिये कसाब को मुंबई की गलियों में। दे दीजिये हमें आज़ादी अपनी ओर से उसे सजा देने की। हम जान नहीं लेंगे उसकी। हर एक भारतीय के पास ले जाइये उसे और देने दीजिये उसे उसकी सजा। उसके बाद जो करना है करिए उस कसाब के साथ। जेल में सड़ाना चाहते हैं सड़ाइए उसे, फांसी चढ़ाना चाहते हैं, चढ़ाइए उसे, मगर पहले हम हिन्दुस्तानियों को अपना हिसाब चुकता कर लेने दीजिये। कसाब हमारी न्याय-प्रणाली का मुजरिम नहीं वो हिन्दुस्तान का मुजरिम है और उसे सजा भी हिन्दुस्तान ही देगा, उसे सजा हम देंगे और कोई नहीं!!!

Wednesday, April 21, 2010

हाँ, मैं ही हूँ तुम्हारा मुजरिम

एक बार फिर से पोस्ट की शुरुआत माफ़ी से कर रहा हूँ। काफी कोशिश के बाद भी नियमितता नहीं बरत पा रहा हूँ अपने ब्लॉग के प्रति। डाक्टर बनने और इंटर्नशिप ड्यूटी शुरू होने के बाद से समय का जैसे अकाल ही पड़ गया है। अस्पताल में ड्यूटी के बाद जो समय बचता है उसका काफी हिस्सा पढाई की तरफ लगा देता हूँ। ब्लॉग के लिए कुछ विषय होने के बावजूद कुछ लिख नहीं पाया, शायद प्राथमिकता अभी बदल गयी है। समय बचे और थकावट न हो तो पढाई की ओर ही झुकाव रहता है। फिर भी, इधर पिछले हफ्ते में अगर सच में कोशिश करता तो शायद एकाध पोस्ट लिखे जा सकते थे। आज जिस घटना के बारे में लिखने जा रहा हूँ वो एक हफ्ते पहले मेरे सामने घटित हुई थी मगर उसका प्रभाव मेरे मानस-पटल पर शायद अभी तक है। अब काफी हद तक उबर चूका हूँ और यही कारण है कि आज पोस्ट लिख पा रहा हूँ।
बात पिछले गुरूवार की है। इमरजेंसी ड्यूटी थी लेबर रूम में रात में। शाम 7 बजे से लेकर सुबह 7 बजे तक। चूँकि ज़िन्दगी में पहली बार नाईट ड्यूटी कर रहा था, मन में उत्साह भी था और कौतूहल भी। एक नया अनुभव होने वाला था उस रात जो किसी भी डाक्टर की ज़िन्दगी का अभिन्न अंग है। पहले से सोच रखा था कि रात भर काम करना है सोना नहीं है। काम किया भी। पूरे 12 घंटे में एक सेकंड की भी झपकी नहीं ली। मन मुताबिक़ रात भर जगे हुए ही बैठे बैठे काट दिया था मैंने। मन का होने के बाद भी सुबह ख़ुशी नहीं थी अन्दर। एक दुःख, एक पीड़ा, एक ग्लानि, और एक गुस्सा था मन में जब वहाँ से निकल रहा था। एक घटना ने मुझे झकझोर दिया था।
रात के करीब 9 बजे एक मरीज प्रसव पीड़ा के साथ भर्ती हुई। उस मरीज को hepatitis B नाम की बीमारी थी जिसके संक्रमण का एक माध्यम खून होता है। ऐसे मरीजों के ओपरेशन के समय एक ख़ास तरह की पोशाक डाक्टरों को पहननी पड़ती है इस संक्रमण से बचने के लिए। अमूमन हमारे यहाँ, पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल, में वो पोशाक सरकार की तरफ से मुहैया करायी गयी रहती है। उस रात कुछ ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई कि O.T. में वैसी एक भी पोशाक उपलब्ध नहीं थी। जहां इमरजेंसी में किसी भी वक़्त ऐसे मरीज आ सकते हों और उस पोशाक की जरुरत कभी भी पड़ सकती हो, वहाँ एक भी पोशाक का उपलब्ध न होना आम बात नहीं थी। फिर भी मेरे साथ काम कर रहे सीनियर डाक्टरों का रवैया देख कर ऐसा लग रहा था कि जैसे रोज़ की बात हो।
O.T. में वैसी पोशाक की उपलब्धता की जिम्मेवारी अस्पताल के अधीक्षक की होती है जो O.T. में नियुक्त अपने कर्मचारी की मांग पर ये पोशाक उपलब्ध कराते हैं। हमने आनन-फानन में एक चिट्ठी उनके नाम लिख कर उसी वक़्त भिजवा दिया इस मांग को पूरा करने के लिए। करीब 2 घंटे के बाद अधीक्षक के कार्यालय से उस चिट्ठी का जवाब आया। जवाब में जहां हम पोशाक के आपूर्ति की आशा कर रहे थे, वहाँ एक सामान्य सा वाक्य आया। उसमे लिखा था, "Sister Incharge of the O.T. should be held responsible."
एक मरीज की जान जहां ओपरेशन के इंतज़ार में अटकी पड़ी हो वहाँ इस तरह का जवाब क्या दर्शाता है यह समझने के लिए डाक्टर होने की कोई जरुरत नहीं। रात के तकरीबन 12 बज चुके थे। अस्पताल के बाहर के दूकान से भी उस पोशाक को मरीज द्वारा खरीदवा लेने का हमारा प्रयास विफल हो चुका था। सारे दूकान बंद हो चुके थे जहां वो पोशाक मिल सकते थे। अधीक्षक की ओर से भी कोई प्रयास नज़र नहीं आ रहा था इस बाबत। सच बताऊँ तो अधीक्षक के कार्यप्रणाली को देखते हुए उनसे उम्मीद भी नहीं थी कि वो कुछ करेंगे। उम्मीद की एक आस थी अस्पताल में दुसरे O.T. जहां से वो पोशाक मिल सकते थे मगर उसके लिए हमें सुबह 5 बजे तक का इन्तेजार करना था जब वे खुलें और हमें वो पोशाक मिले।
उन 5 घंटों तक उस औरत की चीख-पुकार हमारे कानों में आती रही। इन सारी तकनीकी बातों से नासमझ मरीज के अभिभावक गिडगिडाते रहे हमारे सामने उसके ओपरेशन के लिए। डाक्टर होकर भी इस तरह की निर्दयता अपने मन में रखने का भी ये मेरा पहला ही अनुभव था। सुबह 5 बजे तक किसी तरह डांट-पीट कर हमने उन्हें टाले रखा। सुबह जब वो पोशाक हमारे पास आये तब तक काफी देर हो चुकी थी। अगर 10 मिनट और पहले ओपरेशन शुरू हो गया रहता तो शायद हम उस बच्चे की जान बचाने में सफल हो गए रहते। कोख से एक मरा हुआ बच्चा जब निकला तो दिल झल्ला उठा। चाहते हुए भी कुछ भी न कर पाने का मलाल हो रहा था और साथ में अस्पताल प्रशासन पर गुस्सा भी था जो अपनी गलती किसी और पर थोप कर चैन की नींद ले रहा था।
जब O.T. के बाहर निकला तो एक डर था कि किस तरह उन अभिभावकों का सामना करूंगा जो रात बार मिन्नत करते रह गए थे जल्दी ओपरेशन करने के लिए। बुरा भी लग रहा था और साथ में डर भी। जब बाहर निकला तो माहौल मन को झकझोर देने वाला था। उस आदमी ने एक उफ़ तक नहीं किया मेरे सामने। उस सदमे में उसने मुझसे कुछ भी नहीं कहा। अभी भी याद आ रही हैं मुझे वो आँखें जिनमे दुःख था, मगर आक्रोश नहीं था, गुस्सा नहीं था। उन आँखों में मेरे लिए कोई अनादर भी नहीं था फिर भी उन खामोश आँखों ने मुझे कह दिया था कि उनका मुजरिम मैं भी था। जब आप जानते हों कि आपकी गलती से किसी ने अपनी ज़िन्दगी की इतनी बड़ी ख़ुशी खो दी हो और वो आपके सामने कुछ भी न बोले, ये काफी होता है आपको आपकी औकात बताने के लिए। यूँ खामोश रह कर उस आदमी ने मुझे मेरी औकात बता दी थी। 10 घंटे की कड़ी ड्यूटी के बाद जहां मैं अपने आप से खुश हो रहा था वहीँ इस एक घटना ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया था।
उसके बाद के कुछ घंटे या सच कहूं तो आज तक समय आत्म-ग्लानि में ही कट गया। पहले सोच रहा था कि मेरी कोई गलती नहीं। दूसरों की तरह मैं भी गलतियां दूसरों पर थोप कर अपना पल्ला झाड रहा था। न जाने कितनी गालियाँ मैंने अधीक्षक महोदय को मन ही मन में दे दिया था। अस्पताल प्रशासन के प्रति मन में गुस्सा उबाल खा रहा था। सरकार के विकास के नारों से मन में ज्वालामुखी फट रहा था। फिर धीरे से दिमाग के किसी कोने में एक बात आई कि मैंने आखिर किया क्या उस जान को बचाने के लिए। क्या मेरे पास कुछ भी नहीं था करने को? क्या रात में उस जगह की दुकानों के बंद होने की सूरत में मैं प्रयास नहीं कर सकता था कहीं और से जाकर उस सामान को लाने की? साधन होने के बावजूद भी मैंने कोई प्रयास नहीं किया। रात भर अधीक्षक के उस जवाब की भर्त्सना मुक्त-कंठ से करता रहा मगर दिमाग में खुद कुछ करने की बात कभी नहीं आई।
आज भी जब उन अभिभावकों को देखता हूँ तो अपना रास्ता बदल लेता हूँ। नज़रें मिलाना तो दूर सामना करने की भी हिम्मत नहीं होती। मन रोता रहता है, झल्लाता रहता है अपनी इस कायरता पर। जी होता है कि उठूं और जाकर कह दूं उस आदमी से, "हाँ, मैं ही हूँ तुम्हारा मुजरिम। देखो मैं कायर नहीं हूँ, देखो मैं कह रहा हूँ कि मैं ही हूँ तुम्हारा मुजरिम।" मगर ये दिल झूठ नहीं बोल पाता। ये जानता है कि मैं कायर हूँ। ये जानता है कि मुझमे हिम्मत नहीं है उस आदमी का सामना करने की। ये सब कुछ जानता है और मन ही मन रोता भी है।
पहली नाईट ड्यूटी होने की अनुभूति कभी नहीं भूल पाऊंगा। याद रखना चाहता था, एक सुखद अनुभूति को। याद रहेगी, एक दुखद दास्ताँ।

Friday, April 09, 2010

नहीं करूंगा मैं दंतेवाड़ा के शहीदों को सलाम!

आज रात साढ़े 8 बजे NDTV इंडिया पर दंतेवाड़ा में हुए शहीदों के ऊपर बनी डौक्युमेंटरी देख रहा था। प्रोग्राम का नाम नहीं मालूम, शायद, 'ग्राउंड जीरो से' था। मूलतः शहीदों के परिवार पर आधारित था यह प्रोग्राम। कोई 10-11 परिवारों को शोक मनाते दिखाया गया। कहीं एक बुढा बाप अपने बेटे से एक घर की आस लगाये इंतज़ार कर रहा था तो कहीं एक पत्नी अपने कोख के लाडले को उसके पिता से मिलवाने का इंतज़ार कर रही थी। कहीं एक भाई दुसरे भाई के कमज़ोर दिल के होने की दुहाई देकर उसे पिता के चले जाने की खबर नहीं दे पा रहा था तो कहीं एक बच्ची सिर्फ यह कहकर फफक पड़ी की पापा उसे घुमाने ले जाया करते थे। मरने के ठीक पहले एक जवान ने अपने घर बात भी की। कितना बोझ होता है एक जवान के ऊपर। देश के लिए मर जाने का जज्बा भी है ओर साथ में परिवार की फिक्र भी। 2 मिनट की उस बात में उस जवान ने अपनी पत्नी से सिर्फ इतना कहा, 'बच्चों का ख्याल रखना।' उसके लाडलों का ख्याल तो किसी तरह रोते-फफकते ही सही मगर उसकी पत्नी रख ही लेगी मगर अपने इस लाडले का ख्याल हमारी भारत माता क्यूँ नहीं रख पायी।
जिस दिन सुबह में अखबार के पहले पन्ने पर मोटे-मोटे अक्षरों में हमले की खबर और तस्वीरों को देखा है, उस दिन से मन विचलित हुआ जा रहा था। एक बार भी कभी कोई समाचार चैनल देखने का जी नहीं कर रहा था। हमेशा डर लगा रहता था। लगता था पता नहीं कब कोई तस्वीर ऐसी दिख जाए या कोई खबर ऐसी सुनाई पड़ जाये जिससे मन और बैठ जाये। आज किसी तरह से हिम्मत जुटाया और दिलेरी के साथ सारा प्रोग्राम देख गया। ताज होटल के हमले ने भी इस तरह अन्तःमन को नहीं झकझोरा था जैसा आज हुआ। दिमाग सन्न हो कर रह गया। गला सूख गया। रोने का मन हुआ तो आँखों में आंसू भी नहीं आये। कुछ बोलने के लिए जब जुबान को हिलाना चाहा तो वो भी संभव नहीं हो सका। बस साँसें चलती रही और दिल धड़कता रह गया। ज़िन्दगी की यही दो निशानियाँ उस वक़्त थी जिससे दिलासा हुआ कि जिंदा हूँ।
जब थोड़ी सुध आई तो प्रोग्राम ख़त्म हो चुका था। थोडा जोर देकर सोचा तो तरस आया अपने आप पर। कितनी आसानी से शिथिल हो गया सिर्फ एक प्रोग्राम देखकर। कहने को तो जवान हूँ मगर तरस आया अपनी जवानी पर जब उस बूढ़े बाप को देखा अपने बेटे की अर्थी उठाये। कहने को तो मर्द हूँ पर तरस आया अपनी मर्दानगी पर जब देखा उस लड़के को पूरे सम्मान के साथ अपने पिता को मुखाग्नि देते हुए। अब तो रोना भी नहीं आ रहा था। खुद अपने आप को नीचा दिखाने का मन हो रहा था। जब बिजली कटती थी तब उसकी शिकायत होती थी पिताजी से। आज जब पिताजी ने इनवर्टर लगवा दिया है तब शिकायत होती है कि बिजली जाने के बाद AC नहीं चल पाता। पिताजी जेनरेटर का भी इंतजाम करा ही देंगे। तब शिकायत होगी कि कोई है नहीं जो रात में आकर AC चला दे और सुबह बंद कर दे। इंतजाम उसका भी हो जायेगा। AC कमरे में बैठे, LCD टीवी पर आराम से फिर किसी नक्सल हमले की खबर देखूंगा। 2-4 दिन फिर विचलित रहूँगा। फिर सब ठीक। सारा ध्यान एक बार फिर IPL की चकाचौंध की ओर चला जायेगा। हो सकता है एक और ब्लॉग लिख दूंगा अपने आप को गाली देते हुए, अपने आप पर लांछन लगाते हुए। थोडा कम विचलित हुआ तो खड़ा कर दूंगा सरकारी नीतियों के खिलाफत का पहाड़।
और क्या करूँगा, कुछ भी तो नहीं। कुछ कर भी सकता हूँ क्या। कुछ भी तो नहीं। अपनी डाक्टरी छोड़ कर चल तो नहीं दूंगा एक ऐसे जगह जहां 100 किलोमीटर की दूरी तय की जाती है 10 घंटे में, जहां बिजली नहीं, पानी नहीं, रहने को घर तक नहीं। ऊपर से नक्सलियों की गोली का शिकार कभी भी बन सकने का डर। AC के लिए कम्प्लेन करने वाला कैसे वहाँ जाकर रह सकता है। वो कैसे अपनी ज़िन्दगी वहाँ गुजारने की सोच सकता है। वो कोई और नहीं, वो मैं भी नहीं, वो है एक आम हिन्दुस्तानी, वो वहाँ जाकर नहीं रह सकता। वहाँ रह सकता है तो कोई ख़ास हिन्दुस्तानी। वहाँ रह सकता है तो सिर्फ CRPF का वो जवान जो इतनी दिक्कतों के बावजूद भी कभी कम्प्लेन नहीं करता। जहां जाकर हम दो बूँद पसीना बहाने को तैयार नहीं वहाँ वो आये दिन खून बहाता रहता है। पता नहीं कहाँ से आता है वो जज्बा उनके पास। इतना सब कुछ हो जाता है फिर भी पीछे नहीं हटता वो। मुख से एक ही बात हमेशा निकलती है, "आ देखें ज़रा किसमे कितना है दम!" ऐसे ख़ास हिन्दुस्तानी को सलाम करने का मन नहीं करता। सोच रहे होंगे कि क्यूँ सलाम करना नहीं चाहता। क्यूँ करूं मैं सलाम। आखिर औकात ही क्या है मेरी। कुछ भी हुआ नही कि बस बैठ गए ब्लॉग पर भड़ास निकालने। निकाल दिया और हो गए खुश कि रख दी सब के सामने अपनी बात। अरे क्या होगा ये लिखकर। नहीं करूंगा मैं सलाम उस ख़ास हिन्दुस्तानी को। नहीं करूंगा उसका अपमान अपनी सलामी से। एक अर्जी है आप भी तब ही करियेगा उन्हें सलाम जब लगे कि आपका सलाम उनके चरणों के धुल के भी बराबर है। छोटी सी अर्जी है सोचियेगा जरूर और यथासंभव मानियेगा भी!

Thursday, April 08, 2010

न्यूज़ चैनल की साप्ताहिकी- एक व्यंग्य!

इन दिनों यूँ तो काम की आपा-धापी में कभी समय नहीं मिल पाया मगर जब भी समाचार चैनलों की तरफ मुखातिब हुआ तो हर जगह शोएब-सानिया के चर्चे ही मिले। कई लोग कई तरह की बातें कर रहे थे, कुछ विचार अपने मन में भी आये जिन्हें ब्लॉग के माध्यम से प्रस्तुत करने का जी हुआ मगर मौका नहीं मिल पाया। आज जब कुछ लिखने बैठा हूँ तो असमंजस में पड़ गया हूँ। शोएब-सानिया पर कुछ लिखूं या मीडिया में TRP की बढती महत्ता पर। कुछ समझ नहीं आ रहा। दोनों पर कुछ लिखने का मन कर रहा है। 12 घंटे की इमरजेंसी ड्यूटी के बाद अभी काफी थकावट भी महसूस हो रही है। थकावट के असर को कम करने के लिए चलिए थोड़ी मनोरंजक बातें ही हो जाएँ। तो आज का पोस्ट अभी के समय के सबसे बड़े मनोरंजन के माध्यम, न्यूज़ चैनलों पर एक व्यंग्य ही हो जाये। प्रस्तुत है सभी भारतीय न्यूज़ चैनल पर हफ्ते भर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों का ब्यौरा!
दिन सोमवार, हफ्ते का पहला दिन:
सुबह सुबह एक और प्रिन्स एक खड्डे में गिर गया। पूरा का पूरा सोमवार सभी चैनलों पर प्रिन्स की खबर से ही पटा रह गया। रात में जब तक उसे खड्डे से निकाल नहीं लिया गया, किसी भी रिपोर्टर ने चैन से सांस नहीं ली। पल-पल की खबर, सबसे तेज़, घटना की सबसे ताज़ी तस्वीरें इत्यादि ने जमकर एक ब्रेकिंग न्यूज़ बना दिया। दिन भर का रोज़गार न्यूज़ वालों को तो मिल ही गया, साथ साथ उन सब लोगों को भी मिल गया जो दिन भर इस ताक में कैमरे के आसपास टिके रह गए कि कभी उनकी भी तस्वीर टीवी पर आ जाये। समझ में नहीं आता कि कैसे अचानक इन ३-४ सालों में ऐसी घटनाओं की संख्या इस प्रकार बढ़ गयी है। सोचता हूँ कि कहाँ अंतर आया। क्या पहले गड्ढे नहीं खोदे जाते थे या पहले प्रिन्स जैसे बच्चे पैदा नहीं लिया करते थे। या ऐसा हो गया है कि न्यूज़ वालों के पास समय ही समय है ऐसी ख़बरों को हम तक पहुचाने के लिए। स्कूल में गुरु जी कहाँ करते थे "ऑलवेज थिंक पोजिटिव, हमेशा सकारात्मक सोचो।" चलिए कुछ सकारात्मकता इस प्रिन्स-काण्ड में भी ढूंढें। न्यूज़ चैनलों पर इनकी बढती संख्या का कारण क्या हो सकता है। या तो अभी गड्ढे ज्यादा संख्या में खोदे जा रहे हैं, या प्रिन्स जैसे चंचल बच्चों की संख्या बढ़ गयी है या फिर चैनलों का कभरेज एरिया बढ़ गया है। अगर गड्ढे ज्यादा खोदे जा रहे हैं तो ख़ुशी मनाने की बात है, अरे भाई, देश के infrastructure का विकास हो रहा है। अगर प्रिन्स आज ज्यादा खेल-कूद कर रहा है तो ये भी ख़ुशी की बात है, आखिर, वो कुपोषण का शिकार होकर घर में कमजोर तो नहीं बैठा हुआ है; कहीं न कहीं स्वास्थय सेवाएं सुधरी जरूर होंगी। यदि चैनलों का बढ़ता कवरेज कारण है तो भी खुश हो जाइये, अरे, qualitative न सही quantitative विकास तो जरूर हो रहा है इन चैनलों का। तो जनाब जब भी कभी कोई प्रिन्स कहीं गड्ढे में गिरे तो अफ़सोस मत मनाइए न ही न्यूज़ वालों से रुष्ट होइए, ख़ुशी मनाइए, आखिर, हमारे विकास की जीती जागती तस्वीर जो ठहरी ये खबर।
मंगलवार, दूसरा दिन:
कल दिन भर प्रिन्स की थकावट के बाद आज कुछ आराम करने का मौका मिल गया चैनल वालों को। न कही कोई प्रिन्स गड्ढे में गिरा, न कहीं किसी बिहारी पर हमला हुआ और न ही किसी सेलिब्रिटी ने किसी को तमाचा मारा। कल के भयानक रोज़गार के बाद आज की बेरोज़गारी में कोई खबर ही नहीं मिली जिसे सनसनीखेज बनाया जा सके। करें तो करें क्या। ध्येय तो एक ही बचा है न्यूज़ का आज के युग में, और वो है मनोरंजन। तो छोटे परदे से बढ़कर मनोरंजन और कहाँ। दिन भर आनंदी, अम्मा जी, लाली, पुनपुन वाली, इत्यादि न्यूज़ चैनलों पर छाई रहीं। कौन से सीरियल में क्या होने वाला है ये भी ब्रेकिंग न्यूज़ बन गया। जब बीच बीच में माहौल थोडा सीरियस होता गया तो लाफ्टर शो की झलकियाँ भी मिलीं। रात होते-होते जब नक्सलियों से न्यूज़ वालों की खस्ताहाल देखी नहीं गयी तो उन्होंने ही ब्रेकिंग न्यूज़ प्रदान कर दी सब के लिए। छोटा-नागपुर के जंगल में एक और नक्सल हमला। मध्य रात्रि से अचानक फिर से सभी संवाददाता सक्रिय हो गए।
बुद्धवार, वृहस्पतिवार एवं शुक्रवार:
तीनों दिन चौबीसों घंटे एक ही समाचार। ब्रेकिंग न्यूज़, नक्सल हमला। पहला दिन सिर्फ हमले की विस्तृत रिपोर्ट में बीत गया। दूसरा दिन सरकारी मशीनरी की खामियां निकालने में और तीसरा दिन पक्ष-विपक्ष में बहस कराने में ही निकल गया। बीच में कुछ घंटे कभी कभार उन शहीदों को भी याद कर लिया गया जो हमले के शिकार बने। सब को अपनी-अपनी बात रखने का मौका दिया गया। जो इस घटना से सम्बंधित हो उसने जितना भाग चैनल वालों के साथ लिया उससे कही ज्यादा उन लोगों ने लिया जिनका इस घटना से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं। आम जनता के लिए SMS पोलिंग भी खोल दी गयी। आम लोगों ने जमकर अपनी राय भेजी। समाचार की जगह सभी चैनलों पर वही SMS नीचे स्ट्रीम होते रहे। इन तीन दिन देश-दुनिया में और जगह क्या हुआ नहीं हुआ, किसी को मालूम नहीं चला। आखिर क्यों पता चले। हमले की ख़बरों से ही जब ऐसी TRP मिली तो क्यों कोई और खबर खोजे। क्यों कोई बेकार की मेहनत करे। आराम से ऐसे ही नाम और पैसे न कमाए जाएँ??
शनिवार:
लीजिये, अभी नक्सल हमले ने दम तोडना शुरू ही किया था कि सचिन ने शुक्रवार की शाम ही एक शतक ठोक दिया। शनिवार की सुबह से ही सचिन पुराण सभी चैनलों पर शुरू हो गए। पूरी की पूरी जीवन गाथा न जाने हर घंटे कितनी बार बारम्बार दिखाई गयी। ऐसी ऐसी बातें बताई गयी सचिन के बारे में जो शायद सचिन को खुद नहीं मालूम होंगी। सचिन का मन भी अघा गया होगा अपने बारे में एक ही बात हर घंटे सुन कर मगर ये रिपोर्टर का मन कभी नहीं अघाता। चाहे कितनी ही बार हो, किसी भी समाचार को प्रस्तुत करने में उनकी तन्मयता कभी कम होती नहीं दिखती है। रात तक तो बच्चों-बच्चों को सचिन के बारे में इतनी बातें पता हो गयीं होंगी जितनी उन्हें खुद के बारे में भी नहीं होगी। खैर, कम से कम न्यूज़ वालों ने सामान्य ज्ञान तो बढाया बच्चों का।
रविवार:
आज फिर से न कहीं कोई बम विस्फोट हुआ, न ही किसी नेता का कोई घोटाला पकड़ा गया और न ही किसी औद्योगिक घराने के भाइयों के बीच की कोई टकराव सामने आई। आज फिर वही स्थिति उत्पन्न हो आई। करें तो करें क्या। एक बार फिर रुख हुआ छोटे परदे की तरफ। फिर वही आनंदी, फिर वही अम्माजी, फिर वही राजू श्रीवास्तव। फिर इन्ही लोगों ने न्यूज़ चैनलों को बचा लिया नंगे होने से। आम जनता को अपने साथ खिचे रहने के लिए बेतुके SMS पोल आज भी यूँही चलते रहे और लोग आराम से अपने SMS भेजते रहे। न्यूज़ चैनल को TRP आज भी पूरी मिल ही गयी।
सोमवार, अगला सप्ताह:
आज फिर शुरुआत हुई एक प्रिन्स के गड्ढे में गिरने से। आज फिर वही सब हुआ जो पिछले हफ्ते हुआ.................

Wednesday, April 07, 2010

आखिर बन ही गए डाक्टर!

काफी दिनों से ब्लॉग के प्रति एक बार फिर सक्रियता घट गयी है। पहले भी ऐसा हो चुका है। पहले अमूमन इसके पीछे का कारण विषय की अनुपलब्धता हुआ करती थी। इस बार बात थोड़ी अलग है। पिछले दिनों इतना कुछ अचानक गुजर गया ज़िन्दगी में कि खुद उस ओर दुबारा ध्यान ही नहीं जा सका। सारी बातें लिखने लायक थी, आपसे बांटने लायक थी मगर इतनी बातें हो गयीं कि लिखने का समय ही नहीं मिल सका।
सबसे पहले, 31 तारीख को साढ़े चार साल की तपस्या (थोड़ी कम तपिश वाली) का फल मिला। अंतिम वर्ष की परीक्षा के परिणाम घोषित हुए और जनाब के नाम के आगे डाक्टर लग गया। सोने पर सुहागा कि अपन पटना विश्वविद्यालय के topper भी बन गए। बन गए तो बन गए। डाक्टर बनने के साथ आगे की औपचारिकताओं के कारण २-३ दिन व्यस्तता रही। अस्पताल में इन्टर्नशिप में joining और तब से फुर्सत के कुछ क्षण, जिसमे ब्लॉग लिख सकूं, की तलाश ही चली। आज समय निकला है तो सोचा अंततः देर ही सही, कम से कम इस ख़ुशी को बाँट तो लूं यहाँ।
इंटर्नशिप में आने के बाद सही मायने में डाक्टरी करने का मौका मिला। कल का दिन काफी महत्त्वपूर्ण रहा। ज़िन्दगी में पहली दफा ओपरेशन में हाथ आजमाने का मौका मिला। जिस क्षेत्र में शुरू से रूचि रही हो, उसका पहला काम करके जो अनुभूति होती है उसे बयां करना मुश्किल है। सिर्फ यही कह पाऊँगा कि ख़ुशी बहुत हुई। देर सबेर शायद कोई फोटो भी अपलोड कर पाऊँ।
खैर, इतना कुछ घटित हुआ अपनी ज़िन्दगी में और इन सब के बारे में विस्तार से न लिख पाने का मलाल महसूस हो रहा है। शायद थोडा समय मिल पाता तो सब कुछ पर एक पूरा पोस्ट समर्पित होता। शायद आगे कभी retrospection में कुछ पोस्ट लिख भी दूं मगर अभी इतना ही।
अपनी ज़िन्दगी के अलावा इन दिनों देश दुनिया में भी काफी कुछ हुआ जिसपर के विचार मन में उफान मार रहे हैं शब्दों के रूप में बयां होने के लिए। शोएब-सानिया प्रकरण हो या माओवादी हमला, मन को कचोटने के लिए काफी कुछ था। एक मामला जिसे बिना मतलब राष्ट्रीय महत्व का बना दिया गया और दूसरा जिसे अपनी उचित महत्ता इस TRP के चक्कर में पड़े मीडिया के कारण शायद कभी नहीं मिलेगी। इन सब बातों पर बहुत कुछ लिखना है। वक़्त निकालना है। समय मिला और कुछ पोस्ट आयेंगे जरूर। इंतज़ार अभी और भी...