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Tuesday, February 21, 2012

काश.........काश.......काश!

शाम के 5 बज चुके थे........वो बेचैन सा हो रहा था.......लैब में बैठे बैठे कोई काम न था.........बस मैडम के जाने का इंतज़ार.....मन ही मन गालियाँ दे रहा था......कब जाएगी ये खूसट और कब निकलूंगा मैं बाहर. बाहर जाने की यूँ कोई हड़बड़ी नहीं रहती थी, पर उस दिन बेचैन था. वो जो आई हुई थी. बाहर लाइब्ररी में बैठ कर इंतज़ार कर रही थी उसका......पिछले आधे घंटे से........जुगत में बैठा था कि कब मैडम निकले और वो जाकर उससे मिले................सुबह सुबह फ़ोन पर झगडा जो हुआ था. ऐसे ही किसी बात पर कहा-सुनी हो जाना आम बात हो चुकी थी.........सुबह में झगडा और शाम में फिर मिल कर बात सलटा लेना अमूमन रोज़ की बात. उस रोज़ भी वो मुलाक़ात वैसी ही होने वाली थी और यही उसकी बेचैनी का कारण भी......
मैडम के कमरे में कुछ सुगबुगाहट शुरू हुई........मन को थोड़ी तसल्ली हुई कि अब बस थोड़े देर की ही बात है........वो खुश था. उसने मिस कॉल मार दिया..........5 -10 मिनटों में मैडम भी चली गयी. दौड़ता हुआ वो बाहर निकला. लाइब्ररी की तरफ जैसे ही कदम बढ़ाये, उस ओर से वो आती हुई दिखी.....
खुले हुए लहराते बाल, कुर्ते-जींस पहने हुए, होठों पर मुस्कान लिए वो उस ओर आ रही थी............उसने नोटिस किया, उसने बाल कटवाए थे. पूरे छोटे नहीं, किनारों से. उसे लम्बे बाल पसंद थे. उसका बाल कटवाना उसे अच्छा नहीं लगता था. न बाल खुले रखना. वो चाहता था कि हमेशा उसके बाल लम्बे ही रहे. उसे उसका जींस पहनना भी पसंद नहीं था. कई बार जाहिर भी कर चुका था ये बात...........यूँ बाल कटवा कर इस तरह से जींस में उसका आना उसे गंवारा नहीं गुजरा..........वो समझ नहीं पा रहा था कि सब कुछ जानते हुए भी क्यूँ वो आज सुलह करने इस तरह से आई थी........उसे कुछ समझ नहीं आया. वक़्त की नज़ाक़त और उसकी मुस्कान को देखकर उसने चुप रहना ही मुनासिब समझा..........कई बार ख़ामोशी एक ऐसी जरुरत बन जाती है जिसके सामने कोई शब्द मायने नहीं रखते........ये ऐसा ही समय था........वक़्त के ऊपर सब कुछ छोड़ते हुए वो भी मुस्कुराता हुआ आगे बढ़ा.......
"काफी देर इंतज़ार करना पड़ा."
"नहीं लाइब्ररी में पढाई कर रही थी, इसलिए समय का पता नहीं चला."
"चाय पीना है?" 
"चलो."
न जाने कितनी दफे चाय इस तरह बातचीत के बीच समय काटने के लिए एक मजबूत हथियार बनेगा, वो सोच रहा था.........
"तुमने तो नोटिस भी नहीं किया, मैंने बाल कटवाए हैं."
"ह्म्म्मम्म.........मैंने किया..........कुछ बोलने को नहीं है उसपर इसलिए बोला नहीं.......यू नो, आई डोंट लाइक इट मच!"
"अरे, शौख से नहीं कटवाया है बाबा........बाल फूटने लगे थे नीचे.........नहीं कटवाती तो ये कभी नहीं बढ़ते."
"हम्म्म्म........मगर अचानक?........सुबह तो कुछ नहीं बताया."
"सुबह तुम्हारा मूड कहाँ था बात करने का..........कुछ बोलो तो उल्टा जवाब.........क्या बताती.........वैसे भी अचानक ही प्रोग्राम बना.........सब जा रहे थे तो मैं भी चली गयी..........जावेद हबीब में कटवाया है......99 रुपये में."
"गधा जनम छुड़ा ही लिया आखिर........हेयर डिजाइनर से कटवा कर.....अच्छा है.........बट, यू नो, आई स्टील डोंट लाइक ईट."
एक चाय, एक काफी और 2 मफिन लेकर वो काफी शॉप पर ही बैठ गए थे.......... बातों बातों में उसने बताया की बाल काटने वाले, उस पार्लर में, लड़के थे...........काफी की सिप मुंह की मुंह में और कप की कप में ही रह गयी. बात बर्दाश्त से बाहर हो चुकी थी. जींस पहनना, बाल खुले रखना, उन्हें कटवाना ये सब वो बर्दाश्त कर चुका था. लड़कों से बाल कटवाना उसे बर्दाश्त न हुआ..........जिन बालों में खुद ऊँगली फिराने की उसकी चाहत थी उन बालों को अभी थोरी देर पहले कोई लड़का घंटे भर संवार रहा था, इस सोच ने उसे अन्दर तक गुस्से से भर दिया. उसने उससे पूछना चाहा कि क्या उसे ऐसी सोच से कोई दिक्कत नहीं. बहुत कोशिश की अपने गुस्से को काबू में रखने की पर वो रख न सका. अंत में पूछ ही लिया उसने..........और जिस बात का डर था, वही हुआ...........जब जवाब नहीं के रूप में आया तो फिर उसके पास बोलने को कुछ नहीं बचा था. कुछ और बात करने को उसका दिल नहीं हो रहा था..........
सुबह के झगडे को सुलझाने वाली मुलाक़ात, खुद एक झगडे का सबब बन कर रह जाएगी, वो नहीं जानता था.........बड़ी कोशिश की उसने खुद को समझाने की कि ऐसा होता है आज के युग में. वो कल की बात थी जब लड़कियां लड़कों के सलून में नहीं जाती थी और लड़के लड़कियों के. आज दोनों के लिए एक ही पार्लर होते हैं.............लाख कोशिशों के बावजूद भी वो खुद को समझा न सका..........खुद पर धिक्कार करने की भी कोशिश की कि छोटे शहर की छोटी सोच के साथ ही जियेगा, मगर जितना धिक्कार करता उतना ही उस सोच पर उसे गुमान होता..........आखिर मध्यम-वर्गीय परिवार से आने का उसे गर्व जो था. वो चुप नहीं रहा............बाते हुई, झगडे बढे.........भावनाओं को ठेस पहुची........दोनों तरफ..........जो मुलाक़ात सुबह के झगडे को ठीक करने के लिए शुरू हुई थी वो खुद एक ऐसे झगडे का रूप ले चुकी थी जिसका अंत उसके उठ कर वापस अपने घर चले जाने से हुआ. जींस पहनने पर तो कोई बात भी नहीं हो सकी. वो खफा थी. उसकी छोटी सोच से.......उसके मध्यम-वर्गीय ढकोसलों से..........उसकी बातों से...........अपने ऊपर उसके विश्वास की कमी से..........


कुछ दिन बाद:
वो पहले से तय प्रोग्राम के मुताबिक़ शहर छोड़कर अपने घर वापस जा चुकी थी.........इसे यही रहना था..........इसी शहर में, इसी लैब में.........वो इसी कैम्पस में था...........रोज़ लैब जाता था........सुबह फ़ोन पर थोड़ी बात होती थी........झगडा सुलझ चुका था.......रोज़ 5 बजते थे........बेचैनी रोज़ होती थी........मिलने की नहीं, इस बात की कि आज बाहर कोई मिलने वाला नहीं होगा..........रात को लाइब्ररी में अकेले अपने लैपटॉप और किताबों के साथ घंटों बैठता था...........बाहर निकलेगा तो फ़ोन पर कोई बात करने वाला न होगा, इस सोच से डर जाता था..........बाहर निकलता था तो हर ज़र्रा उसे उसकी याद दिलाता था........उस पेड़ के नीचे बैठ कर कभी प्यार की तो कभी तकरार की बाते करते थे.......वहां वो फिसल कर गिर रही थी तो उसने हाथ थाम कर उसे रोका था..........उस कैंटीन में बैठ कर शाम का नाश्ता करते थे..........बाते करते हुए इसी रास्ते से रात के 2-3 बजे लाइब्ररी से निकल कर काफी पीने जाते थे.........वो काफी शॉप, जहां न जाने कितनी बाते हुई है, कितने झगडे हुए हैं, कितने झगडे सुलझे हैं........सब कुछ..........वही काफी शॉप जहां वो अंतिम झगडा भी हुआ था..........उस सोच का झगडा.........क्या वो झगडा जरुरी था, क्या वो उसे समझ नहीं सकता था या क्या उसने झगडा करके कोई गलती की थी..........क्या इसकी पसंद-नापसंद को समझने का उसका कोई फ़र्ज़ न था..........क्या उसने इसका विश्वास तोड़ा था.........न जाने कितने सवाल मन में आते हैं और चले जाते हैं........बस रह जाती है एक कचोट की काश साथ रहने के उन अंतिम कुछ दिनों में वो झगडा नहीं करता. ...........काश.........काश.......काश!



Monday, December 13, 2010

उम्र और इंसानियत का रिश्ता, सुना था, इन्वर्सली प्रपोर्शनल होता है!!!

भगवान् भला करे उसका जो आज ड्यूटी पर आने से पहले उससे बात हुई और उसने दुआ दी कि आज कोई डेथ सर्टिफाई न करनी पड़े........पता नहीं इमरजेंसी ड्यूटी के ऐसे कितने और 8 घंटे मिलेंगे ज़िन्दगी में जिसमे एक भी मौत से पाला न पड़े.........अपनी 8 घंटे की ड्यूटी बजाकर इमरजेंसी से निकल ही रहा था कि बाहर गेट पर एक दोस्त मिल गया, एक बैचमेट...........पिछले 5 सालों में जो कुछ चीज़े कमाई हैं यहाँ कॉलेज में उनमे से एक उसकी दोस्ती भी है. अगले 8 घंटों की शिफ्ट उसकी ही थी..........हाथ में सिगरेट लिए अपने मदमस्त चाल में वो चला आ रहा था.
"एक सुट्टा मारेगा?", उसने पूछा. मैंने कुछ नहीं कहा. "मारा कर साले........कब तक सन्यासी बना रहेगा.........बड़े काम की चीज़ है साले........जो अन्दर 8 घंटे तक दिमाग की दही करके आया है न उससे बचने का सबसे सरल, सस्ता और टिकाऊ उपाय है बे."........ पिछले ५ सालों में न जाने उसने कितनी बार सिगरेट के गुण गिनाये थे........."चल कॉफ़ी पीला यार, सर दर्द कर रहा है.", हर बार की तरह मैंने डिमांड रख दी. बगल के कैंटीन में दो कॉफ़ी का आर्डर करके उसने पूछा, "क्यूँ बे साले, आज कितनों को मौत के घाट उतारा बे?"............... इंटर्नशिप शुरू होने के बाद से हर इमरजेंसी शिफ्ट के बाद आपस में बात करने को ये ही पहली टोपिक मिलती थी. साढ़े चार सालों तक बीमारियाँ और उनके इलाज़ को पढने के बाद जब सच में बीमारियों से पाला पड़ा तो पता चला कि साली सारी किताबें बकवास हैं. मौत की कोई गारंटी नहीं होती. वो अपना एप्वाईंटमेंट खुद लेकर आती है. और तुम कुछ भी कर लो, कुछ नहीं कर सकते.
"अबे यार, आज तो गज़ब हो गया, साला एक भी डेथ सर्टिफाई नहीं किया यार. भीड़ थी, पेशेंट थे, लेकिन फिर भी, पता नहीं. जानता है, आज आने के पहले एक पुरानी दोस्त से बात हुई, फोन पर. उसने दुआ दी थी कि आज मौत से पाला न पड़े. साली की दुआ लग गई लगता है.", मैंने उससे कहा............. "सच में यार, लकी मैन. अब मैं जाता हूँ, देखता हूँ भगवान् मेरे हाथों कितनो की वाट लगाता है आज. साला अजीब लगता है यार..........एक जज मौत की सजा सुनकर कलम की नीब तोड़ देता है. उस कलम से फिर कोई काम नहीं होता, और हम साले न जाने यूँही लगातार कितनो को सर्टिफाई करते रहते हैं.........यार अब तो हाथ भी नहीं धोता मैं सर्टिफाई करने के बाद." सिगरेट की अंतिम कश खीचते हुए उसने कहा.............. "ओये दो-दो रसगुल्ले भी बढ़ाना यार", कैंटीन वाले को उसने आर्डर किया.............. "कितना अजीब लगता है न यार, मौत की बातें कर रहे हैं और मन साला रसगुल्ले खाने को कर रहा है. साली इंसानियत कही घोड़े बेचकर सो गयी लगती है.", मैंने उससे कहा था. "अबे जो होता है साला अच्छे के लिए ही होता है. जब तक मौत से पाला नहीं पड़ता था तब तक मौत 'मौत' लगती थी अब तो साली यारी हो गयी है उससे. अच्छा है न कि कोई फर्क नहीं पड़ता. साला अगर लोड लेने लगते तो ज़िन्दगी यूँही सड़ जाती. छोड़ बे, अपन लोग ऐसी लाइन में आ ही गए हैं तो अब इस बात का रोना क्या. एन्जॉय कर साले." उसने मेरा ढांढस बढाया था. अपने मन को शांत करने के लिए आदमी कई बहाने ढूँढ लेता है, उसने भी यही किया था.
कॉफ़ी की चुस्कियां ख़त्म हो चुकी थी. मेरे चेहरे पर पिछले 8 घंटों की थकान और उसके चेहरे पर आने वाले 8 घंटों की चिंता साफ़ दिख रही थी.............. ऊपर से तो हर कोई मजबूत दिखना चाहता है कि उसे मौत से कोई फर्क नहीं पड़ता पर अन्दर से सब विचलित होते हैं............ वो भी ऐसा ही था. मन में उसके भी यही चल रहा था. "जा ड्यूटी कर, किस्मत अच्छी रही तो तुझे भी एक भी सर्टिफाई नहीं करना पड़ेगा." मैंने उसे हिम्मत दी थी. "साले खुद एक लौंडिया की दुआ से बच गया तो बड़ा फ़कीर बन रहा है!" यूँही डपट कर हंस देना उसकी पुरानी आदत थी. उस समय भी उसके चेहरे पर हंसी दिख रही थी. अंतिम रसगुल्ले को मुंह में रखते हुए मैंने उससे कहा, "चल अब घर चलता हूँ भाई. जाकर सबसे पहले उसे ही फोन करके शुक्रिया करूँगा. जा तू भी, सर खोज रहे होंगे." "साला वो टकलू क्या खोजेगा मुझे. साला खुद तो कुछ आता नहीं बस बैठा हुआ आर्डर चलता रहता है.", बोलते हुए वो मेरे साथ कैंटीन से बाहर निकल गया.
बाहर थोड़ी अफरा-तफरी मची हुई थी.............कोई रोड एक्सीडेंट में बुरी तरह घायल लड़की को कुछ लोग इमरजेंसी के अन्दर ले जा रहे थे..............मैंने उससे कहा, "जा साले, कर जाकर सर्टिफाई.".........."लगता है आज फिर शुरुआत मौत से ही होने वाली है भाई." मुस्कराकर उसने कहा था.........वो अन्दर चला गया और मैं अपनी गाडी में बैठकर घर की ओर बढ़ गया. थोरी ही दूर पर मोबाइल बज उठा. एक दोस्त का फ़ोन था. फ़ौरन ब्रेक लगाकर यु-टार्न लिया और फिर इमरजेंसी पहुच गया. जिस दोस्त की दुआओं ने दिन भर मौत के साए से दूर रखा वही दोस्त वहाँ अपनी आखरी साँसे गिन रही थी. एक्सीडेंट हुआ था. होश में थी.................'और कोई डेथ सर्टिफाई किया या नहीं, नहीं मालूम पर मेरा तुम ही करना.'..............उसके अंतिम शब्द थे!

दम तोड़ती उन आँखों ने अंतिम गुजारिश की थी.
डाक्टरी के लबादे ने दिल तक पहुचने ही न दिया.


उम्र और इंसानियत का रिश्ता, सुना था, इन्वर्सली प्रपोर्शनल होता है!!! 


 

Wednesday, December 01, 2010

यूँही फुर्सत में: कुछ ख्याल!

चंद रोज़ बेगारी के,
कुछ पल कामचोरी के,


कई सफहों को कलम फिर गंदा कर गयी!

वो जब कुछ नहीं करता तो कितना कुछ कर देता है या कितना कुछ कर देने की शक्ति रखता है. कमरे में अकेले किताबों के बीच बैठा हुआ. बड़ी मुश्किल से ध्यान वहीँ बगल में रखे अपने लैपटॉप पर से हटा पाता है. किताबों की पतली-मोटी अक्षरें उसका ध्यान अपनी तरफ खींच पाने में अक्सर असफल हो जाती हैं. कमरे के बाहर सड़क पर से गुजरती हुई वो 'उमर बिजली मलहम' की प्रचार गाड़ी उन अक्षरों को हमेशा मात दे देती हैं. कमरे के बाहर का कुछ भी उसे कितना भाता है. उसका मन हमेशा यूँही कुछ ख्यालों में खोया रहता है. बेतरतीब से कई ख्याल, कुछ ढंग के, बाकी सारे बेढंगे, बिना सर पैर के. ख्यालों की कोई निश्चित दिशा नहीं होती, इसका प्रमाण वो हर रोज़ अपनी ज़िन्दगी में देखता है. घर के बाहर काम कर रहे मजदूर के चेहरे पर के झुर्रियों से जो उड़ान ख्याल भरते हैं उनकी लैंडिंग न जाने कहाँ कहाँ हो जाती है. एयर ट्रैफिक कंट्रोल वालों को कितनी मुश्किल होती होगी. कभी आगे से, कभी पीछे से, कभी ऊपर से, कभी नीचे से, अचानक, ख्यालों का एक्सीडेंट न जाने कितनी बार हवाई जहाज़ों से होता होगा.
न जाने कितने ख्याल कुछ मिनटों में उसका मन बुन लेता है. कुछ ख्याल ऐसी सवालों के शक्ल में आते हैं जिनका जवाब कोई नहीं दे सकता. 'मनमोहन देसाई न होते तो "खोया-पाया" फिल्मों का वजूद क्या होता?'.......'अमिताभ बच्चन की ऊंचाई थोड़ी कम होती तो ड्रीम हसबैंड की ऊंचाई का मानक कौन होता?'.......'माधुरी दीक्षित की चोली के पीछे इतनी हलचल क्यूँ रहती थी?'.........'विनोद मेहरा के शर्ट के ऊपर के चार बटन नदारद क्यूँ होते थे?'.........'हेलेन आंटी का पीठ हमेशा खुला ही क्यूँ होता था'.......'हंगल साहब अपने बेटे की अर्थी उठाते उठाते खुद कभी क्यूँ नहीं मरे?'........'सचिन तेंदुलकर बैटिंग के पहले टाँगे क्यूँ फैलाता है?'........'सिद्धू के मुहावरों की गंगोत्री हिमालय के किस भाग से निकलती है?'.........ऐसे ही कई सौ सवाल है..........जवाब न मिलता है, न मिलने की ख्वाहिश होती है. बस एक ख्वाहिश रहती है ऐसे सवालों के हमेशा जिंदा रहने की. शायद मन को घूमने का इक आयाम देती हैं ये. उनकी उड़ान के लिए पंखों का सहारा बनती हैं ये. शायद इसीलिए जवाब ढूंढता भी नहीं वो. कहीं जवाब मिल गए तो मन की उड़ान बंद न हो जाये.....
कई ख्याल ऐसे भी होते हैं जो उसे कुछ सोचने को मजबूर करती है. कई दिन की चिलचिलाती धूप के बाद वो कुछ घंटों के लिए बादलों का घुमड़ना.......हवा के झोकों में किसी लड़की का दुपट्टा फिर से उड़ना.........दिन भर काम करते उस मजदूर का झुर्रियों भरा चेहरा.........अस्पताल में इमरजेंसी में एक गरीब की अपनी किस्मत से हार........उस दिन टेलीफोन पर प्रेमिका से झगडा........न जाने और क्या क्या........रेखा के मन को बहकने के लिए बेली के महकने की दरकार होती थी, उसके मन के लिए ऐसी कोई जरुरत नहीं. बहकना उसके मन का शौक है, मजबूरी नहीं. बिना किसी सीमा के किसी भी गली में कभी भी घुस जाता है उसका मन. मंजिल तक पहुचने की कोई लालसा नहीं, बस राह चलते रहने की अभिलाषा होती है.
कुछ ऐसे ही बेगारी भरे दिन बीते पिछले कुछ दिन. कई ख्याल मन में उमड़ते रहे. कुछ नाकाम रह गए तो कुछ ने शब्दों की शक्ल ले ली. ऐसे ही कुछ ख्याल यहाँ पेश करने के कोशिश कर रहा हूँ. उम्मीद है पसंद आयेंगे!
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उस रोज़ सूरज ने आँखें मूंदी थी
या बादल के साए में छुप गया था.

चाँद दो पल के लिए ही सही, मुस्करा रहा था!
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ज़ालिम हवा के वो झोंके
उड़ता हुआ वो तुम्हारा दुपट्टा

उफ़! खुली आँखों के ये सपने बड़े जालिम होते हैं!
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चाँद आया था धरती और सूरज के बीच
तारे भी उस रोज़ मुस्करा रहे थे.

बीच दोपहर में भी रात आती है कभी!
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वो झुर्रियों भरा चेहरा आज भी ईंट ढो रहा था.
आसमान में आज बादल छा गए थे

आख़िरकार आज सूरज ने भी हार मान ही ली!
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वक़्त की बेवफाई कहूं
या शुबहे की दगाबाजी थी.

जागे हुए बड़ी लम्बी गुजरी थी वो रात!
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ज़िन्दगी और मौत की जद्दोजहद में
गाँधी के चंद हरे-लाल चेहरों ने फिर बाजी मार ली

ये बीमारियाँ गरीबों का पेटेंट ही क्यूँ नहीं करा लेती?
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Tuesday, November 02, 2010

डॉट है तो हॉट है!

जी हाँ! बिहार के विधानसभा चुनाव के चौथे चरण में कल हमारे यहाँ पटना में भी चुनाव हुए. हालांकि बालिग़ हुए 4 साल हो गए हैं, मगर मतदान करने का मौका पहली बार ही मिला. 2009 के आम चुनाव के समय बालिग़ था मगर निर्वाचन आयोग की लापरवाहियों की वजह से न मतदाता सूची में नाम चढ़ सका था ना ही मतदाता पहचान पत्र ही बन सका था. इस बार लग-भीड़ कर किसी तरह से नाम भी चढवा लिया और पहचान पत्र भी बनवा लिया. और इस बार गधा जन्म छुडाते हुए जीवन में पहली बार मतदान कर ही दिया. हर-हर गंगे के उद्घोष के साथ लोकतंत्र के महापर्व में हमने भी आखिरकार डूबकी लगा ही ली.
कभी कभार ऐसी बाते आपके साथ हो जाती हैं जो आपको अपने देश की व्यवस्था पर सवाल उठाने को मजबूर कर ही देती हैं. जब पहली बार मतदाता सूची में नाम और मतदाता पहचान पत्र के लिए आवेदन किया तो उसपर कोई सुनवाई ही नहीं हुई. दुबारा जब फिर से कोशिश हुई तो इस बार नाम तो चढ़ा मगर उसमे सारे विवरण गलत थे. नाम सही नहीं लिखा हुआ था, पिताजी का उपनाम गलत था, एक भले-भाले पुरुष को वहाँ महिला करार कर दिया गया था और रही सही कसर नाम के आगे एक औरत की तस्वीर लगा कर पूरी कर दी गयी थी. संशोधन के लिए फिर से आवेदन करना पड़ा और संशोधित पहचान पत्र जब घर पहुंचा तो उसमे तस्वीर, लिंग और पिताजी का नाम तो सही कर दिया गया था मगर मेरा नाम की स्पेल्लिंग अभी भी गलत थी. चूँकि चुनाव नजदीक आ चुके थे इसलिए इस बार संशोधन के लिए आवेदन को चुनाव बाद तक टाल दिया. कल उसी गलत-सलत पहचान पत्र से जाकर मतदान कर आया. पता नहीं कितनी बार दौड़ना पड़ेगा एक अदने से पहचान पत्र को त्रुटी-रहित बनाने के लिए. क्यूँ, सवाल उठते हैं न अपनी देश की व्यवस्था पर?
खैर, 3 घंटे की कड़ी मेहनत के बाद आज सूची में अपना नाम खोज सका और जाकर मतदान किया. मन में ख़ुशी तो होनी ही थी. जीवन का पहला मतदान, वो भी इतनी शिद्दत के बाद तो ख़ुशी के लिए जगह तो बनती ही है. मगर आज जब अभी ये सबकुछ लिख रहा हूँ तो उतना खुश नहीं हूँ. जानता हूँ कि भले मेरा उम्मेदवार चुनाव जीत जाए, मत तो मेरा बर्बाद ही जाना है.  देश के लोकतंत्र की ऐसी हालत हो गयी है जहां चुनाव जनता की भलाई के लिए नहीं जीता जाता. चुनाव जीता जाता है अपनी तिजोरी भरने के लिए और जेब गर्म रखने के लिए. दिए गए सभी विकल्पों में कोई उम्मीदवार इस लायक नहीं है कि हम उसे अपना नेता कह सके. ऐसे में एक मत किसी को भी चला जाए कोई फर्क नहीं पड़ता. सब लूटेंगे ही, कोई कम नहीं, कोई ज्यादा नहीं. ख़ुशी तब अधिक होती जब सच में कोई नेता कहलाने लायक उम्मीदवार मैदान में होता या फिर बैलट पर 'इनमे से कोई नहीं' का विकल्प होता ताकि उसके सामने का बटन दबाकर अपनी अस्वीकृति को दर्ज करा सकता था. खैर, छोड़िये इन बातों को, अंतहीन बहस है ये, एक ऐसा बहस जिसका कोई निष्कर्ष नहीं निकलने वाला. बात मतदान की है, अपनी मौलिक अधिकारों के इस्तेमाल की है और अपनी मौलिक धर्म को निभाने की है. यही सोचकर खुश हो जाता हूँ कि कम से कम आज के दिन ही सही, करोड़ों में एक तो हूँ!
    
   

Monday, November 01, 2010

मेरा 100वाँ पोस्ट!


लगभग 3 साल से इस ब्लॉग पर सक्रिय हूँ. आज ये पोस्ट मेरी सौवीं पोस्ट बनकर आ रही है. जानता हूँ कि 3 साल के इस लम्बे सफ़र के लिए ये संख्या थोड़ी कम है, मगर देर आये दुरुस्त आये. इधर कुछ समय से इस पोस्ट के लिए मन में काऊंटडाउन चल रहा था और उम्मीद थी कि इसे एक स्पेशल पोस्ट बनाऊंगा. मगर आज जब लिखने बैठा हूँ तो कुछ मिल नहीं रहा. एक तरह की ख़ुशी मन में बैठी हुई है जो शायद इससे दूर हटकर सोचने का मौका ही नहीं दे रही. बार बार अपने ही ब्लॉग के बारे में सोचकर इस यात्रा की खबर मन में ले रहा हूँ. कहाँ था और कहाँ आ गया.
शुरुआत बड़े भाई के प्रोत्साहन पर फरवरी 2008 में हुई मगर सही मायनों में पहली पोस्ट मार्च में ही लिख सका था. अंग्रेजी से शुरू हुई इस सफ़र ने कई मोड़ देखे. शुरूआती दिनों में ज्यादातर फिल्मों के बारे में ही लिखता था. एकाध हिंदी के पोस्ट को छोड़कर सारे पोस्ट अंग्रेजी में ही होते थे. इस साल की शुरुआत में अचानक कुछ हिंदी ब्लॉग पढ़ कर हिंदी में लिखने की रूचि जग गयी. रोज-मर्रा की ज़िन्दगी से कुछ पहलुओं को उठाकर यहाँ पर लिखने लगा. आज हालत ये हो आई है कि एकाध अंग्रेजी के पोस्ट को छोड़कर सबकुछ हिंदी में ही लिखता हूँ. कभी मन में अंग्रेजी लिखने की बात भी आती, तो टाल जाता था. मगर इधर कुछ दिनों पहले दोनों भाषाओँ के लिए अलग अलग ब्लॉग का ख्याल मन में आया तो अंग्रेजी के लिए भी एक ब्लॉग बना ही डाला.
पढाई के बोझ के कारण ज्यादा समय नहीं दे पाता था ब्लॉग पर इसलिए ज्यादा नियमित नहीं हो पाता था. अक्सर या तो परीक्षा ख़त्म होने की खुमारी छाई रहती थी या आने वाले परीक्षाओं की परेशानी ही मन को घेरे रखती थी. ऐसे में जो भी समय बचता था उसमे ब्लॉग ही लिख लिया करता था. पिछले 2 सालों में जहां सिर्फ 50 पोस्ट लिख सका था वहीँ इस साल के दसवें महीने में ही 50 और पूरे हो गए. इस साल की शुरुआत में अपने लिए एक लक्ष्य तय किया था. इस ब्लॉग को नियमित चलाने के लिए और अपनी पढाई और इसके बीच समन्वय बनाये रखने के लिए मैंने हफ्ते में एक पोस्ट के दर का लक्ष्य मन में तय किया था. हालांकि बीच-बीच में कुछ समय के लिए अनियमित होता रहा हूँ मगर, फिर भी अभी तक अपने लक्ष्य से आगे ही हूँ और उम्मीद करता हूँ कि साल का अंत भी इसी तरह से होगा.
अनियमितताओं से अच्छा याद आया. एक बार ऐसा समय आ गया था ब्लॉग पर जहाँ हर पोस्ट की शुरुआत माफ़ी के साथ ही होती थी, माफ़ी ब्लॉग पर न आने की. शायद पोस्ट की शुरुआत के बारे में कुछ सोचने की जरुरत ही नहीं पड़ती थी. मालूम होता था कि शुरुआत तो माफ़ी से ही होगी. मगर शुक्र है कि अब ऐसा नहीं है. जहां तक इस महीने का सवाल है तो ये महिना मेरे ब्लॉग पर सबसे ज्यादा व्यस्त रहा. 10 पोस्ट इसके पहले मैंने किसी महीने में नहीं लिखे थे. ख़ास कर के इसके पहले के दो महीनों में जो अनियमितता आई थी उससे ब्लॉग्गिंग के प्रति रूचि खो बैठने का डर भी लगने लगा था. भला हो हमारी 'उनका', जिनके एक झूठे सपने ने फिर से मुझे ब्लॉग लिखने का प्रोत्साहन दे दिया. एक रोज़ 'उनका' फ़ोन आया और उन्होंने कहा कि उन्होंने एक सपना देखा है कि आज मैं ब्लॉग लिखूंगा, और साथ में शाम तक इस सपने को साकार करने का आग्रह भी था. अब उनका सपना और ऐसा आग्रह, इनकार कैसे कर सकता था. और फिर एक नयी शुरुआत हो आई ब्लॉग पर.
आप लोगों को पकाने का कोई इरादा नहीं था मेरा आज. मगर क्या करूं, बातों बातों में ही आपको पका ही डाला. क्या करूं, मन में एक ख़ुशी जो है. आप सब से बाटना चाहता था इसलिए ये सब लिख दिया. खैर, उम्मीद है कि आप सब का साथ बना रहेगा और मेरी ये गाड़ी, मद्धम गति से ही सही, मगर चलती रहेगी!
  

Sunday, October 24, 2010

दुहाई अपने औरत होने की!

अभी अभी ब्लॉग की दुनिया में घूमते घूमते एक कविता मिली. 21वी सदी की औरत के बारे में कवयित्री काफी कुछ कह रही हैं. उनके मुताबिक़ 21वी सदी की औरत अब बेवकूफ नहीं बनती, वो चैट करती है, मर्दों से, उन्हें झांसे में रखती है अपनी सच्चाई के बारे में. ऐसा करके वो उनसे बदला लेती है जो सदियों से उनका शोषण करते आये हैं. उनको ये शोषण सूद समेत वापस लौटा कर वो आत्म संतुष्टि पा लेती हैं. उनका ब्लॉग सुरक्षित है इसलिए पंक्तियाँ यहाँ नहीं दे पा रहा हूँ, आप कविता इस लिंक पर पढ़ सकते हैं. बस उन्ही की कविता के जवाब में मेरी ये प्रस्तुति:



21वी सदी की नारी है,
हाँ, चैट कर लेती है.
आपसे, मुझसे,
हर किसी से.
कोई इनमे माँ ढूंढता है,
कोई बहन कोई दोस्त.
कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका.
हर कोई ढूंढता है
इनका एक नया रूप.
इस बात से अनजान
कि वो किसे ढूंढ रही.

अपने आप को चालाक समझती है,
धूर्त है, परिचय अनजाने में दे जाती है.
फिर भी समझ नहीं आता.
गफलत में रहती है,
जब सामने वाला इनका इस्तमाल करता है
ये खुश रहती है
सोचकर के इस्तमाल तो वो कर रही हैं.

पता नहीं खुद को क्या समझती है.
पर इतना जरूर है,
इस्तमाल हो जाने के बाद जब अहसास होता है
तो आँखों में आंसू जरुर आते हैं,
अपनी सच्चाई पता चले न चले
दुहाई जरूर देती है.
दुहाई अपने अबला होने की,
दुहाई मर्दों द्वारा तथाकथित शोषण की,
दुहाई अपनी ऐतिहासिक कमजोरी की.
दुहाई अपने औरत होने की!

 

Wednesday, October 20, 2010

तुम्हारे साथ!


उस शाम, राह पर
तुम्हारे साथ,
नज़रें झुकाकर,
ज़माने से बचाकर
चल रहा था.
कोई बात नहीं,
कुछ ख़ास नहीं.
बस चुपचाप.
सिर्फ एक अहसास,
सिर्फ दिल की एक आवाज़,
कि पकड़ लूं तुम्हारा हाथ.
कि ले चलूँ कहीं ज़माने से दूर.
वहां जहाँ कोई नज़र न हो
वहाँ जहाँ किसी का कोई डर न हो.

पर,

झुकी नज़रों का वो डर
मन का वो करना हमेशा 'किन्तु, अपितु, पर'.
हिम्मत हुई, सोचा
कब तक नज़रें झुकाकर
ज़माने की नज़रों को नज़रअंदाज करूंगा,
आखिर कब उस डर को भूलकर
अपने दिल के लिए इन्साफ करूँगा.
दिल ने एक आवाज़ दिया,
आवाज़ से ज्यादा धिक्कार दिया.
हिम्मत हुई, हाथ बढाया,
नज़रों को उठाया
ज़माने की नज़रों से नज़र मिलाया.

और फिर,

चिढाती हुई वो दोस्तों की ऑंखें,
सवाल पूछती वो बुजुर्गों की आँखें,
वो लोगों की नज़र,
उन नज़रों का डर,
वो ज़माने के पत्थर,
अपने घर के शीशे,
तुम्हारे परिवार की इज्ज़त,
अपने माँ-बाप की बेईज्ज़ती का डर.

वो सबकुछ,

बढ़ते हुए हाथ को फिर वापस कर लिया,
बस सबकुछ चुपचाप सोचता रहा,
मन में सब कुछ दबाकर
तुम्हारे साथ बस चलता रहा, चलता रहा.

Wednesday, October 06, 2010

उस पुराने वाले 'तुम' को कहीं न कहीं खोज कर अपना वही 'हम' ज़रूर बनाऊंगा

कई बार ज़िन्दगी में कुछ ऐसे दुखों का सामना करना पड़ता है कि फिर ज़िन्दगी पर से विश्वास उठने लगता है. किसी बहुत अपने को खोने के बाद ये डर हमेशा सताता रहता है कि कहीं बाकी सब भी छोड़ कर न चले जाये. ऐसे में दोस्तों के साथ की जरुरत होती है और मन बार बार इस बात की तसल्ली लेना चाहता है कि वो साथ हैं या नहीं. ऐसी ही कुछ स्थिति एक अभिन्न मित्र के ज़िन्दगी में कुछ साल पहले घटी. उसने अपने पिताजी को खोया और आज भी हम दोस्तों से इस बात की तसल्ली लेता रहता है कि हम उसके साथ हैं या नहीं. उसी को समर्पित मेरी ये कविता!


दोस्त,
वो बचपन के दिन याद हैं?
मेरे लिए एक नया स्कूल, एक नयी जगह,
कोने में चुपचाप बैठे रहने की मेरी एक ही वजह.
मेरा कोई दोस्त न था वहाँ.
पुराने दोस्तों को पीछे छोड़ आया था,
नए बनाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था.
जब चाहा था किसी का साथ
तब तुमने ही बढाया था अपना हाथ.

हाँ, दोस्त,
मुझे वो सबकुछ याद है.
वो क्लासरूम की मस्ती,
लंच पीरियड की वो मटरगस्ती,
स्कूल फी जमा करने के बहाने क्लास बंक करना,
स्पोर्टस पीरियड लगवाने के लिए टीचर से जंग करना,
कैंटीन के समोसे की लाइन में मुझे धकेल देना,
और क्लास में पनिशमेंट के लिए मेरी जगह खुद चले जाना.
तुम्ही तो रहते थे हर पल साथ.

हाँ दोस्त, 
मुझे सब कुछ है याद.
मगर आज फिर भी तुम पूछते हो, मैं दूंगा न तुम्हारा साथ?
सच्चे दोस्त कभी बदलते नहीं,
जो बदलते हैं वो सच्चे होते नहीं.
मैं जानता हूँ दोस्त तुमने क्या खोया है,
इतनी कच्ची उम्र में ही कितना रोया है.
पिता को खोने के दर्द को मैं ले तो नहीं सकता हूँ
पर उस दर्द को बांटने का जतन तो कर सकता हूँ.
जानता हूँ, उस वक़्त तुम्हारे आंसू पोछने न आ सका
मालूम है मुझे, तुम्हारी दोस्ती का क़र्ज़ न चुका सका.

पर दोस्त,
ज़रा सोचो,
हमने भी तो खोया है किसी अपने दिल के करीब को.
वो 'तुम' जो उस दर्द के मिलने के पहले हुआ करते थे
आज उस दर्द के साए में कहीं खो गए हो,
वो 'तुम' जो कभी मेरे 'हम' का हिस्सा थे
आज कहीं दूर हो गए हो.
पर याद रखना, दोस्त,
अपनी दोस्ती का क़र्ज़ ज़रूर चुकाऊंगा
उस पुराने वाले 'तुम' को कहीं न कहीं खोज कर
अपना वही 'हम' ज़रूर बनाऊंगा.


Monday, August 02, 2010

यादें, याद आती हैं...

पूरी तो नहीं कहूँगा मगर कम से कम आधी दुनिया के लिए कल का दिन बहुत महत्वपूर्ण था. मेरे लिए भी कल का दिन एक अलग तरह की महत्ता के साथ आया. जहां मेरे सारे दोस्त और शायद अनगिनत और लोग कल "Friendship Day" मना रहे थे वहीँ मैं भी खुश था मगर कारण कुछ और था.
सबसे पहले तो मैं ये बताना चाहता हूँ कि ऐसे किसी भी Day पर मुझे कोई विश्वास नहीं है. मेरा तो मानना है कि दोस्ती और दोस्त 365 दिन के लिए होते हैं, किसी एक दिन पर इनकी याद करने से सिर्फ इनकी महत्ता कम ही की जा सकती है और कुछ भी नहीं. अचानक से न जाने कहाँ से इतने सारे दिन आ गए हैं हमारे मनाने के लिए. कभी friendhip day, कभी rose day, कभी father's day, कभी mother's day, कभी brother's day, कभी sister's day, और न जाने कितने कैसे कैसे दिन. पश्चिमी सभ्यता से कुछ चीजें अगर लेने में हमने कोई कोताही नहीं बरती है तो वो ये दिन ही हैं. जन्म से अभी तक साढ़े तेईस साल हो चुके हैं और सत्रह-अट्ठारह साल की उम्र तक मुझे नहीं याद कभी ऐसे दिनों के बारे में सुना भी करता था. शायद यही कारण है कि अभी जब इन दिनों को मनाने के बारे में सुनता हूँ तो बरा अटपटा लगता है, यहाँ तक कि अगर कोई अपना मुझे इनकी बधाई दे जाता है तो मन करता है बस मुंह नोच लूं. मगर बचपन में पढाया गया था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और इसी बात को ध्यान में रखकर बस समाज की राह पर ही चलते हुए मैं भी जवाब दे जाता हूँ. भाइयों के लिए भय्या दूज और बहनों के लिए राखी का पर्व मनाने वाले हमारे समाज में कब इन दिनों ने अपनी जगह बना ली समझ नहीं आया.
"डॉ." बनने की तरफ पहला कदम, 1st Year
बहरहाल, कहाँ मैं कल के दिन की अपनी ख़ुशी के बारे में बात कर रहा था और कहाँ इन सब पचड़ों में पडा रह गया. जैसा कि पहले भी लिख चुका हूँ, कल का दिन मेरे लिए अलग तरह से महत्वपूर्ण था. ये पोस्ट कल ही लिखना चाह रहा था मगर इन्टरनेट कनेक्शन के न रहने के कारण लिख नहीं सका. कल का दिन यादों की कश्ती में बैठकर पुराने दिनों के समंदर में दूर तक सफ़र करने में ही बीत गया. बचपन में एक सपना देखा था, डाक्टर बनने का. 5 साल पहले कल के ही दिन इस सपने की तरफ अपना पहला कदम बढाया था. अपने कॉलेज जीवन का वो पहला कदम 1 अगस्त 2005 को रखा था और आज पूरा आधा दशक बीत चुका है और नाम के आगे "Dr." लगाने का वो सपना आज पूरा हो चुका है. 5 साल पहले के उस दिन को लम्हा-दर-लम्हा एक बार फिर जी लिया कल बैठे बैठे ही. मेडिकल कॉलेज में घुसने की ख़ुशी, सीनियर की रैगिंग का डर, नए दोस्तों से मिलने की उत्सुकता और न जाने क्या क्या. सफ़ेद शर्ट, सफ़ेद पैंट, ऊपर से एप्रन और खादी की हरे रंग की एक बैग के उस ड्रेस कोड में जोकर से कम नहीं लग रहा था मगर सीना इस तरह चौड़ा करके चल रहा था जैसे कहीं का राजा बन गया हूँ. एहसास हो रहा था कि दुनिया का पहला डाक्टर बनने वाला हूँ, इस बात से पूरी तरह से बेखबर कि एक ऐसे कैम्पस में कदम रख रहा हूँ जहां कौवा बीट भी करता है तो गिरता किसी डाक्टर के सर पर ही है.
Dr. Anshuman Aashu
खैर, ख़ुशी का वो मंजर फिर से जीने की इच्छा होती है. समय को वापस घुमाने का कोई भी रास्ता होता तो शायद उसी पल को जीता, एक बार नहीं बार बार. अभी कल की ही बात लगती है जब हॉस्टल के छत पर रैगिंग में अपने इज्ज़त की नीलामी देख रहा था, मगर तभी हवा का एक झोका आता है और कैलेंडर के साठ पन्नों को उड़ाकर आज का दिन दिखा जाता है और तब एह्साह होता है कि आधा दशक बीत गया सब कुछ हुए. अपने जैसे न जाने कितनों की इज्ज़त की नीलामी उसी छत पर कर चुका हूँ, न जाने कितनों को उसी तरह सीना चौड़ा किये हुए इस कैम्पस में घुसते हुए देख चुका हूँ और न जाने कितनों को इसी चौड़े सीने की बलि चढ़ते हुए सड़क पर ही मुर्गा बनते हुए देख चुका हूँ. मगर फिर भी उस दिन की यादें हैं जो जाने का नाम नहीं लेतीं. यादें, याद आती हैं...

Friday, July 30, 2010

Last 15 days that I can never forget!

Again, this time its over 10 days that I wrote something in here and no awards for guessing that I am going to start yet another post with my favourite excuse that the last couple of weeks have been quite busy for me. As always, the excuse is just an excuse and when I start thinking what I was busy in all these days, I can find just nothing, so, better to say that I was only "busy for nothing!" Well, better late than never and here I am with yet another boring post to eat away your mind in pieces with it.
From the start of this year, my blog has mostly been a Hindi blog with only just one post coming in English and that too over 6 months back. Writing in Hindi has been fun for me and also a way to show my respect to my mother tongue. It feels lovely to be a part of Hindi blog-world and I am proud to be one. But this doesn't mean that I don't want to write things in English. All these months, there have been time when I wanted to write something in English, but just could not. In fact, I have spent many hours thinking to maintain separate blogs in Hindi and English and such thoughts have taken a great share of my time when I am that "busy for nothing." Every time, when such impulses of creating a whole new blog comes in my mind, I just think of my attitude towards this blog and the impulse again gets dormant without any effort. Anyways, here I am with a hope that I always be regular on my blog and also that I be able to manage a balance between both languages.
Anyways, so many things already said about me being "busy for nothing" stuff, but let me clear this time that it is not completely true. In 15 days, if you have spent almost 40 hours in internship duty at the Dermatology OPD, some uncountable hours on facebook, a few on blogging and still fewer in studies, and rest in watching 2 and a half seasons of 'Friends', then, I don't think one can call it being "busy for just nothing." Although, as far as counting some constructive work is concerned, these 15 days have just got nothing but hey, technically, I am busy in a lot of things.
4 months of my internship duty are almost over and the last station that I crossed is Dermatology. Last 15 days were spent sitting in the Dermatology OPD. I even based my last post on this duty. Today, when this duty is over, I am sitting, thinking in retrospection and also introspection as to what I got to do and learn in these 15 days. When I am thinking back, what I can remember is just sitting and watching the filthy nodules, the dirty ulcers, ugly pus draining wounds, crying children, ailing patients, tense faces and hapless characters and to add to those, many soaring penises. Can these all things make anyone happy about his job that he himself has chosen with complete authority? Yes they can. They can make you happy when you follow them a week later when the nodules have subsided, the ulcers healed, wounds closed, the child is enjoying yet again and you see smile on the faces. Its an irony for us doctors that we have to make money and feed ourselves by other's ailments but this is the happiness of curing these ailments that matters the most for us.
When I entered into MBBS life, there was a common parlance about the Dermatology department, that you never get a disease there that kills or heals or panics you out. As far as my views about this particular department was concerned, I was not very interested in it, maybe, because of the physical ugliness of the lesions involved. I entered this department 15 days back with the same views and the first day itself was so very annoying and, sometimes, nauseating for me. A few days went like that but then, I started liking it and today after completing my tenure there, I must be the saddest person of the group of other 17 person who joined the duty with me.
What changed my views was the happiness that I saw on the faces of person who were treated during this period. A man who has a cancer inside his body has only a physical lesion that nobody can see from outside and he has to suffer only the physical aspects of the disease, but if he has the lesion on his skin then what he has to go through is not only the physical pain but also a social suffering that is associated with almost each and every skin disease. The social stigmata attached to every skin disease makes its patient a sinner and hence, gives a pain of rejection and isolation that is even more intense than a pain of cancer inside his body. Treating such diseases doesn't only cure that patient of his lesion but also helps him regain his place in the society. This is what I love about being in this department. My whole 15 days would have been gone in condemning Dermatology but for my senior working there I am here praising it. She was the one who pointed out this beautiful aspect of this subject to me. I am really grateful to her for this. Thank You Di!
Sitting here in front of my lappy and writing the post, I am actually reliving each and every moment of last 15 days that I spent in that department. In the 4 months of my internship duty so far, I think, these 15 days were the best and probably, will be the best when I complete the whole year of my duty. I am remembering everything I did there and except the first day, every other day is getting a smile on my face. There are a lot of things and memories that I am gonna cherish the whole life. Where Roy Sir's scary big eyes staring from just above his glasses easily took the hell out of me, there, at just the next moment, his smile restored my belief in myself. Arjun sir's ever smiling character and Binod sir's hilariously lovely conversation with patients are something that can never be forgotten. Teasing Niti di for treat and managing to get a samosa treat from Roy sir is cherishable for lifetime. And then how can the fantastic diagnoses made by us students in that OPD be forgotten. Calling a Tinea's simple lesion Zoster or diagnosing Plantar Hyperkeratosis for a dirty sole is something that I will remember in my whole life. And last of all, what made these 15 days even more enjoyable and special was the presence of my "HER" with me sitting beside me every single day. Certainly, I am not going to forget these wonderful days!!!

Friday, June 25, 2010

माँ ऐसी ही होती है, थोड़ी सी सीधी, थोड़ी अजीब होती है

ये कविता यूँही बैठे-बैठे कल रात माँ को सोच कर लिख दिया। लिखने के बाद हिम्मत नहीं हुई इसे पोस्ट करने की। समझ नहीं आ रहा था कि कैसा लिख पाया हूँ। कवियों के बारे में सुनता हूँ कि कोई उनकी कविता सुनने वाला नहीं मिलता, पर मेरे साथ बात कुछ अलग थी। किसी को सुनाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। अंततः, मैंने अपनी 'उन्हें' सुनाने का निर्णय लिया। डर तो था कि पता नही मेरी कविता सुनकर कही भाग न जाए पर अपने प्यार पर भरोसा रखकर रिस्क ले ही लिया। सुनकर वो कुछ भी नहीं बोली, मैं डर गया था। लगा जैसे अपने प्यार पर मेरा भरोसा गलत था, तभी फ़ोन पर उधर से आवाज आई, 'सुनो ना! कविता के नीचे मेरा नाम लिख देना', और साथ में एक ठहाका भी आया। नाम तो नहीं लिख रहा हूँ पर गुजारिश करता हूँ कि आप उसके नाम से ही पढ़ें इस कविता को! हा हा हा!


माँ! मैं बाहर जा रहा हूँ,
कहाँ जा रहा है?
दोस्तों के साथ जा रहा हूँ,
कुछ काम है या यूँही?
बस ऐसे ही घुमने फिरने,
आने में तो देर ही होगी तुझे,
इंतज़ार तो नहीं ही करना होगा मुझे,
खाना तो बाहर ही हो जायेगा
कोई बात नहीं चूल्हा आज फिर नहीं जल पायेगा,
खाने की मेज़ आज फिर नहीं सज पाएगी,
आज फिर तेरी माँ यूँही कुछ भी खा के सो जाएगी।

***************

आ गया तू, बड़ी देर कर दी,
दोस्तों के साथ हो गयी मस्ती?
हाँ माँ थोड़ी देर हो गयी,
उम्मीद से ज्यादा दोस्तों से मुलाक़ात हो गयी।
जानती है माँ, बड़े पुराने यार थे वहां,
लौट आया हमारे बचपन का वो सारा जहां।
ज़रा इधर आ तो, नशा तो नहीं किया न,
सिगरेट, शराब तो नहीं पी, गुठका तो नहीं खाया न?
माँ तू भी न, देख ले कुछ नहीं किया मैंने
विश्वास रख, इतनी जल्दी तेरी दिखलाई राह से नहीं भटकूँगा
तुझसे लडूंगा, जिरह करूँगा, मगर तेरा विश्वास नहीं तोडूंगा।

***************

क्यूँ रे आज दिन में खाना खाने नहीं आया,
फिर कहीं से कुछ ऐरा गैरा खा आया?
कल ही तो पेट खराब हुआ था, मानता क्यूँ नहीं,
बाहरी चीज़ें खराब होती हैं जानता क्यूँ नहीं।
माँ, तू फिर शुरू हो गयी, भूख लगी है कुछ खाना तो दे
अरे फिल्म देखने गया था, कुछ बोलने का मौका तो दे।
किसके साथ गया था?
दोस्तों के साथ।
लड़कों के साथ या लड़कियों के?
माँ, मेरा खाना नहीं पच सकता बिना तेरी झिडकियों के!
क्यूँ लड़कियों के साथ कभी नहीं जाता?
क्या सोचता है मुझे कुछ समझ नहीं आता?
कल ही तेरी जेब में ये कान की बाली मिली है,
मुझे नहीं पता चलेगा, क्या सोचता है माँ इतनी भोली है?
अरे माँ हूँ तेरी, तेरी सांस तक की गिनती जानती हूँ,
तेरी हर एक हरक़त को पहचानती हूँ,
क्या छुपाता है मुझसे,
क्यूँ कुछ कह नहीं पता है मुझसे
बता न, बता न।
खैर न बता न सही
सोच लेना, कहीं पापा बुरा मान जाएँ नहीं।
आगे पीछे की सोच लेना,
घर में लड़की लाने के पहले, थोड़ी हमारे बारे में भी सोच लेना।
बड़ा हो गया है तू,
सोच सकता है तू,
हमारी इज्ज़त की न सही, लड़की के इज्ज़त की सोच लेना।
माँ! खाना खा लूं???
थोडा रुकेगी तो एकाध सांस ले लूं!

************

क्या हुआ माँ, गुस्से में लग रही है,
क्या हुआ दिसम्बर की सर्दी में क्यूँ तप रही है?
अरे कुछ नहीं, यूँही पड़ोसन से अनबन हो गयी
तुझे लेके उससे बकझक हो गयी।
वो बोल रही थी कि दोस्तों के साथ हुल्लड़बाजी कर रहा था तू,
और एक दिन सिगरेट पीकर धुंआ उड़ा रहा था तू।
एक दिन किसी लड़की के साथ भी देखा था तुझे,
जाने क्या क्या बता रही थी मुझे।
मुझसे रहा नहीं गया,
सारा गुस्सा वहीँ निकल गया।
तू भी न माँ, बड़ी अजीब है,
समझ में नहीं आता तू क्या चीज है।
रोज़ देर से आने पर पता नहीं मुझे क्या क्या सुनाती है
और जब दूसरा ये बातें करता है तो भड़क जाती है।
तू भी न माँ, बड़ी अजीब है,
समझ नहीं आता तू क्या चीज़ है।
माँ हूँ न रे, ऐसी ही हूँ,
तो क्या हुआ थोड़ी अजीब हूँ,
मैं कुछ भी कहूं अपने पूत को
कोई क्यूँ कपूत कहेगा मेरे सपूत को?
माँ ऐसी ही होती है,
थोड़ी सी सीधी, थोड़ी अजीब होती है

Thursday, April 08, 2010

न्यूज़ चैनल की साप्ताहिकी- एक व्यंग्य!

इन दिनों यूँ तो काम की आपा-धापी में कभी समय नहीं मिल पाया मगर जब भी समाचार चैनलों की तरफ मुखातिब हुआ तो हर जगह शोएब-सानिया के चर्चे ही मिले। कई लोग कई तरह की बातें कर रहे थे, कुछ विचार अपने मन में भी आये जिन्हें ब्लॉग के माध्यम से प्रस्तुत करने का जी हुआ मगर मौका नहीं मिल पाया। आज जब कुछ लिखने बैठा हूँ तो असमंजस में पड़ गया हूँ। शोएब-सानिया पर कुछ लिखूं या मीडिया में TRP की बढती महत्ता पर। कुछ समझ नहीं आ रहा। दोनों पर कुछ लिखने का मन कर रहा है। 12 घंटे की इमरजेंसी ड्यूटी के बाद अभी काफी थकावट भी महसूस हो रही है। थकावट के असर को कम करने के लिए चलिए थोड़ी मनोरंजक बातें ही हो जाएँ। तो आज का पोस्ट अभी के समय के सबसे बड़े मनोरंजन के माध्यम, न्यूज़ चैनलों पर एक व्यंग्य ही हो जाये। प्रस्तुत है सभी भारतीय न्यूज़ चैनल पर हफ्ते भर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों का ब्यौरा!
दिन सोमवार, हफ्ते का पहला दिन:
सुबह सुबह एक और प्रिन्स एक खड्डे में गिर गया। पूरा का पूरा सोमवार सभी चैनलों पर प्रिन्स की खबर से ही पटा रह गया। रात में जब तक उसे खड्डे से निकाल नहीं लिया गया, किसी भी रिपोर्टर ने चैन से सांस नहीं ली। पल-पल की खबर, सबसे तेज़, घटना की सबसे ताज़ी तस्वीरें इत्यादि ने जमकर एक ब्रेकिंग न्यूज़ बना दिया। दिन भर का रोज़गार न्यूज़ वालों को तो मिल ही गया, साथ साथ उन सब लोगों को भी मिल गया जो दिन भर इस ताक में कैमरे के आसपास टिके रह गए कि कभी उनकी भी तस्वीर टीवी पर आ जाये। समझ में नहीं आता कि कैसे अचानक इन ३-४ सालों में ऐसी घटनाओं की संख्या इस प्रकार बढ़ गयी है। सोचता हूँ कि कहाँ अंतर आया। क्या पहले गड्ढे नहीं खोदे जाते थे या पहले प्रिन्स जैसे बच्चे पैदा नहीं लिया करते थे। या ऐसा हो गया है कि न्यूज़ वालों के पास समय ही समय है ऐसी ख़बरों को हम तक पहुचाने के लिए। स्कूल में गुरु जी कहाँ करते थे "ऑलवेज थिंक पोजिटिव, हमेशा सकारात्मक सोचो।" चलिए कुछ सकारात्मकता इस प्रिन्स-काण्ड में भी ढूंढें। न्यूज़ चैनलों पर इनकी बढती संख्या का कारण क्या हो सकता है। या तो अभी गड्ढे ज्यादा संख्या में खोदे जा रहे हैं, या प्रिन्स जैसे चंचल बच्चों की संख्या बढ़ गयी है या फिर चैनलों का कभरेज एरिया बढ़ गया है। अगर गड्ढे ज्यादा खोदे जा रहे हैं तो ख़ुशी मनाने की बात है, अरे भाई, देश के infrastructure का विकास हो रहा है। अगर प्रिन्स आज ज्यादा खेल-कूद कर रहा है तो ये भी ख़ुशी की बात है, आखिर, वो कुपोषण का शिकार होकर घर में कमजोर तो नहीं बैठा हुआ है; कहीं न कहीं स्वास्थय सेवाएं सुधरी जरूर होंगी। यदि चैनलों का बढ़ता कवरेज कारण है तो भी खुश हो जाइये, अरे, qualitative न सही quantitative विकास तो जरूर हो रहा है इन चैनलों का। तो जनाब जब भी कभी कोई प्रिन्स कहीं गड्ढे में गिरे तो अफ़सोस मत मनाइए न ही न्यूज़ वालों से रुष्ट होइए, ख़ुशी मनाइए, आखिर, हमारे विकास की जीती जागती तस्वीर जो ठहरी ये खबर।
मंगलवार, दूसरा दिन:
कल दिन भर प्रिन्स की थकावट के बाद आज कुछ आराम करने का मौका मिल गया चैनल वालों को। न कही कोई प्रिन्स गड्ढे में गिरा, न कहीं किसी बिहारी पर हमला हुआ और न ही किसी सेलिब्रिटी ने किसी को तमाचा मारा। कल के भयानक रोज़गार के बाद आज की बेरोज़गारी में कोई खबर ही नहीं मिली जिसे सनसनीखेज बनाया जा सके। करें तो करें क्या। ध्येय तो एक ही बचा है न्यूज़ का आज के युग में, और वो है मनोरंजन। तो छोटे परदे से बढ़कर मनोरंजन और कहाँ। दिन भर आनंदी, अम्मा जी, लाली, पुनपुन वाली, इत्यादि न्यूज़ चैनलों पर छाई रहीं। कौन से सीरियल में क्या होने वाला है ये भी ब्रेकिंग न्यूज़ बन गया। जब बीच बीच में माहौल थोडा सीरियस होता गया तो लाफ्टर शो की झलकियाँ भी मिलीं। रात होते-होते जब नक्सलियों से न्यूज़ वालों की खस्ताहाल देखी नहीं गयी तो उन्होंने ही ब्रेकिंग न्यूज़ प्रदान कर दी सब के लिए। छोटा-नागपुर के जंगल में एक और नक्सल हमला। मध्य रात्रि से अचानक फिर से सभी संवाददाता सक्रिय हो गए।
बुद्धवार, वृहस्पतिवार एवं शुक्रवार:
तीनों दिन चौबीसों घंटे एक ही समाचार। ब्रेकिंग न्यूज़, नक्सल हमला। पहला दिन सिर्फ हमले की विस्तृत रिपोर्ट में बीत गया। दूसरा दिन सरकारी मशीनरी की खामियां निकालने में और तीसरा दिन पक्ष-विपक्ष में बहस कराने में ही निकल गया। बीच में कुछ घंटे कभी कभार उन शहीदों को भी याद कर लिया गया जो हमले के शिकार बने। सब को अपनी-अपनी बात रखने का मौका दिया गया। जो इस घटना से सम्बंधित हो उसने जितना भाग चैनल वालों के साथ लिया उससे कही ज्यादा उन लोगों ने लिया जिनका इस घटना से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं। आम जनता के लिए SMS पोलिंग भी खोल दी गयी। आम लोगों ने जमकर अपनी राय भेजी। समाचार की जगह सभी चैनलों पर वही SMS नीचे स्ट्रीम होते रहे। इन तीन दिन देश-दुनिया में और जगह क्या हुआ नहीं हुआ, किसी को मालूम नहीं चला। आखिर क्यों पता चले। हमले की ख़बरों से ही जब ऐसी TRP मिली तो क्यों कोई और खबर खोजे। क्यों कोई बेकार की मेहनत करे। आराम से ऐसे ही नाम और पैसे न कमाए जाएँ??
शनिवार:
लीजिये, अभी नक्सल हमले ने दम तोडना शुरू ही किया था कि सचिन ने शुक्रवार की शाम ही एक शतक ठोक दिया। शनिवार की सुबह से ही सचिन पुराण सभी चैनलों पर शुरू हो गए। पूरी की पूरी जीवन गाथा न जाने हर घंटे कितनी बार बारम्बार दिखाई गयी। ऐसी ऐसी बातें बताई गयी सचिन के बारे में जो शायद सचिन को खुद नहीं मालूम होंगी। सचिन का मन भी अघा गया होगा अपने बारे में एक ही बात हर घंटे सुन कर मगर ये रिपोर्टर का मन कभी नहीं अघाता। चाहे कितनी ही बार हो, किसी भी समाचार को प्रस्तुत करने में उनकी तन्मयता कभी कम होती नहीं दिखती है। रात तक तो बच्चों-बच्चों को सचिन के बारे में इतनी बातें पता हो गयीं होंगी जितनी उन्हें खुद के बारे में भी नहीं होगी। खैर, कम से कम न्यूज़ वालों ने सामान्य ज्ञान तो बढाया बच्चों का।
रविवार:
आज फिर से न कहीं कोई बम विस्फोट हुआ, न ही किसी नेता का कोई घोटाला पकड़ा गया और न ही किसी औद्योगिक घराने के भाइयों के बीच की कोई टकराव सामने आई। आज फिर वही स्थिति उत्पन्न हो आई। करें तो करें क्या। एक बार फिर रुख हुआ छोटे परदे की तरफ। फिर वही आनंदी, फिर वही अम्माजी, फिर वही राजू श्रीवास्तव। फिर इन्ही लोगों ने न्यूज़ चैनलों को बचा लिया नंगे होने से। आम जनता को अपने साथ खिचे रहने के लिए बेतुके SMS पोल आज भी यूँही चलते रहे और लोग आराम से अपने SMS भेजते रहे। न्यूज़ चैनल को TRP आज भी पूरी मिल ही गयी।
सोमवार, अगला सप्ताह:
आज फिर शुरुआत हुई एक प्रिन्स के गड्ढे में गिरने से। आज फिर वही सब हुआ जो पिछले हफ्ते हुआ.................

Friday, February 26, 2010

रैगिंग और हमारी एमबीबीएस यात्रा- 2

हो सकता है आपको याद होपिछले पोस्ट में मेरे द्वारा अपने कॉलेज जीवन के कुछ रोचक हिस्सों को आपके सामने प्रस्तुत करने का वादा किया गया थाहालांकि इस ब्लॉग पर वायदे पहले भी बहुत किये गए हैं मगर एक भले ब्लॉगर की माफिक कभी उन वायदों को पूरा करने का कोई प्रयास मेरे द्वारा नहीं किया गयाआज पहली बार इस ओर बढ़ रहा हूँकब तक निभा पाऊँगा मालूम नहीं मगर आपका प्यार मिलता रहा तो ये किस्से आगे भी चलते रहेंगेखैर, जिस श्रंखला की पहली कड़ी पिछले पोस्ट के रूप में आपके सामने आई थी उसी की अगली कड़ी यहाँ प्रस्तुत करने जा रहा हूँआशा करता हूँ ये पेशकश भी पसंद आएगी
पिछले पोस्ट में काउंसलिंग तक के अपने सफ़र और वहां पर हुई रैगिंग के ट्रेलर के बारे में आपको बताया थाआज ज़िक्र करूँगा उस काल के बारे में जिसका शंखनाद हमारे बॉस ने उस दिन कर दिया थाकॉलेज में देख लेने की धमकी मेरे अन्दर घर कर गयी थीपिताजी ने काफी समझाया था मगर फिर भी डर तो लग ही रहा थाउस डर के साथ कॉलेज एडमिशन लेने पहुँच गया थामाँ-पिताजी उस दिन भी साथ थेजिस सपने को उन्होंने साथ मिल कर जाने कब देखा था वो उस दिन पूरा हो रहा थाउनका बेटा एक मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लेने पंहुचा थाउनका साथ जाना तो लाजिमी ही थाउनके साथ नियत समय पर मैं कॉलेज पहुच गया था मगर वहां भी बिहार सरकार की कार्यशैली अपने शबाब पर थीजहां 9 बजे कार्यालय खुल जाना चाहिए था वहीँ लोग 11 बजे पहुचते थेइंतज़ार में बैठना तो पड़ना ही थाथोड़ी देर वहीँ बैठा रहा मगर फिर अचानक चंचल मन ने दुत्कार दियाउसने कहा, "क्या बैठल है यहाँ पर चलो कॉलेज घूम के आते हैं।" मैंने भी सोच लिया कि मन की इस बात को मानने का कोई कारण नहीं हैमेडिकल कॉलेज में एडमिशन लेने की सोच से ही सीना इतना फूला जा रहा था कि ये सोच भी नहीं पाया कि कॉलेज घुमने के इस प्लान के साइड-एफ्फेक्ट क्या हो सकते थेशायद थोड़ी देर के लिए उस धमकी को ही भूल गया थाफिर क्या था, निकल गए हम कॉलेज घुमने
दो चार कदम आगे बढ़ा था कि कुछ लड़के हाथों में किताब लिए हुए दिखाई दिएजल्दी समझ नहीं पाया कि वे कौन थेसमझने में हुई इस देरी का दुष्परिणाम तत्काल कुछ पलों में ही मिल गयाकॉलेज घुमने निकला हुआ मैं अपने आप को थोड़ी ही देर में 'Boys Common Room' में खड़ा पा रहा थाएक बड़ा सा हॉल, दो दरवाजे, कुछ खिड़कियाँ मगर सभी अन्दर से बंद; रौशनी के लिए दो चार रोशनदान जिनके मकड़जालों से छन कर सूरज की कुछ किरणें किसी तरह अन्दर रही थी; कुछ बेंच, दो टेबल जिनपर अखबार के पन्ने छितराए हुए थे; टेबल टेनिस के 2 टेबल जिनपर जमी धूल से ये अनुमान लगाना मुश्किल नहीं था कि अंतिम बार उन पर खेल कब हुआ होगाकुल मिला कर उस अँधेरे कमरे में किसी मेडिकल कॉलेज का संस्कार कतई नजर नहीं रहा थाजब नज़रें ज़मीन की तरफ गयीं तो नज़ारा ही जबरदस्त थामेरे जैसे ही कॉलेज घुमने निकले कुछ लड़के वहाँ मुर्गा बने हुए थेउन्हें चारों तरफ से घेरे हुए थे वो कसाई जिन्हें हमने बाद में बॉस के नाम से जानाकुल मिला कर ऐसा लगा कि जैसे मैं बकरा आप ही शेर के गुफा में घुस आया हूँ और वहां कई सारे शेर दावत के इंतज़ार में मुंह पिजाये बैठे हुए हैं
एक बॉस ने मुझे अपनी ओर बुला लियावहां की भयावह स्तिथि देखते ही सिट्टी-पिट्टी तो ऐसे ही गुम हो चुकी थी और सामने वह बाली खड़ा हो गया था जिसके सामने जाते ही आधी शक्ति यूँही नष्ट हो जाती हैदिमाग ने काम करना बंद कर दिया था या मांसपेशियां जकड़ आई थी नहीं कह सकता मगर अन्तपरिणाम ये हुआ कि उस बॉस के सामने सर झुकाने के बजाये सर उठाये ही खड़ा रह गया थाक्या हो रहा था कुछ समझ नहीं रहा थारहम की कोई गुंजाइश नज़र नहीं रही थी मगर फिर भी दिल के हर कोने से रहम-रहम की पुकार ही निकल रही थीसर को उठाये हुए ही खड़ा था कि बॉस ने मुर्गा बनने का आदेश दे डालापिताजी की बात याद गयी, बिना कोई शक या सवाल बस बॉस की बात मान लेनी थीमैंने ऐसा ही किया और पहले से बने हुए मुर्गों में मैं भी शामिल हो गयाएक बॉस ने बोल डाला, "मुर्गा बना है, चलो अब सब अंडा दो।" मुर्गा बनने का एक्स्पेरीयंस तो स्कूल जीवन से ही था मगर अंडा कैसे देते हैं ये कभी मालूम नहीं हुआ थामुर्गा बने-बने ही सोच में पड़ गया कि अब ये अंडा लाऊँ कैसेएक बॉस ने मेरी मुसीबत को भांप लियाउसने मेरे साथ बने हुए मुर्गे को मुझे अंडा देना सिखाने को बोल दियाबगल वाले ने मुर्गा बने-बने ही अपने पिछवाड़े को उचका कर दिखा दिया कि अंडे कैसे देते हैंफिर क्या था, उस दिन तो जाने कितने अंडे हमने कुछ सेकेंड में ही दे डालेतभी एक बॉस ने फिर से गालियों का पूरा बोझा हमारे ऊपर दे मारा। "साला, गधा सब, रे सेट्टिंग से आया है क्या रे? इतना भी समझ नहीं आता है कि मुर्गा अंडा देता है कि नहीं? साला बनाये मुर्गा और बाबुलोग यहाँ पर अंडा पर अंडा दिए जा रहे हैंसाला सेक्स का ज्ञान नहीं है रे तुम लोग लईकी क्या पटायेगा रे?", इस तरह के और जाने कितने सारे लांछन हमारे ऊपर बॉस ने फेक डाले थे
थोड़ी देर तक मुर्गा बने रहने के बाद बॉस ने हमें खड़े होने को कहाइस बार सर को झुकाए बॉस के सामने खड़ा हो गयाबॉस ने इंट्रो पूछाअंग्रेजी स्कूल की पढाई होने के कारण मैंने अपना इंट्रो अंग्रेजी में ही शुरू कर दियामुझे मालूम नहीं था कि अपने राष्ट्रभाषा की इतनी इज्ज़त हमारे बॉस करते थेपूरे इंट्रो में जहां भी अंग्रेजी का कोई शब्द आया तो बस बन जाओ मुर्गाहालत ऐसी हो गयी कि पिताजी का नाम बोलने में भी डाक्टर नहीं बोल पाया, चिकित्सक शब्द का इस्तमाल करना पड़ापूरे इंट्रो में 10-12 बार मुर्गा बनने की नौबत आईधीरे-धीरे पूरे इंट्रो की रूप-रेखा समझ में गयीप्रणाम बॉस से शुरू कर के अपना नाम, पिताजी का नाम, माध्यमिक (मेट्रिक) स्कूल, अन्तःस्नातकीय (इंटर) कॉलेज, प्रवेश परीक्षा में मेधा क्रमांक और अंत में अपनी अभिरुचि बता कर इंट्रो का समापन करना होता थाप्रणाम करने का भी तरीका होता था, बाएं पैर को ज़ोरदार पटक कर दायें हाथ से सलामी देते हुए प्रणाम बॉस बोलनासामने अगर सीनियर लड़की हो तो कमर पर 90 डिग्री का कोण बनाकर झुक कर प्रणाम मैडम बोलना होता थाअभिरुचि बोलने में भी सावधानी बरतनी होती थीजो भी अभिरुचि बताओ उसे करके दिखाना होता थाशुरुआत में जानकारी नहीं थी इस बात की इसलिए अपने साथ पंगा इस बात पर भी हो गयासच बोलने की ललक में मैंने अपनी अभिरुचि क्रिकेट खेलना बता दियाबॉस ने बोला चलो यहाँ से वहां तक 50 रन दौड़ कर बनाओहालत क्या हुई होगी बताना कोई जरूरी नहीं समझता
एडमिशन के उस दिन ही काफी कुछ समझ गया थाएडमिशन के पहले ही सबसे जरूरी कक्षा हमारी उस कॉमन रूम में लग चुकी थीएक गंभीर विद्यार्थी की तरह सारे पाठों को कंठस्थ कर लिया था मैंनेप्रणाम करने के तरीके से लेकर, इंट्रो के कंटेंट तक सब कुछ याद हो गया थासबसे बड़ी बात तो थी कि अभिरुचि भी बदलनी पर गयी थीबाथरूम से बाहर कभी गीत नहीं गाने वाले अंशुमान की अभिरुचि अब गाना सुनाना बन चुकी थीये अभिरुचि सभी लड़कों की सबसे चर्चित अभिरुचि थीअच्छा या खराब गाने की कोई दिक्कत ही नहीं थीसुर में गाओ या बेसुरा कोई फर्क नहीं पड़ताबेसुरा गाने में कम से कम एक फायदा होता था, अपने सीनियर से तत्काल बदला ले लिया जाता थाकुछ भी गाओ सुनना सामने वाले की मजबूरी होती थी और कान तो उसके ही पकते थे
उन जानवरों के साथ कुछ आधा-एक घंटा बिता कर उस काल-कोठरी से बाहर निकलने का मौका मिलालौट कर बुद्धू घर को आये की तर्ज़ पर मैं फिर कार्यालय वापस पहुच गयामाँ वहाँ वैसे ही बैठी हुई थीमाँ ने पुछा, "कैसा लगा कॉलेज?" "बहुत बढ़िया है!", मेरा जवाब थाअपनी सारी सिकन को छिपाते हुए पिछले एक घंटे में अपने ऊपर क्या बीती थी उसका कोई जिक्र नहीं करते हुए माँ के बगल में जाकर बैठ गयाएक कंगारू के बच्चे को भी मालूम होता है कि माँ के साथ ही वो सुरक्षित रह सकता है, फिर मैं तो था आदमी का बच्चा हीकम से कम इतनी समझ तो मुझमे भी ही चुकी थीअब चुप चाप माँ के साथ बैठूँगा ये सोच कर वही बैठ गया और थोड़ी देर में एडमिशन की प्रक्रिया भी शुरू हो गयीअंत यहीं नहीं थाये तो बस एक शुरुआत थी
एडमिशन के दौरान सीनियर की एक टीम कार्यालय आई, अपने साथ नाश्ते के पैकेट लेकरवो पैकेट हमारे लिए थेख़ुशी हुई कि चलो कुछ तो अच्छा भी करते हैं ये सीनियर हमारे लिएउन पैकेट के साथ एक कागज़ की पर्ची भी दी गयी थी हमेंनियम और कानून लिखे हुए थे उस कागज़ में जो सीनियर ने हमारे लिए बनाये थेड्रेस कोड जो हमें पहन कर कॉलेज आना था वो किसी भी भले मानुष को जोकर बनाने के लिए काफी थाऊपर से बालों को एक इंच से छोटा रखना, उनपर सरसों का तेल लगाना, दाढ़ी-मूंछ सब सफाचट रखना इत्यादि भी उन कानून में शामिल थेमैंने भी कुर्बानी दे दी अपनी खेती की जो मैंने बड़े शान से उगाई थी अपनी नाक के नीचेपिताजी को बड़ा दुःख हुआ था मगर क्या कर सकता थाहमारे यहाँ मान्यता है कि आदमी मूंछ अपने माता-पिता के मरने पर ही मुन्डाता है और इसलिए पिताजी का दुखी होना जायज़ भी थाउनके जीवन काल में ही अपनी खेती को उस तरह कुर्बान कर देना अच्छा तो मुझे भी नहीं लगा था मगर अब जब अपना साफ़-सुथरा चेहरा देखता हूँ तो अफ़सोस नहीं होताइन सब कानून के साथ कई सारे और भी नियम थेअंतिम से पहले वाला नियम था, "Seniors are always right" और अंतिम नियम था, "In any case of confusion, follow the previous rule।"
सच कहता हूँ, इन दो नियमों का पालन अपने पूरे कॉलेज-काल में जम कर किया मैंने और सच में बड़ी सहूलियत हुई इन दो नियमों के कारणआगे कुछ और रोचक हिस्से आपके सामने आयेंगे, इस बात की उम्मीद रखता हूँउम्मीद है ये प्रस्तुति पसंद आई होगी आपको.