Sunday, October 24, 2010

दुहाई अपने औरत होने की!

अभी अभी ब्लॉग की दुनिया में घूमते घूमते एक कविता मिली. 21वी सदी की औरत के बारे में कवयित्री काफी कुछ कह रही हैं. उनके मुताबिक़ 21वी सदी की औरत अब बेवकूफ नहीं बनती, वो चैट करती है, मर्दों से, उन्हें झांसे में रखती है अपनी सच्चाई के बारे में. ऐसा करके वो उनसे बदला लेती है जो सदियों से उनका शोषण करते आये हैं. उनको ये शोषण सूद समेत वापस लौटा कर वो आत्म संतुष्टि पा लेती हैं. उनका ब्लॉग सुरक्षित है इसलिए पंक्तियाँ यहाँ नहीं दे पा रहा हूँ, आप कविता इस लिंक पर पढ़ सकते हैं. बस उन्ही की कविता के जवाब में मेरी ये प्रस्तुति:



21वी सदी की नारी है,
हाँ, चैट कर लेती है.
आपसे, मुझसे,
हर किसी से.
कोई इनमे माँ ढूंढता है,
कोई बहन कोई दोस्त.
कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका.
हर कोई ढूंढता है
इनका एक नया रूप.
इस बात से अनजान
कि वो किसे ढूंढ रही.

अपने आप को चालाक समझती है,
धूर्त है, परिचय अनजाने में दे जाती है.
फिर भी समझ नहीं आता.
गफलत में रहती है,
जब सामने वाला इनका इस्तमाल करता है
ये खुश रहती है
सोचकर के इस्तमाल तो वो कर रही हैं.

पता नहीं खुद को क्या समझती है.
पर इतना जरूर है,
इस्तमाल हो जाने के बाद जब अहसास होता है
तो आँखों में आंसू जरुर आते हैं,
अपनी सच्चाई पता चले न चले
दुहाई जरूर देती है.
दुहाई अपने अबला होने की,
दुहाई मर्दों द्वारा तथाकथित शोषण की,
दुहाई अपनी ऐतिहासिक कमजोरी की.
दुहाई अपने औरत होने की!

 

Saturday, October 23, 2010

There are times when...



There are times when,
Life throws at us
Instances.
To look into,
To learn from,
To observe,
To conserve.

There are times when,
Life throws at us
Circumstances.
To understand itself,
To struggle,
To cope with,
To emerge ultimately, the Winner.

There are these same times when,
Despite life throwing at us
Chances,
We don't hold onto,
We don't change,
We don't improve,
We remain what we were.

The same person,
Sometimes a fool,
Sometimes arrogant,
Sometimes an amateur,
Most of the times, Errant and Ignorant!


  

Friday, October 22, 2010

कल रात, फिर से


कल रात, फिर से
बिस्तर की सिलवटों में,
बेचैनी की करवटों में.

कई ख्याल,
चंद सवाल.
नींद के इंतज़ार में,
मेज़ पर रखी घड़ी,
टिक-टिक करती घुमती घड़ी की सुइयां,
छत पर घूमता पंखा,
हलकी सी बारिश में भींगी
मिट्टी की भीनी -भीनी खुशबू,
हल्की चलती हवाओं से
पत्तियों की सरसराहट.
मन का क्या, निकल पड़ा.
बचपन की गलियों में,
यादो की टोली के साथ.

वो मोहल्ला,
वो पतली सी सड़क,
जामुन के पेड़ पर की
भूतों की कहानी,
शाम ढलते ही
घर लौटने की बेचैनी,
वो पुराने दोस्त,
वो पुरानी दोस्ती.
मन को कौन समझाए,
न अब वो मोहल्ला रहा,
न अब वो दोस्त, न दोस्ती रही.

मन तो फिर भी मन ही है,
न कोई ओर, न कोई छोड़,
न पतंग की कोई डोर.
कैसे बाँध लूं इसको.
कभी हवा के साथ,
कभी यादों के भंवर में,
कभी पुरानी बातों में,
तो कभी भविष्य के ख्यालों में.
मन घूमता रह गया,
कभी स्कूल की मस्ती में,
कभी कॉलेज की बातों में.
घूमता हुआ मन
न जाने कहाँ निकल गया.

वो नहीं रुकता,
न दिल को दुखाने वाली यादों से,
न आने वाली ज़िन्दगी के
संघर्ष के ख्यालों से.
कभी प्यारे दिनों की यादों में
होठों पर मुस्कराहट देता,
कभी उन उदास रातों को याद दिलाकर
आँखों में दो आंसू देता.
मन कुछ नहीं समझता,
वो तो बस घूमना चाहता है
ख्यालों में, यादों  में,
कभी कभी सवालों में.

कल रात, फिर से
बिस्तर की सिलवटों में,
बेचैनी की करवटों में...

 

Wednesday, October 20, 2010

तुम्हारे साथ!


उस शाम, राह पर
तुम्हारे साथ,
नज़रें झुकाकर,
ज़माने से बचाकर
चल रहा था.
कोई बात नहीं,
कुछ ख़ास नहीं.
बस चुपचाप.
सिर्फ एक अहसास,
सिर्फ दिल की एक आवाज़,
कि पकड़ लूं तुम्हारा हाथ.
कि ले चलूँ कहीं ज़माने से दूर.
वहां जहाँ कोई नज़र न हो
वहाँ जहाँ किसी का कोई डर न हो.

पर,

झुकी नज़रों का वो डर
मन का वो करना हमेशा 'किन्तु, अपितु, पर'.
हिम्मत हुई, सोचा
कब तक नज़रें झुकाकर
ज़माने की नज़रों को नज़रअंदाज करूंगा,
आखिर कब उस डर को भूलकर
अपने दिल के लिए इन्साफ करूँगा.
दिल ने एक आवाज़ दिया,
आवाज़ से ज्यादा धिक्कार दिया.
हिम्मत हुई, हाथ बढाया,
नज़रों को उठाया
ज़माने की नज़रों से नज़र मिलाया.

और फिर,

चिढाती हुई वो दोस्तों की ऑंखें,
सवाल पूछती वो बुजुर्गों की आँखें,
वो लोगों की नज़र,
उन नज़रों का डर,
वो ज़माने के पत्थर,
अपने घर के शीशे,
तुम्हारे परिवार की इज्ज़त,
अपने माँ-बाप की बेईज्ज़ती का डर.

वो सबकुछ,

बढ़ते हुए हाथ को फिर वापस कर लिया,
बस सबकुछ चुपचाप सोचता रहा,
मन में सब कुछ दबाकर
तुम्हारे साथ बस चलता रहा, चलता रहा.

Saturday, October 09, 2010

वक़्त बदल गया, हम बदल गए मैं वही रह गया, तुम आगे निकल गए!

वक़्त बदल गया, हम बदल गए
मैं वही रह गया, तुम आगे निकल गए.

सिर्फ एक साल ही तो छोटे थे तुम
भाई से ज्यादा दोस्त होते थे तुम.
साथ खेलना, साथ खाना, साथ उठना-बैठना,
कभी कभी तो साथ इतना वक़्त बिताने के लिए मार तक खाना.
दोस्ती की तकरार को भय्यारी से मिटा देना
भय्यारी की मुसीबतों को दोस्ती से सलटा लेना.
मुसीबतों में देना हमेशा एक दुसरे का साथ
एक दुसरे को बताना अपनी वो हर एक बात.

अचानक ये क्या हो गया?

तुम तुम न रहे,
मैं मैं न रहा
दोस्त तो हम नहीं ही रहे,
अब तो भाई भाई भी न रहा.
कभी सोचने बैठता हूँ तो सोच नहीं पाता कि दोषी है कौन,
मैं, तुम, हमारी दोस्ती, ये वक़्त या फिर कोई और.

वक़्त बदलता है, बदलेगा ही और बदला भी,
मगर हमारा वक़्त के साथ में बदलना जरूरी तो नहीं,
या कि दोषी ठहराऊं अपनी उस गहरी दोस्ती को
जो अपनी सारी बातें न बांटते तो आज ऐसा कुछ हुआ होता तो नहीं.
क्या तुम्हारी ज़िन्दगी में किसी और के आने से मैं अहम् न रहा
या ये मेरी ही नासमझी थी जिसके कारण हमारे बीच आज कुछ न रहा.

दोषी ठहराऊं तो किसे ठहराऊं, समझ नहीं आता
सब कुछ भूल जाऊं, ये सोचता हूँ, मगर कर नहीं पाता.
पांच महीने हो गए जब तुमने अंतिम बार मुझसे बात किया था
पता नहीं कहीं वो ही तो वो आखिर बार नहीं, जब तुमने मुझे याद किया था.

वक़्त बदल गया, हम बदल गए
मैं वही रह गया, भाई, तुम आगे, बहुत आगे निकल गए!
 

Wednesday, October 06, 2010

उस पुराने वाले 'तुम' को कहीं न कहीं खोज कर अपना वही 'हम' ज़रूर बनाऊंगा

कई बार ज़िन्दगी में कुछ ऐसे दुखों का सामना करना पड़ता है कि फिर ज़िन्दगी पर से विश्वास उठने लगता है. किसी बहुत अपने को खोने के बाद ये डर हमेशा सताता रहता है कि कहीं बाकी सब भी छोड़ कर न चले जाये. ऐसे में दोस्तों के साथ की जरुरत होती है और मन बार बार इस बात की तसल्ली लेना चाहता है कि वो साथ हैं या नहीं. ऐसी ही कुछ स्थिति एक अभिन्न मित्र के ज़िन्दगी में कुछ साल पहले घटी. उसने अपने पिताजी को खोया और आज भी हम दोस्तों से इस बात की तसल्ली लेता रहता है कि हम उसके साथ हैं या नहीं. उसी को समर्पित मेरी ये कविता!


दोस्त,
वो बचपन के दिन याद हैं?
मेरे लिए एक नया स्कूल, एक नयी जगह,
कोने में चुपचाप बैठे रहने की मेरी एक ही वजह.
मेरा कोई दोस्त न था वहाँ.
पुराने दोस्तों को पीछे छोड़ आया था,
नए बनाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था.
जब चाहा था किसी का साथ
तब तुमने ही बढाया था अपना हाथ.

हाँ, दोस्त,
मुझे वो सबकुछ याद है.
वो क्लासरूम की मस्ती,
लंच पीरियड की वो मटरगस्ती,
स्कूल फी जमा करने के बहाने क्लास बंक करना,
स्पोर्टस पीरियड लगवाने के लिए टीचर से जंग करना,
कैंटीन के समोसे की लाइन में मुझे धकेल देना,
और क्लास में पनिशमेंट के लिए मेरी जगह खुद चले जाना.
तुम्ही तो रहते थे हर पल साथ.

हाँ दोस्त, 
मुझे सब कुछ है याद.
मगर आज फिर भी तुम पूछते हो, मैं दूंगा न तुम्हारा साथ?
सच्चे दोस्त कभी बदलते नहीं,
जो बदलते हैं वो सच्चे होते नहीं.
मैं जानता हूँ दोस्त तुमने क्या खोया है,
इतनी कच्ची उम्र में ही कितना रोया है.
पिता को खोने के दर्द को मैं ले तो नहीं सकता हूँ
पर उस दर्द को बांटने का जतन तो कर सकता हूँ.
जानता हूँ, उस वक़्त तुम्हारे आंसू पोछने न आ सका
मालूम है मुझे, तुम्हारी दोस्ती का क़र्ज़ न चुका सका.

पर दोस्त,
ज़रा सोचो,
हमने भी तो खोया है किसी अपने दिल के करीब को.
वो 'तुम' जो उस दर्द के मिलने के पहले हुआ करते थे
आज उस दर्द के साए में कहीं खो गए हो,
वो 'तुम' जो कभी मेरे 'हम' का हिस्सा थे
आज कहीं दूर हो गए हो.
पर याद रखना, दोस्त,
अपनी दोस्ती का क़र्ज़ ज़रूर चुकाऊंगा
उस पुराने वाले 'तुम' को कहीं न कहीं खोज कर
अपना वही 'हम' ज़रूर बनाऊंगा.


Sunday, October 03, 2010

गाँधी, सिर्फ एक सोच या स्वतंत्रा संग्राम का प्रणेता भी?

"I want world sympathy in this battle of right against might."- M.K. Gandhi, 5/4/1930
आज सुबह से ही फेसबुक, ट्विटर, ब्लौगर हर जगह गाँधी जयंती की धूम मची रही. हर ओर पिछली सदी के इस महात्मा को जन्मदिन की शुभकामनाएं देने की होड़ लगी हुई थी. हर कोई इन्हें याद कर रहा था. इसी क्रम में फेसबुक पर मुझे ये तस्वीर मिली. 5 अप्रैल 1930 को गाँधी के हाथ से लिखे गए इस पंक्ति के नीचे उनके ही हस्ताक्षर भी हैं. इस पंक्ति के माध्यम से गाँधी दुनिया से सहानुभूति चाह रहे हैं सत्य की मजबूत के खिलाफ अपनी जंग के लिए. ज़रा ध्यान दीजिये, जिस शब्द का प्रयोग गाँधी कर रहे हैं वो है 'symapthy' यानि 'सहानुभूति.' इस एक शब्द ने न जाने कितने विचार मन में ला दिए. यदि ऊपर की इस पंक्ति से गाँधी के दस्तखत और बैकग्राउंड से उनकी तस्वीर हटा दी जाए और एक पल के लिए सोचा जाये कि एक आम भारतीय ने इस पंक्ति को लिखा है तो क्या ऐसा प्रतीत नहीं होता कि कोई अपने देश के लिए दुनिया से भीख मांग रहा है वो भी किसकी, तो सहानुभूति की. अगर गाँधी के परिप्रेक्ष्य से इस बात को पढ़ा जाए तो एक महान वक्तव्य प्रतीत होता है उस महान योद्धा का जिसने अपना न जाने क्या क्या कुर्बान कर दिया मुल्क की खातिर. मगर उस दृष्टिकोण से थोडा परे हटकर पढ़िए और तब सोचिये कि क्या इस पंक्ति ने हमारे देश को बेचारा बना कर पेश किया है या नहीं.
बचपन से थोडा गरम दिमाग का रहा हूँ, शायद इसीलिए गाँधी की कार्यशैली कुछ ज्यादा पसंद नहीं आई. फिर भी वो महात्मा, जो गाँधी हैं, उनकी इज्ज़त करता हूँ. इंसानी पीड़ा को समझने की उनकी क्षमता और इस ओर अपना सब कुछ न्योछावर करके लोगों को उनके अधिकार दिलाने के उनके शतत प्रयास को हमेशा मेरा शत-शत नमन है. गाँधी, जो एक सोच है, हमेशा उसका कायल रहा हूँ. 'सत्य' और 'अहिंसा' से अधिक विश्वास उनकी 'समानता' और 'निरपेक्षता' की सोच पर है. गाँधी को अगर गांधीजी कहता हूँ तो वो सिर्फ उस इंसान के लिए है जिसने सामाजिकता का ज्ञान भारत को दिया, उस गाँधी के लिए नहीं जिसे आसानी से लोग भारत का सबसे बड़ा स्वतंत्रा सेनानी मान लेते हैं.
गाँधी नाम के उस स्वतंत्रा सेनानी, जिसे आम तौर पर भारतीय स्वतंत्रा संग्राम का प्रणेता माना जाता है, उसपर कुछ ख़ास यकीन मैं नहीं रखता. पहले भी लिख चुका हूँ कि शायद इसका कारण मेरा गरम दिमाग का होना है. आज जब इस तस्वीर को देखा तो फिर से वो सारे विचार मन में आ गए जिनसे कई बार पहले भी साक्षात्कार हो चुका है. क्या सच में गाँधी भारत की स्वतंत्रा के लिए लड़े थे, क्या गाँधी के आन्दोलनों के पीछे की मंशा आज़ादी थी, क्या गाँधी को हमारी स्वतंत्रा के लिए उतना श्रेय दिया जाना चाहिए जितना उन्हें मिला है? मेरे लिए इन सभी सवालों का जवाब ना ही है.
अफ्रीका में सामाजिक द्वेष के खिलाफ अपनी लड़ाई के बाद जब गाँधी भारत आये तो उन्हें यहाँ के आम भारतीयों की हालत भी वैसी ही लगी. और तब शुरू हुई गाँधी की लड़ाई, लड़ाई मौलिक अधिकारों के लिए, लड़ाई सामाजिक एकता के लिए. कहीं भी इस लड़ाई का मकसद आज़ादी नज़र नहीं आता. वो चंपारण का सत्याग्रह हो या डांडी का नमक सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा आन्दोलन हो या असहयोग आन्दोलन कहीं भी आज़ादी की लड़ाई नहीं दिख रही थी. अगर अंग्रेज़ भारतीयों को उनके अधिकार दे देते और उनपर ज़ुल्म ढाना बंद कर देते तो शायद फिर गाँधी को अंग्रेजी हुकुमत से कोई परहेज नहीं था. 1942 के भारत छोडो आन्दोलन के पहले के लगभग 27 साल के उनके संघर्ष में कहीं भी भारत को आज़ादी दिलाने के बारे में कोई बात नहीं हुई.
बीसवीं सदी के पांचवे दशक तक आते आते दुनिया के हालात ऐसे हो गए थे जहां उपनिवेशवाद अपना अस्तित्व खोता जा रहा था. पूरी दुनिया में एक राय बन चुकी थी उपनिवेशवाद के खिलाफ. दो दो विश्व युद्ध देखने के बाद हुकूमतों की ऐसी हालत नहीं रह गयी थी कि वो इसका अस्तित्व बचा कर रख सके. इसी कड़ी का एक हिस्सा '42 का भारत छोडो आन्दोलन भी था और '47 की हमारी आज़ादी भी. शायद यही कारण है कि सोचता हूँ कि यदि गाँधी नहीं होते तो क्या हम आज़ाद नहीं हुए होते.
भारत-पाकिस्तान बंटवारे, भगत सिंह की फांसी, और सुभाष चन्द्र बोस पर उठते रहे विवादों के कारण भी मन गाँधी को मानने से इनकार करता रहा. अगर गाँधी ने कांग्रेस से नाता न जोड़ा होता तो शायद भारत का कभी बंटवारा नहीं हुआ होता. जिस वक़्त गाँधी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से सम्बन्ध बनाया था उस वक़्त जिन्ना एक मजबूत कांग्रेसी की तरह स्थापित हो चुके थे. जिन्ना की भव्य जीवनशैली के सामने गाँधी को नेहरु का खादी धारण करना ज्यादा पसंद आया. जिन्ना कांग्रेस से दूर होते गए और नेहरु की धाक जमती गयी. अंत क्या हुआ ये आप और हम सब जानते हैं. पाकिस्तान के रूप में एक नासूर हमें आज भी दर्द दे रहा है. नेहरु की इसी बढती धाक का एक और नतीजा सुभाष चन्द्र बोस जैसे सच्चे स्वतंत्रा सेनानी के नैतिक गिरावट के रूप में भी आया. भगत सिंह की फांसी का मामला किसी से छुपा नहीं है. 1931 के द्वितीय गोल मेज़ सम्मलेन में भाग लेने के लिए कांग्रेसियों को मनाने की अंग्रेजी हुकुमत की कोशिशें गाँधी-इरविन पैक्ट के रूप में कामयाब हुई. असहयोग आन्दोलन में गिरफ्तार किये गए सभी कांग्रेसियों की रिहाई इस पैक्ट का एक महत्वपूर्ण बिंदु थी. उस वक़्त भगत सिंह जैसे उन क्रांतिकारियों को छोड़ दिया गया जिनका मकसद भी वही था जो कांग्रेस का था सिर्फ रास्ते अलग अलग थे. ऐसी बातों से मन में विचार जरूर आने लगते हैं कि कहीं न कहीं गाँधी अपने अनुयायिओं के प्रति ज्यादा वफादार थे. हालांकि, गाँधी, जो एक सोच है, उसके हिसाब से ऐसा नहीं हो सकता मगर फिर भी इनकार नहीं करूंगा कि ऐसे सोच मन में कभी नहीं आते.
खैर, वैसे भी आज गाँधी को लेकर दोस्तों से इन्ही बातों पर काफी बहस हो चुकी है और अब यहाँ भी काफी कुछ अपनी बात रख चुका हूँ. जिस तरह से आम धारणाओं के विपरीत मैंने बातें की हैं उससे तो यही लग रहा है कि कई लोग मुझसे सहमत नहीं होंगे, मगर ये सिर्फ एक नजरिया है. ये मेरी सोच है, आपसे भिन्न हो सकती है. आपकी सहमति और असहमति दोनों का स्वागत है. धन्यवाद!

Thursday, September 30, 2010

अयोध्या: राम-जन्मभूमि या हिन्दू-मुस्लिम दंगों की नींव?

इधर राष्ट्रमंडल खेलों के साथ-साथ देश में अगर किसी चीज़ ने सुर्खियाँ बटोरी है तो वो अयोध्या है. बहुचर्चित अयोध्या मामले में पिछले 60 साल पुराने केस का निर्णय न्यायालय में आज दिन के 3 .30 बजे आने वाला है. 24 तारीख को ही आने वाला ये निर्णय सर्वोच्च न्यायलय के हस्तक्षेप के बाद लंबित होकर अंततः आज आने वाला है. एक बार फिर वो सारी तय्यरियाँ की जा रही हैं जो सब 24 तारीख को आने वाले उस तथाकथित तूफ़ान के लिए की गयीं थी. हालांकि इस निर्णय का कोई व्यापक असर नहीं होने वाला क्यूंकि मामले का सर्वोच्च नयायालय में जाना तय है मगर फिर भी, किसी अनहोनी घटना से पूर्णतया इनकार नहीं किया जा सकता और इसीलिए, असाधारण सुरक्षा इन्तजाम किये जा रहे हैं.
इस अयोध्या मामले ने कहीं न कहीं मुझे भी ख़ासा प्रभावित किया है. जब इसके दोनों संभव फैसलों के बारे में सोचता हूँ तो पाता हूँ कि फैसला जिसके भी पक्ष में जाए हार तो भारत की ही होनी है. अगर फैसला वहां पर मंदिर बनाने का आता है तो सवाल भारत की साम्प्रदायिकता पर उठेंगे कि अपने आप को सेकुलर कहने वाले हिंदुस्तान में इतना बड़ा फैसला हिन्दुओं के पक्ष में कर दिया गया. अगर फैसला मस्जिद बनाने का आता है तो फिर सवाल भारतीय राजनीति पर उठेंगे कि मुस्लिम वोट बैंक को बचाने के लिए ये फैसला उनके पक्ष में कर दिया गया. कुछ भी हो, भारतीय न्याय व्यवस्था शायद इससे पहले इस तरह के सवालों से कभी नहीं घिरी थी. न्यायपालिका पर सवाल उठना अब अपरिहार्य हो चला है.
फैसला कुछ भी आये, फर्क तो हम सब पर जरूर पड़ेगा, ज्यादा नहीं तो थोडा ही सही. आने वाले इस निर्णय और उसके परिणाम की कल्पना करता हूँ और, झूठ नहीं कहूँगा, मन एक बार सिहर जरूर जाता है. डर लग जाता है कि कहीं बम्बई और गुजरात की पुनरावृत्ति न हो जाए. इस डर के साथ जब पूरे मामले को खंगालना शुरू करता हूँ तो यही सवाल मन में बार बार दस्तक देते हैं. आखिर ये अयोध्या क्या है? क्या है इसका मतलब मेरी पीढ़ी के लिए? पूरे अयोध्या काण्ड में मेरी पीढ़ी खुद को कहाँ देखती है?
1947 में भारत के साथ भारत में एक अजीब सी आग ने जन्म लिया था. बंटवारे की उस आग में अपनी आज़ादी को भूल कर न जाने कितने मतवाले हिंदवासी रातों रात 'हिन्दू' और 'मुस्लिम' बन गए थे. एक ऐसी ज्वाला भड़की थी जिसकी लपटों ने हिन्दू-मुस्लिम दंगों की शक्ल लेकर न जाने कितनी जानें ली थी. न जाने कितनी जिंदगियां बर्बाद हुई थी, न जाने कितने परिवार उजड़े थे. उस आग की गर्मी में झुलसता हुआ भारत, फिर भी, अपनी आज़ादी को पाकर आगे बढ़ने के लिए प्रतिबद्ध था. समय के साथ भारत जवान होता गया. नयी पीढ़ियों ने पुरानी पीढ़ी का स्थान लेना शुरू किया. बंटवारे के दंश को झेलने वाली उस पीढ़ी के साथ हिन्दू-मुस्लिम की वो आग भी धीरे धीरे मद्धिम पड़ गयी. अगर दिसंबर '92 न हुआ होता तो शायद मेरी पीढ़ी तक आते आते कोई कभी धर्म की बंदिशों को अपने विकास के रास्ते में रोड़ा नही बनने देता. मगर दिसंबर '92 हुआ और हम सब जानते हैं कि फिर क्या क्या हुआ. राम के नाम पर न जाने क्या क्या घिनौने खेल खेले गए पूरे देश में. जब यह सब हुआ था तब सिर्फ 5 साल का था. सच पूछिए तो ख़ुशी होती है कि सिर्फ 5 साल का ही था, कम से कम मैंने जो भी जाना वो सिर्फ अखबारों में पढ़ा या टीवी पर देखा. उस समय की कोई भी याद मेरे ज़हन में नहीं है. और इस बात के लिए शुक्रगुजार हूँ अपनी उम्र का कि मुझे कुछ नही याद. मेरे लिए तो अयोध्या का सिर्फ एक ही मतलब बनता है. उस बुझती हुई आग की लपटों को फूँक मार कर फिर जिंदा कर देना जो आग बंटवारे के वक़्त सब के सीनों में लगी थी.
राम के नाम पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद् ने जिस तरह का काम किया है शायद उसी का कारण है कि हिन्दू होने के बावजूद दिल से कभी इन दोनों से नहीं जुड़ पाया हूँ. हम उस देश में रहते हैं जहां 'जय राम जी की' का इस्तमाल अभिवादन के लिए आता है. हिन्दू हो या मुस्लमान, हर कोई इसे नमस्ते या सलाम के रूप में इस्तेमाल करता है. इसी 'जय राम जी की' उद्घोष के साथ जिस तरह पूरे भारत में सांप्रदायिक दंगों की नींव रखी गयी उससे आज मन में इन शब्दों के लिए भी भिनक पैदा हो गयी है. जिस 'राम-राज' को लाने की बात RSS और VHP करते हैं, वही 'राम-राज' कब 'राम-राजनीति' बन गया, कभी पता ही नहीं चला. अपने राज दरबार में सीता, लक्ष्मण और हनुमान संग बैठे मर्यादा-पुरुषोत्तम राम की तस्वीर कब धनुष उठाये प्रचंड राम में बदल गयी इसका कोई अंदाजा ही नहीं लग सका. कार-सेवा के नाम पर जो कलंक राम की नगरी अयोध्या पर चढ़ गया उस कलंक से छुटकारा पाने की कोई स्थिति मुझे तो नज़र नहीं आती. अपने राजनीतिक फायदे के लिए सभी पार्टियों ने मिलकर जो कुछ किया वो दिल को दुखा देने के लिए काफी है.
अयोध्या की उस ज़मीन का विवाद सदियों पुराना है. न्यायालय तक यह विवाद 60 साल पहले पंहुचा, जब मैं क्या मेरे पिताजी ने भी जन्म नहीं लिया था. इतने समय से जिस निर्णय का इंतज़ार हो उसके लिए उत्सुकता तो मन में रहेगी ही. पता नहीं क्या निर्णय आने वाला है. यथार्थ से दूर देखें तो जी चाहता है कि उस ज़मीन पर ऐसा कुछ बने जो समाज के लिए एक प्रतीक हो, एक उपहार हो. कोई स्कूल बन जाए, कोई अस्पताल बन जाए या कुछ भी. मगर क्या अपने फायदे के लिए मस्जिद तक को गिरा देने वाले इतने से शांत हो जायेंगे. फिर विवाद उठेगा कि अस्पताल का नाम श्री राम अस्पताल रखा जाए या बाबरी हॉस्पिटल. काम करने वाले हिन्दू हों या मुसलमान और न जाने क्या क्या. जब तक फायदा उठाने वाले ये राजनीतिक दल मौजूद रहेंगे तब तक इस विवाद का कोई हल संभव नहीं है. या यूँ कहें कि जब तक इन राजनीतिक दलों के बहकावे में आने के लिए हम तैयार रहेंगे तब तक इसका कोई हल नहीं.
अज दिन में क्या निर्णय आने वाला है इसे भविष्य के गर्भ में ही छुपा छोड़ देते हैं मगर फिर भी, दिल सोचने को मजबूर हो ही जाता है कि उसके बाद क्या होगा. इस बार कहाँ कहाँ दंगे भड़केंगे और कितने लोग बेमौत मारे जायेंगे. एक मन करता है कि कभी ये फैसला आता ही नहीं तो कितना अच्छा होता. मगर काल्पनिक दुनिया से निकल कर हकीकत को देखता हूँ तो लगता है कि ये एक ऐसा तूफ़ान है जो आज नहीं तो कल भारत को झेलना ही है. कभी न कभी तो ये निर्णय आएगा ही. कई लोग आपसी सुलह की वकालत कर रहे हैं. अगर किसी सूरत में ये संभव हो तो सच में स्वागत है इसका मगर फिर, जब बात यथार्थ की आती है तो सब कुछ खोखला ढकोसला लगने लगता है. जिस सुलह की गुंजाईश पिछले 60 सालों में नहीं बन पायी वो अब क्या बनेगी. हाँ इतना जरूर सोचता हूँ कि ये जो आपसी सुलह की वकालत कर रहे हैं, ये यदि इतने जागरूक और परिपक्व हैं तो फिर निर्णय के बाद किसी अनहोनी की बात ही कहाँ उठती है. यही तो वो लोग हैं जिनसे हमें डर है कि न जाने अपने फायदे के लिए निर्णय के बाद क्या क्या गुल खिलाएंगे.
हिन्दू हूँ और इसलिए ये नहीं कहूँगा कि निर्णय में मंदिर बनाने की बात यदि आती है तो मन में ख़ुशी नहीं होगी. खुश जरूर होऊंगा ऐसी सूरत में. मगर, यदि ये राम मंदिर खून से सने पत्थरों की नींव पर बनायीं जाती है तो मैं इसके पक्ष में नहीं हूँ. निर्णय में जो कुछ भी हो, बस इतना चाहता हूँ कि देश को '93 की बम्बई और '02 का गुजरात फिर न देखना पड़े.



 
   

Tuesday, September 28, 2010

दो तस्वीरें, एक शर्म और एक गर्व, फैसला आपको लेना है आप किसके साथ हैं!!!

राष्ट्रमंडल खेलों के शुरू होने में सिर्फ 5 दिन बाकी रह गए हैं. पिछले कुछ दिन इन खेलों को लेकर काफी असमंजस बना रहा. दिल्ली सरकार, भारतीय ओलम्पिक संघ और पूरी आयोजन समिति ने मिलकर देश का काफी बेड़ा गर्क किया. मीडिया की माने तो देश की काफी खिल्ली उडी विदेशों में. जिन खेलों के द्वारा "Brand India" को बाहर दुनिया में स्थापित करने की बात की जा रही थी उन्ही खेलों की तय्यारी ने इसी "Brand India" के नाम पर एक धब्बा लगाया. मीडिया की माने तो हर भारतीय के ऊपर इन खेलों की तय्यारियों ने एक जोरदार तमाचा मारा है. मगर क्या सच में ऐसा बहुत कुछ हुआ है? कुछ तो हुआ है मगर जहां बात बहुत कुछ की आती है वहाँ दिल थोडा रूककर सोचने को चाहता है और फिर कई विचार मन में आने लगते हैं.
भारत को इन खेलों की मेजबानी लगभग 8 साल पहले मिली थी. वादा किया गया था एक अद्वितीय अनुभव का जो सभी को हमेशा याद रहेगा. एक कल्पना की गयी थी अद्भुत खेलों की जो पहले कभी नहीं हुआ था और हर दिशा में अप्रतिम ही था. आज 8 साल बाद उन सपनों के साकार होने का जब समय आया है तो हम जरूर अपनी कल्पनाओं से पीछे छुट गए हैं मगर जो हमने किया है वो क्या किसी सपने से कम है.
चाहे कोई कुछ भी कह ले, भारत आज भी एक विकासशील देश ही है. पिछले ८ सालों में न जाने भारत ने क्या क्या देखा और झेला है. जब दुनिया मंदी के दौड़ से गुजर रही थी वही भारत एक मजबूत अर्थ-व्यवस्था के रूप में  उभर रहा था. इसके लिए महंगाई के रूप में एक बड़ी कीमत भारतीयों ने चुकाई है. पिछले ८ सालों में न जाने कितनी बार आतंकियों और नक्सलियों ने हमारे सीनों को छलनी किया है मगर भारत आज भी दृढ विश्वास के साथ सबों का स्वागत कर रहा है. सूखे और बाढ़ से लड़ता हुआ भारत अपने वादों को पूरा करने के लिए आज भी तत्पर है.
ज़रा सोचिये, ऐसी स्थिति में हमने अपने देश को क्या दिया है सिवाय आलोचना, नाउम्मीदी और कभी-कभी तो गालियों के. ये हम हैं, हम भारतीय. हर बात पर जो हमें पसंद नहीं हो उसका ठीकड़ा सरकार के ऊपर फोड़ना हमारा शौक है. अपने देश में मौजूद भ्रष्टाचारी को इस कदर गरियाते हैं जैसे एक हमारा ही देश भ्रष्ट हो. इस लिंक को देखिये. जहां हमारा देश भारत ऐसे देशों में 35 नंबर पर है वहीँ हम सब का 'गौरव और सपना' अमेरिका दुसरे नंबर पर है. हर बात पर हमारा हाय तौबा मचाना कि भारत कभी नहीं सुधर सकता, हमारी आदत बन चुकी है मगर हम कभी इतना नहीं सोचते कि हम कितना सुधर गए हैं.
चलिए मानता हूँ तय्यारियों में जो देरी हुई वो नहीं होनी चाहिए थे. मानता हूँ कि जो पुल टूट गया वो नहीं होना चाहिए था या जो छत गिरी वो भी नहीं होना चाहिए था, या खेल गाँव में जो गन्दगी फैली हुई थी हो नहीं होनी चाहिए थी मगर इस सब को देख के हमने क्या किया. गालियाँ दी. किसे? उनको जिन्होंने हमारे सपनों को साकार करने का बीड़ा उठाया था. जरूर उन्होंने हमारे इस सपनों में सेंध लगाकर अपनी निजी सपनों की दुनिया बनायीं मगर क्या हमारा फ़र्ज़ नहीं बनता कि हम उनका सहयोग करें. उन्हें वो प्रोत्साहन दें जिसकी उन्हें जरूरत है. कुछ दिन पहले ही फेसबुक पर एक फोटो अल्बम लोड की गयी जिसमे 52 तस्वीरें थी जिन्हें कभी किसी ने प्रकाशित नहीं किया, क्यूंकि उनमे TRP नहीं थी. उनमें खेल गाँव की अद्भुत सुन्दरता को दिखलाया गया है, मगर हमने उन्हें देखने की कोई जहमत नहीं उठाई, हमें तो बस टोपिक चाहिए, सरकार और देश को गाली देने का.
हमें बुरा लगा कि पश्चिमी मीडिया ने हमारे खेल-गाँव की वो ही तस्वीरें अपने मुल्क में छापी जिसमे भूखे-नंगे लोग इस सपने की दुनिया को बनाने के लिए मजदूरी कर रहे थे मगर हमने कभी ये नहीं सोचा कि ये तस्वीरें उनके पास गयी कैसे. अपने घर में ही सेंध लगाने की हमारी आदत पुरानी है. मीडिया को जब खेल गाँव का हिस्सा दिखाया जा रहा था तो उन्हें वो 60 % भाग कभी नहीं दिखे जो सच में विश्व-स्तरीय थे मगर बाकी के 40 % में हमेशा उन्हें दिलचस्पी रही. बुराइयों को दिखाइए मगर, अच्छाइयों को छुपाना कहाँ तक जायज़ है. 

दुनिया में कभी भी किसी भी खेल में जो न हुआ वो भारत में इस राष्ट्रमंडल खेलों में करने की योजना थी. एक महत्वाकांक्षी परियोजना शुरू की गयी थी. आज तक कभी कोई खेल गाँव "5 star" नहीं बना था, हमने वो सपना देखा और कोशिश भी की. कुछ हिस्से बने भी शानदार मगर समय पर काम ख़त्म करने की कवायद ने बाकी हिस्सों को वैसा नहीं बनने दिया. आज जब हम अपने खेल गाँव को देख रहे हैं तो तुलना उससे की जा रही है जो कभी किसी ने देखा ही नहीं. हाँ, "5 star" खेल गाँव नहीं बन सका मगर जो बना वो कही से विश्वस्तरीय नहीं हो ऐसा नहीं है. भारत पर हमें विश्वास रखना होगा. भौतिक सुख देना हमारी पहचान नहीं, हम जाने जाते हैं रिश्तों को निभाने के लिए. "Hi", "Hello" और गाल को चूम कर स्वागत करना हमें नहीं आता, हम दिल के अन्दर से "नमस्ते" बोल कर सत्कार करते हैं. जो हम हैं, वो हमें दिखना भी चाहिए. झूठी शान ज्यादा दिनों तक नहीं रहती. मुश्किलें कहाँ नहीं आती. मुश्किलों से निकलकर एक शानदार आयोजन करके ही हमें दुनिया को दिखलाना है कि हम सिर्फ 'संपेड़ों की धरती' ही नहीं 'सोने की चिड़िया' भी हैं!

कुछ तस्वीरें भी लगा रहा हूँ, एक शर्म और एक गर्व, फैसला आपको लेना है आप किसके साथ हैं!!!

Monday, August 02, 2010

यादें, याद आती हैं...

पूरी तो नहीं कहूँगा मगर कम से कम आधी दुनिया के लिए कल का दिन बहुत महत्वपूर्ण था. मेरे लिए भी कल का दिन एक अलग तरह की महत्ता के साथ आया. जहां मेरे सारे दोस्त और शायद अनगिनत और लोग कल "Friendship Day" मना रहे थे वहीँ मैं भी खुश था मगर कारण कुछ और था.
सबसे पहले तो मैं ये बताना चाहता हूँ कि ऐसे किसी भी Day पर मुझे कोई विश्वास नहीं है. मेरा तो मानना है कि दोस्ती और दोस्त 365 दिन के लिए होते हैं, किसी एक दिन पर इनकी याद करने से सिर्फ इनकी महत्ता कम ही की जा सकती है और कुछ भी नहीं. अचानक से न जाने कहाँ से इतने सारे दिन आ गए हैं हमारे मनाने के लिए. कभी friendhip day, कभी rose day, कभी father's day, कभी mother's day, कभी brother's day, कभी sister's day, और न जाने कितने कैसे कैसे दिन. पश्चिमी सभ्यता से कुछ चीजें अगर लेने में हमने कोई कोताही नहीं बरती है तो वो ये दिन ही हैं. जन्म से अभी तक साढ़े तेईस साल हो चुके हैं और सत्रह-अट्ठारह साल की उम्र तक मुझे नहीं याद कभी ऐसे दिनों के बारे में सुना भी करता था. शायद यही कारण है कि अभी जब इन दिनों को मनाने के बारे में सुनता हूँ तो बरा अटपटा लगता है, यहाँ तक कि अगर कोई अपना मुझे इनकी बधाई दे जाता है तो मन करता है बस मुंह नोच लूं. मगर बचपन में पढाया गया था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और इसी बात को ध्यान में रखकर बस समाज की राह पर ही चलते हुए मैं भी जवाब दे जाता हूँ. भाइयों के लिए भय्या दूज और बहनों के लिए राखी का पर्व मनाने वाले हमारे समाज में कब इन दिनों ने अपनी जगह बना ली समझ नहीं आया.
"डॉ." बनने की तरफ पहला कदम, 1st Year
बहरहाल, कहाँ मैं कल के दिन की अपनी ख़ुशी के बारे में बात कर रहा था और कहाँ इन सब पचड़ों में पडा रह गया. जैसा कि पहले भी लिख चुका हूँ, कल का दिन मेरे लिए अलग तरह से महत्वपूर्ण था. ये पोस्ट कल ही लिखना चाह रहा था मगर इन्टरनेट कनेक्शन के न रहने के कारण लिख नहीं सका. कल का दिन यादों की कश्ती में बैठकर पुराने दिनों के समंदर में दूर तक सफ़र करने में ही बीत गया. बचपन में एक सपना देखा था, डाक्टर बनने का. 5 साल पहले कल के ही दिन इस सपने की तरफ अपना पहला कदम बढाया था. अपने कॉलेज जीवन का वो पहला कदम 1 अगस्त 2005 को रखा था और आज पूरा आधा दशक बीत चुका है और नाम के आगे "Dr." लगाने का वो सपना आज पूरा हो चुका है. 5 साल पहले के उस दिन को लम्हा-दर-लम्हा एक बार फिर जी लिया कल बैठे बैठे ही. मेडिकल कॉलेज में घुसने की ख़ुशी, सीनियर की रैगिंग का डर, नए दोस्तों से मिलने की उत्सुकता और न जाने क्या क्या. सफ़ेद शर्ट, सफ़ेद पैंट, ऊपर से एप्रन और खादी की हरे रंग की एक बैग के उस ड्रेस कोड में जोकर से कम नहीं लग रहा था मगर सीना इस तरह चौड़ा करके चल रहा था जैसे कहीं का राजा बन गया हूँ. एहसास हो रहा था कि दुनिया का पहला डाक्टर बनने वाला हूँ, इस बात से पूरी तरह से बेखबर कि एक ऐसे कैम्पस में कदम रख रहा हूँ जहां कौवा बीट भी करता है तो गिरता किसी डाक्टर के सर पर ही है.
Dr. Anshuman Aashu
खैर, ख़ुशी का वो मंजर फिर से जीने की इच्छा होती है. समय को वापस घुमाने का कोई भी रास्ता होता तो शायद उसी पल को जीता, एक बार नहीं बार बार. अभी कल की ही बात लगती है जब हॉस्टल के छत पर रैगिंग में अपने इज्ज़त की नीलामी देख रहा था, मगर तभी हवा का एक झोका आता है और कैलेंडर के साठ पन्नों को उड़ाकर आज का दिन दिखा जाता है और तब एह्साह होता है कि आधा दशक बीत गया सब कुछ हुए. अपने जैसे न जाने कितनों की इज्ज़त की नीलामी उसी छत पर कर चुका हूँ, न जाने कितनों को उसी तरह सीना चौड़ा किये हुए इस कैम्पस में घुसते हुए देख चुका हूँ और न जाने कितनों को इसी चौड़े सीने की बलि चढ़ते हुए सड़क पर ही मुर्गा बनते हुए देख चुका हूँ. मगर फिर भी उस दिन की यादें हैं जो जाने का नाम नहीं लेतीं. यादें, याद आती हैं...