Tuesday, February 23, 2010

रैगिंग और हमारी एमबीबीएस यात्रा

अंततः परिक्षाओं से छुटकारा मिला। पिछली 2 जनवरी को जो अंतिम वर्ष की परीक्षा शुरू हुई थी कल जाकर पूरे 50 दिन के बाद खत्म हुई। हालांकि खत्म इन्हें 11 दिन पहले ही होना था मगर विश्वविद्यालय हड़ताल के कारण कुछ और दिन लग गए। लग गए तो लग गए, आखिर खत्म तो हुए, नहीं तो लग रहा था कि हनुमान जी की पूंछ ही बनती जा रही है ये परीक्षा। बताता चलूँ कि कॉलेज की आंतरिक परीक्षाएं दिसंबर महीने में ही थी और बीच में कुछ 15-20 दिनों का फासला। अतः तकनीकी रूप से कहूँ तो परीक्षाएं दिसंबर से ही हो रही हैं और तैयारियां अक्टूबर से ही चल रही थी। ५ महीने तक किताबों के साथ ऐसी जंग शायद पहले कभी लड़ने का मौका नहीं मिला था। द्वितीय वर्ष में भी इतनी ही लंबी परीक्षा हुई थी मगर उसमे तनाव कम था। जो मानसिक उलझनें इस परीक्षा में आयीं वो अभी तक तो कभी भी नहीं आई थी। खैर, अब परीक्षा समाप्त हो चुकी है और महीने भर के अंदर परिणाम भी आ जायेंगे। उम्मीद करता हूँ कि महीने के अंदर ही मैं अंशुमान से डा. अंशुमान बन जाऊँगा।
साढ़े चार साल पहले मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद भी कुछ ऐसा ही सोचा था। फर्क था कि उस समय वक्त साढ़े चार साल का था। आज वो दिन याद कर रहा हूँ तो कई गुदगुदाने वाले पल याद आ रहे हैं। बारहवीं के बाद सीधा मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पाना एक अप्रतिम अनुभूती थी। 17 साल की उस उम्र में इस खुशी को दबा के रख पाना बड़ा ही मुश्किल था। खुशी मनाने वाली बात भी थी सो हमारा पूरा परिवार खुश भी था। काउंसलिंग के लिए मेरे साथ माँ और पिताजी दोनों आये थे। बड़ा ही उत्साह था। चारों तरफ मेरे जैसे ही खुश विद्यार्थी और उनके माता-पिता। जब सब को देखा तो अपने आप को उस भीड़ में से ही एक पाया। सुकून सिर्फ एक बात का था कि ये भीड़ एक अलग भीड़ थी। बाहर एक और बड़ी भीड़ इस भीड़ का हिस्सा बनने के लिए इन्तज़ार कर रही थी और हमारा इन्तज़ार खत्म हो चुका था।
चूँकि काउंसलिंग बिहार सरकार के द्वारा संचालित थी सो इसमें इसकी छवि तो आनी ही थी। समय से काफी देर हो चुकी थी मगर प्रक्रिया शुरू होने का नाम ही नहीं ले रही थी। इन्तज़ार से मन भारी हुआ ही जा रहा था कि तभी पता चला कि कॉलेज के कुछ सीनियर वहाँ भी पहुच चुके हैं। रैगिंग के बारे में काफी सुन चुका था तब तक मगर कभी सामना नहीं हुआ था। उन सीनियर को देख कर बस यही लग रहा था कि जैसे बकरों को मरने के लिए शेर के साथ पिंजरे में रख दिया गया हो। एक सीनियर हमारी तरफ भी मुखातिब हुए। इज्ज़त में हम भी खड़े हो गए। सीनियर ने बड़े प्यार से बगल में कुर्सी लगा कर बैठते हुए मुझे भी मेरी कुर्सी पर बैठने को कह दिया। नजदीक से उस भयानक पशु, जिसका नाम सीनियर होता है, से मेरा पहला साक्षात्कार यही था। उस सीनियर ने बड़े प्यार से मुझसे मेरा नाम पूछा। मुझे तो मालूम भी नहीं था कि सीनियर का अभिवादन यहाँ कैसे करते हैं। मैंने तुक्का लगाते हुए उन्हें 'सर' कहके संबोधित करते हुए अपना नाम बता दिया। उन्होंने बड़े ही प्यार से समझाया कि यहाँ 'सर' नहीं 'बॉस' कहते हैं। आश्चर्य नहीं हुआ। चूँकि पिताजी भी डाक्टर हैं और उन्हें कई लोगों को बॉस कहकर संबोधित करते हुए सुना है इसलिए एक तरह से ये अपेक्षित ही था। मगर फिर भी जिस रूप में इस शब्द का इस्तमाल हम स्कूल में करते थे वो सोचकर उस वक्त थोड़ी असहजता महसूस जरूर हुई (बताता चलूँ की 'BOSS' का इस्तमाल हम 'Brother Of Sexy Sister' के रूप में किया करते थे)। वो असहजता कुछ पलों की ही रही और शायद इस शब्द का इस तरह प्रयोग स्कूल के बाद आज अपने पोस्ट पर ही कर रहा हूँ। अब तो ये शब्द हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं।
वहाँ बैठे बैठे बॉस ने हमें हमारी मेडिकल की पहली शिक्षा दे डाली थी। उसके बाद बारी आई हमारी इंट्रो की। बॉस ने मुझसे मेरा इंट्रो पूछा। पहली बार था तो इंट्रो शब्द ही नहीं समझ पाया कि आखिर ये बला क्या है। बॉस के तेवर थोड़े सख्त हो गए। उन्होंने कड़क आवाज में कहा, "रे गधा, इंट्रो मने इंट्रोडक्सन।" इसके बाद भी बात कुछ पल्ले नहीं पड़ी। सोचा नाम तो बता ही चुका हूँ अब इंट्रो में बचा क्या। इतने में बॉस फिर से मेरी मुसीबत समझ गए और इंट्रो के कंटेंट के बारे में मुझे बता दिया कि नाम, पिताजी का नाम, घर और स्कूल के बारे में बताना है। सब कुछ बता दिया उसके बाद बॉस वहाँ से जाने लगा मगर उठते उठते उसने एक बम फोड ही दिया। उसने कहा, "साले यहाँ तो सब हमही बता दिए, कॉलेज आओ न तब न पता चलेगा। ऐसा लेंगे न तुम्हरा कि यादे रहेगा जिंदगी भर।"
बॉस शब्द और बॉस नामक प्राणी के साथ मेरी पहली मुलाक़ात इस तरह से हुई थी। बॉस ने सच ही कहा था, ये बातें अब तक याद हैं और शायद जिंदगी भर याद रहेंगी भी। जब बॉस वो बम फोड कर किसी और की तरफ बढ़ चुका था तो मेरी स्थिति ऐसी थी मानो काटो तो खून नहीं। बॉस जा चुका था इस बात की थोड़ी खुशी तो जरूर हो रही थी मगर साथ में आने वाले उस काल का भय भी सता रहा था जिसका शंखनाद वो कर चुका था। तत्काल कम्पीट करने की सारी खुशी मिट चुकी थी। मन में सिर्फ भय और भय था। शायद पिताजी ने इस भय को भांप लिया। उन्होंने समझाना शुरू किया, "अरे काहे डर रहे हो, जान थोड़े ना मार लेगा। क्या करेगा दू-चार गो सवाल पूछेगा। ऐसा सवाल रहेगा जिसका तुम्हारे पास कोई जवाब हो, तुमको डांट परबे करेगा। कुछो बोलोगे तो गलते बोलेगा। हर गलत जवाब पर मुर्गा बनाएगा, और क्या करेगा। ढेर होगा तो पैंट खोलवायेगा, यही ना। खोल देना। अरे उ मैदान में पैंट खोलने के लिए थोड़े न बोलेगा, रूम में बोलेगा तो खोल देना, कोई दिक्कत नहीं है। ऐसे भी हॉस्टल में सब लड़का आधा नंगा ही घूमता है। अपने रहोगे हॉस्टल में तो वैसे ही घूमोगे। एक्के बात याद रखना रैगिंग में कि कभी किसी सीनियर का बात काटना मत। जो बोलता है बस करते जाना, कोई दिक्कत नहीं होगा।" पिताजी ने शायद उस समय से ३२ साल पहले अपने समय में यही मंत्र अपनाया होगा। एक बार उनके इस गुरुमंत्र की आज के समय में वैद्यता पर थोडा शक जरूर हुआ मगर कॉलेज पहुचते ही ये पता चल गया कि भले काल के पहिये निरंतर चलते रहे, ये मंत्र हर युग के हर सीनियर-जूनियर पर लागू होंगे।
इस प्रकार हमारी काउंसलिंग भी खत्म हो गयी और पंच में एडमिसन का पत्र भी मेरे हाथ में आ गया। डाक्टर बनने की तरफ मैंने अपना पहला कदम बढ़ा लिया था। आज इतने पर ही छोड़ता हूँ। रैगिंग और कॉलेज के कुछ और मजेदार किस्से लेकर आगे आऊंगा। उम्मीद करता हूँ कि ये वाकया आपको पसंद आया होगा। बताइयेगा जरूर।

Wednesday, February 17, 2010

गालियों की हमारी यात्रा!

कल रात इश्किया फिल्म देखा। बड़ा अच्छा लगा। गोरखपुर में आधारित यह फिल्म हर तरह से पूर्वांचल की खुशबू को अपने साथ लेकर आई है। हर डायलोग में अपनेपन की झलक आ रही थी। ग्रामीण परिवेश में ही फिल्म के ज्यादातर सीन फिल्माए गए हैं। दो बाते फिल्म की बड़ी पसंद आई। एक तो बात बात पर गालियों का प्रयोग मुझे अपनी जिंदगी में पीछे जाकर कुछ मीठी यादों को जीने का बहाना दे गया। और दूसरी बात जो अच्छी लगी वो थीं विद्या बालन। साला कौनो लईकी सूती सारियो में अईसन माल लग सकत है, अंदाजा नइखे था। का लगी है बे विद्या बालन इ सनीमा में! साला हम तो फिर से फ़िदा हो गए!
फिल्मों के बारे में इस ब्लॉग पर पहले कई पोस्ट लिख चुका हूँ। इस फिल्म पर भी कुछ लिखने की सोच रहा हूँ, मगर बाद में कभी। अपनी मीठी यादों, जिनका ज़िक्र पहले कर चुका हूँ, के बारे में इस पोस्ट पर कुछ लिखने जा रहा हूँ। उम्मीद करता हूँ कि ये पेशकश पसंद आएगी।
इस फिल्म में कई जगह गाली के रूप में सल्फेट शब्द का प्रयोग हुआ है। यह शब्द सुनते ही 8वीं या 9वीं क्लास याद आ गयी। केमिस्ट्री की क्लास में हाईड्रोजन सल्फेट, कैल्सियम सल्फेट, सोडियम सल्फेट इत्यादि के बारे में पढाई होती थी। किसी होनहार साथी ने कहीं से 'चुतिया' नामक एक गाली को यूँही इनसे मेल खिला कर 'चुतियम सल्फेट' का नाम दे दिया था। ये उसके दिमाग की उपज थी या कहीं से उसने उठाया था, इसके बारे में हमारे पास कोई जानकारी नहीं थी। बस इतना था कि हमें ये उपज काफी पसंद आई थी। हालांकि, बदमाशियां हम भी कम नहीं किया करते थे मगर मार-पीट और गाली-गलौज वाली बदमाशियों से हमें परहेज ही था। इनके प्रति उतनी उदारता तब तक नहीं आ पाई थी हमारे पास। फिर भी सुनने में चूँकि चुतियम सल्फेट काफी अच्छा लगा था, इस्तेमाल न करने के बावजूद ये याद रह गया। फिल्म में भी सल्फेट का इस्तेमाल इसी रूप में किया गया है। जहां ज्यादातर किरदारों ने सिर्फ सल्फेट से काम चलाया है वहीँ एक जगह इसका विस्तारीकरण भी किया गया है। आज ही मालूम हुआ कि 8वीं में जो तथाकथित आविष्कार हमारे मित्र ने किया था वो काफी प्रचलित है। गालियों के प्रति अपनी जिंदगी में आये बदलावों को ही आज आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ।
बिहार में भागलपुर जिले से मूलरूप से आता हूँ। जहाँ बिहार में मिथिला-क्षेत्र वाले अपनी मीठी जुबान के लिए जाने जाते हैं वहीँ हम भागलपुर के अंग-प्रदेश वाले अपनी लठमार लंठ बोली के लिए मशहूर हैं। इस क्षेत्र में लोगों का मुंह किसी की बड़ाई के बारे में भी खुलता है तो उसमे एकाध गाली जरूर होती है। अब एक उदाहरण दे ही देता हूँ। साढ़े चार साल पहले जब मैं मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ तो गाँव के एक चाचा ने साथ बैठे अपने मित्र को ये खबर कुछ इस तरह सुनाई, "जानै छै रे, रंजन दा के बेटा मेडिकल में कम्पिट करी गेलै। बेटीचोदा बड्डी तेज छै।" इससे अंदाज लग ही गया होगा हमारे क्षेत्र की बोली के बारे में। इस क्षेत्र से आने के बावजूद भी, चूँकि बचपन से ही शहर में ही रहा हूँ, गालियों के प्रति कोई खास रुझान नहीं आ सका। 4थी- 5वीं तक तो गालियाँ बिलकुल भी नहीं बोलता था। राह चलते कई बार कई गालियाँ सुना, मगर इन्हें संस्कारहीनता की निशानी समझकर कभी कोई गौर नहीं किया। हालत ये थी कि 'साला' छोड़ कर कोई गाली आती भी नहीं थी। धीरे धीरे बड़े होते गए। पढ़ाई के प्रति कभी बहुत ज्यादा सीरियस नहीं था मगर हमेशा क्लास में अच्छा रिजल्ट आने के कारण पहचान पढ़ने-लिखने वाले लड़कों में ही होती थी। इसलिए कभी वैसे लोगों से ज्यादा निकटता भी नहीं हो पाई जहाँ से गालियाँ सीख पाते। वो लोग भी बच्चा समझ कर मेरे सामने परहेज ही करते थे। परिणाम ये हुआ कि मेट्रिक पास करते करते भी अपनी डिक्शनरी में गालियों के कॉलम में 10-12 गाली ही आ सके थे, हालांकि इस्तेमाल करने की हिम्मत एक-दो छोटी वाली की ही होती थी।
मेट्रिक के बाद, 11वीं में अपने 3 इडियट्स की तिकड़ी के बारे में पहले भी बता चूका हूँ। हम तीनों गालियों के मामले में बिलकुल अलग थे। जहा एक भाई साहब का मुंह खुलता था कि 2-4 गाली बरस पड़ते थे वही दुसरे ने कसम ले रखा था कि कभी किसी को कोई गाली नहीं बकेगा। मेरी स्थिति इन दोनों के बीच में थी। अपने क्षेत्र की रंगत धीरे-धीरे चढ़ रही थी और गालियों के प्रति अपना रुझान बन चुका था। गालियाँ बकने में कोई परहेज नहीं था मगर गालियाँ अपने पास थी ही नहीं। अपने मित्र को ही अपना गुरु बनाया और काफी सारी गालियाँ उससे सीख ली। एक सच्चे गुरु की तरह वो भी मुझे गालियों को उनके मतलब और प्रयोग के साथ समझाता गया और मैं भी भले शिष्य की तरह सब कुछ ग्रहण करता गया। इस सब के साथ उसने मुझे गालियों के परस्पर स्तर को भी समझाया कि ये छोटा, इससे बड़ा ये और फिर ये। कई सारी गालियाँ अपने डिक्शनरी में जुड गयीं मगर फिर भी उतनी उदारता से सब का इस्तेमाल नहीं कर पाता था। माँ-बहन कि गालियाँ इनमे सबसे प्रमुख थीं। इनका इस्तेमाल करने की इजाज़त मैं कभी अपने आप को दे ही नहीं पाया। बेटी की गाली फिर भी हमलोग इस्तेमाल कर लिया करते थे। इसके लिए बाजाब्ता विवेचना भी हुई थी क्लास में। चूँकि अभी तक किसी को बेटी नहीं है और न ही निकट भविष्य में होने की संभावना है, ये सोच कर अंत में निर्णय लिया गया था कि इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। तो इस तरह मात्रा में सबसे बड़ी गाली अपने पास बेटी की ही थी उस वक्त।
12वीं के बाद मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिल गया। रैगिंग शुरू हुई। इसके बारे में कोई जानकारी अपने पास नहीं थी। कई सारी मजेदार चीजें अपने साथ रैगिंग के नाम पर हुई। एक बार सीनियर ने बुलाया था अपने होस्टल में। हम भी तीन की संख्या में पहुच गए थे। गाल पर एक मच्छर ने काट लिया था उस दिन। दाग देखकर एक बॉस ने पुछा, "मच्छर काट लिया है?" "जी!", मेरा उत्तर था। उसने फिर पुछा, "मारा उसको?" "जी नहीं, उड़ गया था तब तक", मैंने फिर जवाब दिया। "उड़ गया तो क्या किया गलियाया उसको?", उसने फिर पुछा। मैंने 'ना' में अपना सर हिला दिया। उसने तुरंत अपना टोन बढ़ाकर कहा, "साला, मच्छर खून पी के भी चला गया और तुम कुछ करबो नहीं किया रे। कैसा आदमी है रे। चलो अभी उसको 50 गो गाली बको।" दिमाग तो चकरा गया मगर हिम्मत करके हमने गालियाँ बकना शुरू किया और संख्या पुराने के लिए उस बेचारे मच्छर की माँ-बहन सब एक कर के रख दिया। फिर क्या था, आये दिन बॉस लोग किसी-किसी को गाली दिलवाने लगते थे। "कुत्ता बड़ी भौंक रहा है गलीयाओ उसको", "चीनी में चीटी घुस गयी है, गाली बको" और न जाने कितने जीव-जंतु को हमसे गाली बकवाई गयी। हद तो तब हो गयी जब एक दिन बॉस का पंखा काम नहीं कर रहा था। उस दिन तो उस पंखे की भी माँ-बहन एक हो गयी।
रैगिंग में इस तरह से धक् खुलने का ही नतीजा आज दिखता है कि अब हमारी भी जबान जब भी चलती है तो मुंह से गालियाँ ही निकलती हैं। पहले तो लड़कियों के सामने कुछ परहेज करते थे मगर अब तो वहाँ भी धड़ल्ले से गालियाँ चलती हैं। हालत कुछ ऐसी हो गयी कि घर में सभ्यता बनाये रखने के लिए गालियों का इस्तेमाल न हो, इसके लिए घर में चुप रहना ही बेहतर समझ लिया। ज्यादा कुछ बोलता ही नहीं था घर में। माँ को शक हो गया कि कहीं कोई नशा-वशा तो नहीं करता जो इतना गुमसुम रहने लगा है। खैर फिलहाल सब ठीक हो गया है। माँ को यकीन हो गया है कि कोई बुरी आदत नहीं लगी है मुझे और घर वाले ये भी जान गए हैं कि अपने क्षेत्र की रंगत पूरी तरह से चढ़ चुकी है अपने ऊपर। और रही मेरी बात तो हम भी अब सर उठा के सीना तान के कहते हैं कि हम भागलपुरिया हैं जहा "चुत्तर धोने से पहले गालियाँ देना सिखाया जाता है बच्चों को".......... :)

Friday, February 12, 2010

स्वागत है वैलेंटाइन डे का!

दो दिन के बाद वैलेंटाइन डे आ रहा है। प्रेमी-प्रेमिकाओं का महापर्व आ रहा है। मेरे लिए तो ये दिन एक अलग महत्व भी रखता है। १४ फ़रवरी ही मेरा जन्मदिन भी है। मैं झूठ नहीं कह रहा। कईयों को लगता है कि मैं यूँही जानबूझ कर अपना जन्मदिन बताता हूँ इस दिन, मगर ऐसा है नहीं। हम तो जब पैदा हुए थे तो मेरे घर में क्या, मुझे लगता है, पूरे भारत में कोई नहीं जानता होगा इस दिन के बारे में। हमने भी अपने १० जन्मदिन ऐसे ही गुजार दिए थे जब अचानक से भारत में भी ये दिन मनाने लगे लोग। अचानक से शाहरुख साहब की कोई फिल्म आई थी जिसमे इसका ज़िक्र था। शाहरुख ने परदे पर ये दिन क्या मनाया सारा हिन्दुस्तान चल दिया उनके पीछे। हमारे यहाँ भी लोग इसे धूमधाम से मनाने लगे। पाश्चात्य संस्कृति के प्रति हमारे बढते हुए झुकाव की एक झलक इस दिन को मनाने के प्रति हमारे जोश में भी दिखाई दे जाती है। अगर ऐसा नहीं होता तो शायद प्यार को पवित्र मानने वाले हमारे देश में हम कोई एक खास दिन मुक़र्रर नहीं कर देते प्यार जताने के लिए।
बहरहाल, जब से ये दिन प्रचलित हुआ है हमारे यहाँ तब से मैं सभी दोस्तों को सबसे बड़ा झूठा प्रतीत होने लगा हूँ। किसी को यकीन नहीं होता कि मेरा सच्चा जन्मदिन १४ फ़रवरी ही है। किसी को भी अपना जन्मदिन बताता हूँ तो पहला जवाब आता है, 'साले झूठ मत बोल, सच बता ना तेरा जन्मदिन कब है।' कोई कहता है, 'साला लड़की पटाने के लिए झूठ बताता है अपना जन्मदिन।' मैं क्या कहूँ कि मैं झूठ नहीं बोल रहा। बस यही कह देता हूँ, 'यार पता नहीं था पैदा लेते वक्त इस दिन के बारे में नहीं तो एक दिन पहले या बाद में ही आता।' सच कहूँ तो एक तरह से ये मेरे लिए गड़बड़ ही है कि मेरा जन्मदिन इसी दिन पड़ता है। लडकियां एक ही दिन दोनों बातों के लए मुबारकवाद दे देती हैं, दो दिन होता तो उनसे भी दो दिन बाते होती। खैर क्या करें, अब तो हो गए पैदा, दुबारा तो हो नहीं सकते।
खैर, कुछ भी हो इस दिन का फायदा काफी मिला है हमारे देश में। हमारे यहाँ बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है। ऐसी स्थिति में यदि कोई चीज़ एक दिन का रोज़गार हज़ारो लोगो को दे दे तो हमें उसका स्वागत तो जरूर करना चाहिए। वैलेंटाइन डे भी ऐसा ही एक दिन है। कितने हज़ार प्रेमियों को इसे लेकर अपने निकम्मेपने को दूर भगाने का एक बहाना मिल जाता है। जहाँ आम दिनों में उनका सारा वक्त ऐसे ही बैठे बैठे फोन पर बतियाते बीत जाया करता है वहीँ इस दिन को लेकर हफ्ते भर पहले से ही उन्हें काम मिल जाता है। प्रेमिका के लिए कोई उपहार खरीदने के बहाने घंटों कई दुकान के चक्कर काटने में लग जाते हैं। किस तरह से उस दिन को मनाया जाय, कई घंटे तो ये सोचने में ही लग जाते हैं। सालभर जो आदमी ऐसे ही निकम्मा बैठा रहता है उसके लिए यदि कोई दिन इतना काम लेकर आ जाये तो ऐसे दिन का स्वागत तो होना ही चाहिए।
प्रेमी-प्रेमिका ही नहीं, उपहार बेचने वाले दुकानदारों के लिए भी वैलेंटाइन डे काफी महत्त्वपूर्ण है। साल भर एक भी उपहार बिके या न बिके इस दिन के लिए उनके दुकान में रौनक बड़ी जमती है। कई उपहार बिक भी जाते हैं। आर्चिज के ग्रीटिंग कार्ड की दुकान की तो बात ही कुछ और होती है। जिस तरह कि साज-सजावट हमारे यहाँ दिवाली में होती है वैसा ही कुछ नज़ारा उनके यहाँ इस दिन पर देखने को मिलता है। एक बार मैं किसी के लिए 'Get Well Soon' का कार्ड लेने गया था। संयोग ऐसा था कि समय 14 फ़रवरी के आसपास का ही था। दुकान में एक भी कार्ड नहीं मिला। सारी कि सारी दुकान वैलेंटाइन डे के कार्ड से ही भरी पड़ी थी। कुछ नहीं कर सकता था। मुंह लटकाकर निकल गया। दुकानदार ने झाड़ा भी था। कहा था, 'मौका कुछ और कार्ड लेने चले आते हैं कोई और!' अब मैं क्या करता, तब तो हम single ही थे, चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते थे।
वैलेंटाइन डे को मनाने वाले लोगो के लिए तो ये दिन महत्त्वपूर्ण है ही, इसका विरोध करने वालो के लिए भी ये दिन उतना ही महत्त्वपूर्ण है। बजरंग दल हो या शिव सेना, विश्व हिंदू परिषद हो या श्री राम सेना, सभी के कार्यकर्ताओं को भी रोजगार मिल जाता है। साल भर बिना काम के बिताने वाले इन लोगो के लिए वैलेंटाइन डे का हफ्ता कुछ खास ही महत्त्वपूर्ण हो जाता है। सारे दुकानों में तोड़फोड़ करने का काम एक हफ्ते पहले से ही शुरू हो जाता है। 14 फ़रवरी के दिन तो उनकी गाज पार्क या लवर्स-प्वाइंट पर डेट पर गए हुए प्रेमी-युगलों पर ही गिर जाती है। बेचारे, हफ्ते भर की मेहनत के बाद ये सोच पाते हैं कि किस तरह इस दिन को मनाएंगे और ऊपर से जब वो दिन आ जाता है तो कोई उन्हें शांति से कुछ घंटे बिताने भी नहीं देता है। कई बार टीवी पर उन्हें पिटते भी देखा है। अपनी संस्कृति के नाम पर हिंसा को अंजाम देने वाले इन दलों के कार्यकर्ता अपने आप को भारतीयता के सबसे बड़े रक्षक समझते हैं। वो हों कुछ भी, मगर उन्हें वैलेंटाइन डे का ही शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्हें कम से कम एक दिन का रोजगार तो मिल ही जाता है। रोजगार तो टीवी न्यूज चैनल वालो को भी मिल जाता है। आलतू-फालतू खबरों में ये खबर भी जुड़ जाती है। दिन भर एक ही न्यूज चलता रह जाता है। कोई भी चैनल लगाएं, आपको एक ही खबर मिलेगी। कोई इस दिन की उत्पत्ति पर रिपोर्ट देता है, कोई इसे मनाने के तरीकों पर। कोई प्रेमी-युगलों से साक्षात्कार लेता है तो कोई उन्हें पिटता हुआ ही दिखाता रहता है। रोजगार तो सच में कईओं को मिल जाता है वैलेंटाइन डे के बहाने।
दूसरों पर हंसना और उनपर व्यंग्य करना तो कोई भी कर सकता है मगर महान वही होता है जो खुद पर हँसे। ये बात बहुत पहले से बुजुर्गों से सुनता आया हूँ। महान मैं भी बनना चाहता हूँ। कौन नहीं चाहता है। महान बनने की ललक सब में होती है, मुझमे भी है। मैं भी हूँ तो इंसान ही। तो कुछ बात अपनी भी बता ही देता हूँ। जहाँ तक मेरा सवाल है, मैं इस दिन पर कुछ खास विश्वास नहीं रखता। आम प्रेमी-युगलों की तरह हमारी जोड़ी में भी हम दो विपरीत ध्रुव के प्राणी हैं। जहाँ मुझे अपने प्यार के दिखावटीपने में कतई रूचि नहीं है, वहीँ हमारी 'वो' हमेशा इसकी प्रत्यक्षता में ही विश्वास रखती हैं। बिना कुछ कहे, कुछ बोले, मन ही मन चाहे कितना भी ख्याल रख लो कोई फर्क नहीं पडेगा, मगर एक बार ऊपर मन से ही सही एक 'I Love You' बोल दो तो सारा जहां तुम्हारा। शिकायत नहीं कर रहा। कोई शिकायत है ही नहीं, ये तो प्यार का दस्तूर है। दो विपरीत ध्रुवों के आपस में मिलन से जो प्यार पनपता है उसमे इस तरह के वैचारिक मतभेद तो आते ही रहते हैं। हमारी जिन्दगी में भी कई मतभेद हैं। उनमे से ही एक हमारे लिए वैलेंटाइन डे की महत्ता भी है। जहाँ 'उनके' लिए ये बहुत महत्वपूर्ण है, मेरे लिए इसका कोई महत्व नहीं। अरे हम तो 365 दिन प्यार करने वालों में हैं, हमें किसी एक दिन की जरूरत नहीं अपने प्यार के इज़हार करने के लिए। भारतीयता पर पूरा विश्वास है हमें। हमने कभी 'हीर जयंती' या 'राँझा दिवस' नहीं मनाया। कभी सोनी या महिवाल की पुण्य तिथि भी नहीं मनाई। हमने तो इन्हें अपने मनों में ही बसाया है, प्यार को इनके नाम से ही हमेशा पवित्र माना है। खैर, कह तो बहुत बड़ी बड़ी बात रहा हूँ कि वैलेंटाइन डे का कोई महत्व नहीं है मेरे लिए, मगर जब 'उनका' ज़िक्र आता है तो हर पीड़ित प्रेमी कि तरह हम भी न चाहते हुए ही सही, शौक से ही मनाते हैं इस पर्व को। साल भर का हमारा निकम्मापन आखिर खत्म हो ही जाता है इस दिन। ऊपर से मेरा तो जन्मदिन भी है। फायदा तो हमें ही हो जाता है। अच्छे-अच्छे पकवान मिल जाते हैं उनके हाथों से बने हुए। हमारा तोहफा तो यही होता है। रोज़गार भी मिल जाता है और साथ में मेहनताना भी। स्वागत तो सच में होना चाहिए वैलेंटाइन डे का।

Monday, February 08, 2010

शाहरुख़ और बाल ठाकरे दोस्त हैं!!!

एक हफ्ता हो गया ब्लॉग पर कुछ हलचल हुए. इधर कुछ व्यक्तिगत पोस्ट पर जिस तरह की प्रतिक्रिया आप सब से मिली उस से खुशी भी हुई और थोड़ा आश्चर्य भी हुआ. हमारी 'उनकी' बात सच साबित हो गयी. उनके बारे में लिखा और टिप्पणियों का तांता लग गया. स्कूल जीवन के एक रोचक हिस्से को पोस्ट में उतारा तो वो भी हिट हो गया. उसके पहले कई तरह के पोस्ट मैंने अपने ब्लॉग पर लिखे, कुछ सिनेमा से सम्बंधित, कुछ राजनीति से तो कुछ क्रिकेट से. किसी भी पोस्ट पर इस तरह का रेस्पोंस नहीं मिला जैसा की अंतिम दो पोस्ट पर मिला. शायद लोगों को दूसरों की जिंदगी के बारे में जानने में सच में ज्यादा मन लगने लगा है. अब समझ में आने लगा है कि कैसे टीवी धारावाहिक इतने प्रचलित हो गए हैं. हिंदी न्यूज चैनलों पर समाचार छोड़ कर सारी अनाप शनाप बातें होती है, इसके पीछे भी शायद हम लोगो की यही बदली हुई मानसिकता है जिसमे हम यथार्थ को छोड़कर किसी के फटे में टाँग घुसाने की कोशिश हमेशा करते रहते हैं. क्या जरूरत है Tiger Woods के दर्जनों सेक्स संबंधों को इतनी तवज्जो देने की. उसने बलात्कार तो नहीं किया, आपसी सहमति से सम्बन्ध बनाए फिर भी पूरी दुनिया को जानने की पड़ी है कि और कितनी लड़कियों के साथ उसके सम्बन्ध रहे हैं. Brad Pitt और Angelina Jolie अलग हो रहे हैं, इसपर भी ब्रेकिंग न्यूज बन गया. सोचिये अगर आपके घर में (भगवान न करे) ऐसा कभी कुछ होता है और आपके पड़ोसी इसकी चर्चा करते रहते हैं तो आप पर क्या बीतेगी. इस सवाल के रूप में ही अपनी बात रखना चाह रहा हूँ. क्या सच में आज हम ऐसे हो गए हैं जहाँ हमें दूसरों की व्यक्तिगत जिंदगी में क्या हो रहा है ये जानने में सुकून मिलता है??

बहरहाल, इधर के दो पोस्ट पर प्रतिक्रियाओं के साथ अपनी कहानी को आगे लिखने की मांग भी आई हैं. ब्लॉग लिखता हूँ कि लोग पढ़े और इसे पसंद करें. भाई TRP का ज़माना है. इसके लिए कुछ भी करने को तैयार हैं हम. आगे जरूर अपनी प्रेम कहानी के बारे में लिखूंगा मगर इस बार कुछ राजनीतिक लिखने कि इजाज़त दी जाये.

कुछ महीने पहले महाराष्ट्र में चुनाव हुए. कांग्रेस की सरकार एक बार फिर चुन ली गयी. शिव सेना की रही सही साख भी खत्म हो रही थी. बाला साहब के मराठी माणूस के फार्मूले को राज ठाकरे उनसे अलग होकर अपने फायदे के लिए भुना रहे थे. कही न कही बाला साहब अपना मन मसोस कर ही रह जाते होंगे. उनके अंदर का शेर अब बुढा हो गया था और मेमने में उनके जैसा करिश्मा नजर नहीं आ रहा था. जरूरत थी एक बार फिर अपने उसी रूप को जगाने की जो 90 के दशक में हमने बखूबी देखा था. जरूरत थी एक मुद्दे की जिससे वो फिर एक बार अपनी घटिया राजनीति खेल सकें, वो हिंसक भडकाऊ खेल जिसके वो माहिर खिलाडी थे.

इधर शाहरुख खान की फिल्म रिलीज होने वाली थी. विवादों को फिल्म के लिए सबसे बड़ी पब्लिसिटी समझने वाले इस बॉलीवुड में हर बड़ी फिल्म के पहले कोई न कोई विवाद जरूर खड़ा होता है. ये एक संयोग है या फिर सोची समझी साजिश, कह पाना बड़ा मुश्किल होता है. कोई भी फिल्मकार या अभिनेता इस से अछूता नहीं है. आमिर खान का बड़ा फैन हूँ मैं, मगर उससे भी खफा रहता हूँ इस बात के लिए. उनके साथ भी विवाद जुड़े ही रहते हैं. मेधा पाटकर के साथ वो आज आंदोलन में बैठने की कोशिश नहीं करेंगे लेकिन यदि अगले हफ्ते कोई फिल्म रिलीज होने वाली हो तो जरूर जायेंगे. 3 Idiots के साथ भी बिना मतलब का एक विवाद जुड़ गया. शाहरुख खान भी इससे अछूते नहीं हैं. मुझे आज तक समझ नहीं आया की बिल्लू बारबर फिल्म में नाइयों के प्रति ऐसी कौन सी दुर्भावना दिखाई गयी कि इस फिल्म के नाम से बारबर हटाना पर गया. नाइयों को सच में कोई आपत्ति थी या फिर शाहरुख खान ने खुद ही ये विवाद उठाया था नहीं कह सकता, मगर इतना तो जरूर है कि किसी भी बड़ी रिलीज के पहले कोई न कोई विवाद होना जरूरी ही हो चला है.

My Name Is Khan रिलीज होने वाली है. शाहरुख को जरूरत थी इसकी मुफ्त पब्लिसिटी की. विवाद से बढ़िया उपाय और कौन हो सकता था. भगवान ने भी उनकी सुन ली. पाकिस्तानी खिलाडियों पर उनका बयान मामूली सा था. इस बयान के बारे में उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि इससे उनका इतना फायदा हो जायेगा. मन ही मन में बाल ठाकरे ने भी शाहरुख को शुक्रिया कहा होगा इस बयान के लिए. इसी बयान ने शिव सेना की डूबती नैया को सहारा दे दिया. बहुप्रतीक्षित मुद्दा उन्हें भी मिल गया. अपनी भडकाऊ राजनीति के लिए इस से अच्छा मुद्दा और कहाँ मिलता.

शिव सेना ने विरोध शुरू कर दिया और शाहरुख भी अड़े रह गए. उन्हें भी फायदा हो गया. मुफ्त की पब्लिसिटी मिल गयी बाजार में. अगर किसी की आँखों से फिल्म का पोस्टर छूट भी जाता तो भी शिव सैनिको ने उसे कैमरे के सामने जलाकर ऐसा होने से रोक लिया. शाहरुख की फिल्म थी, चलती बिना विवादों के भी. मगर फिर भी लोग आदत से मजबूर हैं. विवाद नहीं तो फिल्म हिट कैसे हो. शाहरुख ने कहा माफ़ी नहीं मांगेंगे. खुद कभी जो तेल नहीं लगाया हो वैसे तेल का प्रचार करने वाला शाहरुख आज अपने स्वाभिमान की बात करने लगा. सच क्यों नहीं कह देते शाहरुख की माफ़ी नहीं मांगने से तुम्हारा फायदा ही फायदा था.

बालासाहब भी भिड़े रह गए. उन्हें भी फायदा मिल रहा था. शिव सेना के जिस रूप का हम सिर्फ सालाना valentine's day पर ही दर्शन कर पाते थे वो हमें इस बार पहले ही मिल गया. उनकी तो चांदी ही चांदी है. मुद्दे मिल नहीं रहे थे और आज मुद्दों की बाढ़ आ गयी है. किसे पकड़े किसे छोड़े समझ नहीं आ रहा है. शाहरुख का बयान हो या फिर ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को IPL में नहीं खेलने देने का मुद्दा. और तो और एक हफ्ते में ही Valentine's Day भी आ रहा है. सोनिया गाँधी का विदेशी मूल तो है ही इन सब के साथ. औलाये बौलाए ठाकरे को समझ में नहीं आ रहा क्या करें. शाहरुख के बयान से जितना फायदा निकालना था निकाल लिया. अब कहते हैं की फिल्म का विरोध नहीं करेंगे. आखिर कहे क्यों नहीं. फिल्म का विरोध करेंगे तो 14 फ़रवरी को दुकानों और क्लबों में तोड़फोड़ कौन करेगा. गिने चुने कार्यकर्ताओं से ही तो उन्हें हर जगह काम चलाना है. हड्डी टूट गयी तो फिर दुसरे मुद्दे पर पोस्टर और पुतले जलाने के लिए आदमी कहा से लायेंगे. जो कुछ आदमी बचे हैं उनके पास वो भी छोड़ कर चल देते अगर कुछ दिन की और बेरोजगारी झेलनी पड़ती. जाने अनजाने में शाहरुख ने शिव सैनिको को रोजगार दे डाला और बदले में शिव सैनिकों ने उन्हें फिल्म का प्रचार. मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर शाहरुख और बाल ठाकरे दोनों एक दुसरे का धन्यवाद ज्ञापन करते हुए पाए गए! आखिर दोनों ने एक अजीबोगरीब दोस्ती ही तो निभाई है!

Monday, February 01, 2010

पप्पू के माँ की खोज!

मैंने अपने पिछले पोस्ट में अपने कॉलेज जीवन में जातीयता की यात्रा की शुरुआत का ज़िक्र किया है। हालांकि ये यात्रा सही रूप से कॉलेज के माहौल से ही शुरू हुई है मगर इसके बीज काफी पहले ही पड़ चुके थे। बिहारी होने का एक मतलब इस बीज के साथ पैदा होना भी होता है। इस तरह के generalisation से हालांकि मुझे बचना चाहिए था मगर कुछ भी हो, घरेलु ग्रामीण परिवेश में ये बात बिहारियों पर जरूर लागू होती है (अपवाद हर नियम में होते हैं और ये नियम खुद कोई अपवाद नहीं)। आज अपनी स्कूल की ज़िन्दगी का जिक्र करने जा रहा हूँ जहाँ जातीयता के साथ अल्हड़ जवानी के रंग भी देखने को मिलेंगे।

10वीं बोर्ड की परीक्षा पास करके 11वीं में फिर उसी स्कूल में एडमिशन ले लिया था। पुराने ज्यादातर दोस्त स्कूल बदल चुके थे या फिर दुसरे विषयों का चयन करके अलग अलग सेक्शन में चले गए थे। मैं जिस सेक्शन में था वहां मेरे साथ उसी स्कूल के पढने वाले कुछ पुराने लोग भी थे जिनमे 2 लोग ऐसे थे जिनके साथ की मेरी अच्छी दोस्ती थी। हम तीन उस समय के 3 idiots थे। फिल्म के तीनों पात्रों से सब की तुलना नहीं करना चाहूँगा और न ही किसी एक को किसी एक ख़ास पात्र से जोड़ना ही चाहूँगा। अगर किसी को रैंचो का किरदार दे दूं तो शायद ये उन बाकी बचे 2 लोगो की क्षमताओं के साथ नाईंसाफी हो जाएगी। हम तीनों में हर पात्र की कही न कही कोई झलक जरूर मिलती थी।

खैर, हम 3 idiots साथ में एक ही बेंच पर बैठा करते थे। कभी हमारे मन में एक दुसरे के प्रति जातीय भेदभाव की भावना नहीं आई थी मगर फिर भी बिहारी होने का एहसास उम्र के साथ हमारे परिपक्व हो रहे दिमाग को हो रहा था। इसी एहसास का कारण था कि एक दिन हमने आपस में एक दुसरे की जाति पूछ डाली। ये अजीब संयोग ही था कि हम तीनों समजातीय ही निकले। इस बात को जोर देकर यहाँ पर कहना चाहता हूँ कि हमारी दोस्ती में कोई बदलाव नहीं आता अगर हमें ये पता चलता कि हम एक जात के नहीं हैं मगर फिर भी, इस बात से इनकार भी नहीं करना चाहता कि ये जानकर कि हम समजातीय है हमारी दोस्ती और प्रगाढ़ हुई।

क्लास में सुबह का पिरीयड शुरू होने वाला था। हम सब प्रार्थना सभा से तुरंत क्लास में लौटे ही थे और हमारे क्लास टीचर का भी आगमन हो चुका था। रोल कॉल हो रहा था कि तभी दरवाजे से एक पतली सी आवाज आई, "May I come in sir"। हमारी नजरें उस पतली आवाज की तरफ दौड़ गयी. एक 5 फीट 1-२ इंच लम्बी, कुछ हद तक गोल-मटोल लड़की, छोटी छोटी आँखों पर मोटे मोटे चश्मे लगाये हुए क्लास टीचर के जवाब का इन्तेजार कर रही थी। ग़ालिब की रुबाईयां हों या खय्याम के गीत, आपको खूबसूरती के कही बेहतर नज़ारे कई जगह मिल जायेंगे। कही से भी कोई आकर्षण वहा मौजूद नहीं था मगर फिर भी आखिर हम तो थे मर्द ही। नयी नयी चढ़ रही मर्दानगी का ही असर था कि कही भी कोई ढंग की लड़की देखते ही घंटियाँ बजनी शुरू हो जाती थी। कुछ ऐसा ही उस दिन भी हमारे साथ हुआ।

वो लड़की क्लास के अन्दर आई और क्लास टीचर को बताया कि उसका नया नया एडमिशन इस सेक्शन में हुआ है। तब तक हमारे बीच बाते होने लगी थी कि साली आखिर है कौन। नाम जानने की उत्सुकता ने हमें उसके और हमारे टीचर के बीच हो रहे वार्तालाप को सुनने पर मजबूर कर दिया। अंततः उस वार्तालाप में हमें उसका नाम पता चल ही गया। नाम सुनना ही क्या था कि हम में से एक ने कहा, "रे साला! जाते बहिन है।" "बहिन मत बोल बे साले। जब देखो तब जिसको मन तिसको साला बहिने बना लेता है," मेरा जवाब था। जाति-बोध का एक ज्ञान किसी के उपनाम (title) से उसकी जाति का अंदाज लगाना भी होता है। बिहारी परिवेश में पले बढ़े होने के कारण हम इस ज्ञान के काफी धनी थे। हालांकि उपनाम से जात का अंदाज शत प्रतिशत सही तो नहीं होता मगर ज्यादातर सही ही लग जाता है। खैर, मेरा अपने दोस्त को ये जवाब देना ही काफी था कि मुझे उसके साथ जोड़ने में वे दोनों शुरू हो गए। हमने भी शर्माने लजाने से बेहतर इसे स्वीकार कर लेना ही समझा हालांकि कही से भी ऐसी कोई भावना मेरे मन में नहीं आई थी।

बात आई गयी हो गयी। हम सब भूले तो नहीं थे इस बात को मगर इसे पीछे छोड़ कर काफी आगे बढ़ गए। 12वी में पहुंच चुके थे। Physics की क्लास हो रही थी। गुरुदेव, जिन्हें हम प्यार से 'कप्पूआ' बुलाया करते थे, वो क्लास ले रहे थे। उनके tuition के ऑफर को ठुकराना मेरे लिए काफी भारी पर रहा था क्युंकि हर क्लास में उनके निशाने पर मै ही हुआ करता था। किसी न किसी बहाने से मुझे बेईज्जत करना उनकी आदत बन चुकी थी और उनके ही बाण उन्ही पर वापस चलाना मेरी काबिलियत में शुमार हो चुका था। Physics के सिद्धांतों को समझाने में उनके कई सारे उदहारण सीधे मेरी इज्जत को भेदते हुए चले जाते थे। उन्ही में से एक था एक बार मुझे बाप बना देना किसी काल्पनिक पात्र 'पप्पू' का। बस क्या था मिल गया मेरे दोस्तों और पूरे क्लास को मेरा मजाक उड़ाने का एक जरिया। मैं बन चुका था पप्पू का बाप। कुछ समझदार दोस्तों ने उसकी मां के बारे में सवाल उठाने शुरू किये। शुरू हो गयी पूरे स्कूल में पप्पू के माँ की खोज। बाप यहाँ बैठा अपनी बेईज्जती पर मन ही मन आंसू बहा रहा है, बेटे के अस्तित्व का कोई अता पता नहीं है, और फिर भी तलाश जारी है उसकी माँ की।

ये सब चल ही रहा था कि हम तीनो में से एक को एक साल पहले घटी उस घटना की याद आ गयी जिसमे उन्होंने मुझे उस लड़की के साथ जोड़ा था। बस क्या था मिल गयी मेरे दोस्तों को मेरे पप्पू की मम्मी। पप्पू के बाप से एक बार पूछा भी नहीं गया कि उसे पप्पू की मम्मी पसंद थी या नहीं। बस दोस्तों को पसंद आ गयी और हो गया काम। हमने एक बार फिर इनकार करने से बेहतर इसे स्वीकार कर लेने को ही समझा। सोचा ऐसा करने से मेरे ऊपर ब्यंग्य के बाण कम चलेंगे। हुआ भी ऐसा ही। आखिर हमने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली थी। बस क्या था, इधर दोस्तों को मेरी स्वीकृति मिली और उधर उन्होंने उस लड़की का पंजीकरण मेरे साथ पप्पू के मम्मी के तौर पर करा दिया। अगले ही दिन लड़को के द्वारा वो लड़की अपने नाम से कम और पप्पू की मम्मी के रूप में ज्यादा जानी जाने लगी। बात सिर्फ यही तक नहीं रुकी, उस लड़की की एक सहेली भी थी जिसे पप्पू की मौसी का नाम दे दिया गया था। पप्पू की मम्मी से ज्यादा उसकी मौसी ही फेमस हो गयीं थी। कई लोग ऐसे थे जो पप्पू की और उसके मम्मी और मौसी के उपज के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे मगर फिर भी वो मौसी को मौसी के रूप में ही जानते थे। हालत आज भी कुछ ऐसी है कि मुझे पप्पू की मौसी का असली नाम नहीं याद।

पप्पू को मम्मी भी मिल गयी और साथ में एक मौसी भी मगर फिर भी पप्पू का बाप अकेला ही रह गया। कभी उस लड़की से कोई बात नहीं हुई। दोस्तों का मनोरंजन करने के लिए कभी कभार कुछ हरकतें उसकी ओर कर भी दिया करता था मगर मन में कुछ भी न था। पप्पू कही न कही मन में जरूर ज़िंदा था और इसलिए उसके माँ की तलाश भी मन ही मन में जारी थी। कॉलेज तो इस सोच के साथ आया था कि यहाँ इधर उधर भटकना नहीं है और इसलिए शुरूआती दिनों में कभी पप्पू के बिन माँ के होने की पीड़ा को ज्यादा तवज्जो नहीं दे पाया। मगर धीरे धीरे वक़्त के साथ सब कुछ बदला। अपनी प्रेम-कहानी का ज़िक्र पिछले पोस्ट में कर चुका हूँ। इसी प्रेम कहानी के साथ पप्पू के माँ की खोज भी समाप्त हो गयी..........

Wednesday, January 27, 2010

हम और हमारी वो...

इधर कई दिनों से समसामयिक गतिविधियों पर कुछ पोस्ट मैंने अपने इस ब्लॉग पर लिखे हैं। इन पोस्ट के बारे में मैं जब हमारी 'उन्हें' बताता था तो हर बार एक ही जवाब उधर से मिलता था, "भै! तुम तो हमेशा ऐसा ही सब बात पर लिखते हो जो हमरे पल्ले ही नहीं पड़ता। पता नहीं कोई तुम्हारा ब्लॉग पढता भी है या नहीं। हमको तो नहीं लगता। के ई सब आएं बाएं पढ़ेगा। अरे हमरे बारे में लिखो तो लोग को अच्छो लगेगा!" इतनी प्यार और मिठास के साथ उसका बोलना ही काफी था कि आज मैं यूँही उसके बारे में कुछ लिखने जा रहा हूँ.

पटना मेडिकल कॉलेज में जब साढ़े चार साल पहले एडमिशन लिया था तो यहाँ के माहौल के बारे में खासी जानकारी नहीं थी. बस एक विचार ही था कि बढ़िया डाक्टर बनना है तो बाबू मन लगा के पढ़े पड़ी, एन्ने ओन्ने मन के दौड़ावे से काम ना बनी. इसी विचार के साथ हमने कॉलेज में अपना पहला कदम रख दिया. उस समय रैगिंग पर पूरी तरह से रोक नहीं लगी थी और हम फ्रेशर के लिए कॉलेज में एक ड्रेस कोड था जिसमे उजले शर्ट और पैंट पहनने पड़ते थे और साथ में एक हरे रंग की टाई. लड़कियों के लिए उजला सलवार समीज और एक हरा दुपट्टा हुआ करता था. पहली ही दिन हमलोग को पकड़ कर हॉस्टल के छत पर ले जाया गया. रैगिंग क्या होता है जब तक ये जान पाते कि तभी एक बॉस ने पूछा, "फाईलम का है रे?" "जी, chordata",
इस सोच के साथ कि बौसवा तो खुश हो जायेगा, एक भले पढ़े लिखे जीव विज्ञान के छात्र की तरह हमने भी तपाक से जवाब दे दिया. शाबाशी की आस मन में लगाये बॉस के जवाब का इंतज़ार कर रहे थे कि सामने से तपाक से झाड पड़ी, "रे! साला हमलोग non-chordata हैं का रे. साला फाईलम chordata बताता है, हमनी तो जैसे इन्सेक्ट है. का रे, का बूझ लिया है, ढेर स्मार्ट है का तुम." चुप चाप सुनकर सोच ही रहे थे कि हमसे क्या गलती हुई है तभी एक और सीनियर के बोलने पर एक batchmate ने आ कर कान में कहाँ, "फाईलम का मने यहाँ पर caste होता है, अपना जात बता दीजिये."

यही से शुरू हुई हमारी जातीयता कि यात्रा. इसे हम फ़ाईलमबाजी कहते हैं. बिहार में कही भी जाएँ और अपनी जात का ज़िक्र न हो तो शायद बिहार अधूरा ही रह जाये. हर ओर बिहार की तरक्की गूँज रही है मगर आज भी यहाँ सबसे ज्यादा बोलबाला समाज के जातीय बनावट का ही है. इस बात की पुष्टि मुझे कॉलेज के उस पहले ही दिन मिल गयी. खैर फाईलम बता कर हमे कुछ बौस समजातीय मिल गए जिन्होंने हमे वहा की रैगिंग से छुटकारा दिला दिया. उसके बाद शुरू हुआ अपने बैच में अपनी फाईलम के लोगों को ढूंढना. लड़के और लड़कियां दोनों. पहले एक मिला, उसने दुसरे से मिलवाया फिर तीसरे से और इस प्रकार हमारे फाईलम के सभी लोग बैच में मिल गए. इसी क्रम में हमारी 'उनसे' पहली मुलाक़ात हुई. वो पहली ही दिन कॉलेज आई थी. दो और लड़कियां उसे लेकर हम लड़को के पास आई, ये बताने कि ये भी हमारी ही फाईलम की है और वही हुई हमारी पहली मुलाक़ात. हमने भी बड़े शान से पूछ लिया, " ओह, तुम भी अपनी ही फाईलम हो." अपनी मीठी सी जुबान से उसने जवाब दिया, 'हाँ.' बस यही थी हमारी पहली वार्तालाप.

अच्छा डाक्टर बनने के लिए मन में जो विश्वास
लड़कियों के खिलाफ बनाया था वो तब भी जारी था. पढाई पर ध्यान लगाना और लड़कियों को दूर रखने के लिए बेजा हरकतें करना हमारी आदत और फिर एक पहचान बन गयी. इन सब बातों में मैं उस पहली मुलाक़ात को कही भूल ही गया. शुरुआत में उसकी तरफ कोई आकर्षण भी नहीं हुआ करता था और न ही कोई अनायास बातचीत. वो अपने रास्ते चलती थी, मैं अपने. सपने में भी कभी नहीं सोचा था कि हम कभी इतने करीब आयेंगे जितना आज हैं. सच पुछो तो याद नहीं कि फिर कब उस से दुबारा बात हुई थी.

वक़्त गुजरता गया, धीरे धीरे एक सेमेस्टर भी बीत गया. तब तक रैगिंग ख़त्म हो चुका था और फ़ाईलमबाजी के नाते एक-आध बार और हमारी बात हो चुकी थी. मेडिकल कॉलेज कि थोड़ी हवा हमें भी लग चुकी थी और लड़कियों की हमेशा खिलाफत करने वाला मैं थोड़ा नरम हो चुका था. बदलाव अभी जारी ही था और धीरे धीरे दिल और पिघल रहा था. २-३ लड़कियों से काफी बातें होने लगी थी और उनके वाया ही कभी कभार हमारी 'उनसे' भी बात हो जाया करती थी. धीरे धीरे बातों का दौड़ कैन्टीन तक चलने लगा. उसकी वो मुस्कराहट, वो भोलापन, वो सादगी, वो बचपना सब धीरे धीरे मन को भाने लगा. उस के साथ वक़्त गुजारना अच्छा लगने लगा. मन ही मन में वो चाहत शायद फूट चुकी थी जिसका एहसास मुझे पहली मर्तबा उस से उसके जन्मदिन के दिन फ़ोन पर बात करने के बाद हुआ.

इस एहसास को उसे बयां करने में 4 महीने लग गए. 25 सितम्बर की वो सुबह मुझे आज भी याद है. हम सड़क पर मिले. दोस्तों की बदौलत उसे मेरे मन की बात पता चल चुकी थी और मुझे भी पता चल चुका था कि मन ही मन में वो भी मुझे चाहती थी. फिर क्या था हो गयी बात. मैंने उसे बड़े ही रोब के साथ कहाँ, "देखो तुम सब कुछ जानबे करती हो कि मेरे मन में क्या है और हमको भी तुम्हरे बारे में पते है. तुमको कोई प्रॉब्लम नहीं हमको भी कोई दिक्कत नहीं. तो चलो और बात ही क्या करना है, हो गया बात, क्या?" और फिर एक बार वो ही मिठास भरी आवाज में उसका जवाब था, "हाँ." वो पहली मुलाक़ात की 'हाँ' और इस 'हाँ' में कोई फर्क न होते हुए भी कितना बड़ा फर्क था. आज भी उसकी इसी एक 'हाँ' के तो हम दीवाने हैं....................



Saturday, January 23, 2010

सही हुआ पाकिस्तानियों के साथ!

इन दिनों क्रिकेट के गलियारों में अगर किसी खबर ने सुर्खियाँ बटोरी है तो वो है IPL कि नीलामी में पाकिस्तानियों का न लिया जाना। IPL का तीसरा संस्करण शुरु होने वाला है और इसके लिए तैयारियां भी जोड़ों से चल रही है। खिलाड़ियों की नीलामी भी इन्ही तैयारियों का एक हिस्सा थी। IPL फ़्रैंचाईजी टीमों के मालिक अपनी अपनी टीम के लिए नामी-गिरामी खिलाडियों की बोली लगा रहे थे। पुरानी हिंदी फिल्मों में कई बार नीलामी के सीन देखने को मिल जाया करते थे। हीरो का परिवार कर्ज नहीं चुका पाता था और जालिम सेठ उसकी सारी संपत्ति को नीलाम करके अपना कर्ज वसूल कर लिया करते थे। कहीं कोई आश्चर्य नहीं होता था, आखिर नीलामी में बिकते तो सामान ही थे; सामान, जो बिकने और खरीदने के लिए ही बने होते थे। यहाँ IPL की नीलामी में बोली उसी तरह लग रही थी मगर फर्क इतना था कि बोली सामानों की नहीं बल्कि इंसानों की लग रही थी। कभी सोचता हूँ तो लगता है कि क्या यहाँ कोई फर्क था। व्यवसायीकरण के इस युग में जहां हर चीज का वस्तुकरण हो रहा है वहां इंसानों को भी सामान समझा जाना उन फ़्रैंचाईजी मालिकों के लिए शायद गलत नहीं है। खैर, ये खुद में एक मुद्दा है जिसकी चर्चा कभी बाद में करूँगा।
इसी नीलामी के ख़त्म होने के पहले ही एक अलग ही मुद्दा जोड़ पकड़ चुका था। 13 में से एक भी पाकिस्तानी खिलाड़ी को नहीं ख़रीदा गया था। कोई इसका कारण इन खिलाड़ियों के लिए वीसा मिलने में होने वाली दिक्कतों को बता रहा था तो कोई आरोप IPL प्रशासन की ओर लगा रहा था कि उनके आदेश के अनुरूप ही किसी टीम ने इन खिलाड़ियों के लिए बोली तक नहीं लगायी। कोई तो यहाँ तक कह रहा था कि ये सब भारत सरकार की ही करनी थी। जितने मुंह उतनी बातें। सच क्या है और झूठ क्या इसका पता हम जैसे क्रिकेट प्रेमियों को कभी नहीं चल पायेगा। देखा जाये तो जानने कि जरूरत भी नहीं है। तात्कालिक कारण कुछ भी हो, जड़ में तो भारत-पकिस्तान के बिगड़ते रिश्ते ही हैं। कितनी बार इस बदलते-बिगड़ते रिश्ते ने इन दो मुल्कों के बीच क्रिकेट-संबंधों पर पानी फेरा है, इसका तो हिसाब लगा पाना भी मुश्किल हो चला है। एक और बार सही।
नीलामी हुई, नीलामी में वे खिलाड़ी नहीं चुने गए। इनके साथ 30 और खिलाडी नहीं चुने गए। किसी ने कोई आवाज़ नहीं उठाई। पाकिस्तानियों का गुस्सा फूट पड़ा। भारत सरकार और क्रिकेट बोर्ड दोनों पर आरोप पर आरोप लगाये जाने लगे। रमीज़ राजा साहब को तो जैसे रोज़गार ही मिल गया। पिछले एक हफ्ते से वे सभी न्यूज़ चैनल पर छाये हुए हैं। आफरीदी औस्ट्रैलिया में हार रहे हैं फिर भी दिमाग में IPL की नीलामी ही चल रही है। कहते हैं कि उनकी कौम का अपमान हुआ है। अरे काहे कि कौम आफरीदी साहब! ये आपका यही कौम था जिसने कराची में खेलने गए हुए श्रीलंकाई खिलाड़ियों के ऊपर गोले दागे थे। क्या बिगाड़ा था उन खिलाड़ियों ने आपकी कौम का?
सोचता हूँ अगर IPL में इतना पैसा न छिपा रहता तो भी क्या पाकिस्तानी इतनी ही मार करते यहाँ खेलने के लिए। बिल्कुल नहीं। क्रिकेट को पूछ कौन रहा है, यहाँ तो सबको पैसे कि पड़ी है। करोड़ों कमाने का एक आसान तरीका भारत ने पाकिस्तानियों के हाथ से छीन लिया है। कोई ज्यादती नहीं की। पैसे कमाना है कमाओ अपने मुल्क में। साल भर से एक भी मुकाबला तो करवा नहीं पाए अपने मुल्क में और मरे जा रहे हैं भारत के घरेलू मुकाबले में खेलने के लिए।
मैं ये मान लेने को भी तैयार हूँ कि भारत ने जानभूझ कर ही इन पाकिस्तानी खिलाड़ियों को IPL का हिस्सा न बन पाने के लिए ये सब किया है। अगर कोई कहे कि ये मुंबई पर हुए हमले के कारण है तो शायद मैं कहू कि तब ये गलत है मगर पकिस्तान में हमले सिर्फ आम लोगो पर ही नहीं हुए हैं। वहां हमले क्रिकेट खिलाड़ियों पर भी हो चुके हैं। उस हमले को श्रीलन्काइओं से ज्यादा कोई समझ भी नहीं सकता। अगर उस हमले की सजा भारत के एक घरेलु टुर्नामेंट में न खेल पाने के रूप में पाकिस्तानियों को मिल रही है तो क्या ज्यादती हो रही है उनके साथ। है औकात तो करा लें खुद के यहाँ एक PPL और आराम से खेलें वहां। जितनी इज्ज़त मिलनी थी भारत में मिल चुकी पाकिस्तानियों को। इतनी बार पीठ में छुरा घुप चुका है कि अब उसके लिए भी एक भी जगह नहीं बची है। कुछ भी गलत नहीं हुआ है उनके साथ। उन्हें अपनी करनी की ही सजा मिल रही है और कुछ नहीं। जिसकी भी सोच हो पाकिस्तानियों को IPL से अलग रखने की, उसने बिल्कुल सही किया है। मेरी और से शत शत धन्यवाद!!!

Thursday, January 21, 2010

बिहारी होने का अफ़सोस करूँ या हिन्दुस्तानी होने का ग़म

कल समाचारों में ब्रेकिंग न्यूज़ आ रहा था, महाराष्ट्र में टैक्सी परमिट के सम्बन्ध में। टैक्सी परमिट के लिए मराठी बोलने, समझने, और पढ़ने की अनिवार्यता के साथ १५ साल से महाराष्ट्र का निवासी होना भी आवश्यक कर दिया गया था। दूसरा ही समाचार ऑस्ट्रेलिया से आ रहा था। भारतीयों पर एक और हमला हुआ था वहाँ। लोग इस पोस्ट का title पढ़कर समझ ही गए होंगे कि इन दोनों समाचारों का ज़िक्र यहाँ पर क्यूँ किया गया है।
ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हो रहे जुर्म की गाथा अब कई महीने पुरानी हो चली है। एक पर एक समाचार आ रहे हैं। विदेश मंत्रालय बार-बार दिलासा दिलाने में लगा हुआ है। न्यूज़ चैनल भी भिड़े हुए हैं ऑस्ट्रेलिया की छवि को यहाँ के 'होने-वाले-प्रवासियों' के मनों में धूमिल करने में। कोई एक भी कसर नहीं छोड़ रहा। सब अपनी औकात से इस खबर को सनसनीखेज बनाने में लगे हुए हैं। प्रथम-दृष्ट्या मुझे भी आश्चर्य हुआ एवं ख़राब लगा कि ये हम हिन्दुस्तानियों के साथ क्या हो रहा है विदेशो में। अचानक से ये अंतर क्यूँ आ गया। कुछ साल पहले ऐसी ही घटनाएँ अमेरिका और यूरोप में भी घट रही थी। वो मामले अब शांत हो चुके हैं और आशा है कि ऑस्ट्रेलिया वाला मामला भी शांत हो ही जायेगा। मगर सोचने वाली बात ये जरूर है कि क्या सच में ऐसी घटनाएँ भारतीय विशेष पर हो रही हैं या ये उस देश की एक साधारण लचर कानून व्यवस्था है जो इस रूप में सामने आ रही है। हो सकता है वहाँ हिंदुस्तानियों के अलावा और भी देश के लोगो के साथ ऐसा हो रहा हो या फिर खुद वहाँ के लोगो के साथ भी ऐसा हो रहा हो। वो खबरे शायद हमतक पहुचती भी नहीं हैं इस लिए हम इसे भारत विरोधी मान कर हाय तौबा मचा रहे हैं। अब अपने देश को ही ले लीजिये। दिल्ली में आये दिन किसी विदेशी लड़की का बलात्कार हो जाता है। कुछ हफ्ते पहले ही गोवा में एक रूसी लड़की के बलात्कार की खबर आई थी। उसे लेकर रूस में भी ऐसा ही बवाल मचा होगा जैसा भारत में ऑस्ट्रेलिया की खबरों को लेकर मच रहा है। मगर क्या इसका मतलब ये है कि हम रूस-विरोधी हो गए हैं। कतई नहीं।
खैर आज इस पोस्ट को लिखने का मेरा मकसद विदेशो में हो रहे भारतीयों पर अत्याचार के बारे में ही लिखना नहीं है। आज यहाँ पर मैं भारत और बिहार के बीच एक समानता की रेखा खीचना चाह रहा हूँ। जो कुछ भारतीयों के साथ विदेशो में हो रहा है वो सब कुछ क्या हम बिहारी अपने देश में ही नहीं झेलते। शिव सेना और अब उनके साथ महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने महाराष्ट्र में मराठी मानुष के हकों के नाम पर बिहारियों या यूँ कहे हिंदी-भाषियों पर जो कहर ढाए हैं उनकी प्रति मिलना नामुमकिन ही लगती है। मगर ज़रा नजर दौडाएंगे तो पाएंगे कि सिर्फ महाराष्ट्र में ही ऐसा नहीं हो रहा। हम बिहारी मजदूरों के रूप में पंजाब में पिट रहे हैं तो छात्रों के रूप में असम में। चैन से हमें कोई नहीं जीने दे रहा. उत्तर भारत हो या दक्षिण, गुजरती हमपर वही सब है जो महारष्ट्र में।
कही न कही भारत और बिहार में समानता तो जरूर है. आज विश्व मंदी के इस दौड़ में भारत की और मुंह बाए खड़ा है, उम्मीद लगाये हुए। देश में बिहार की इज्ज़त भी बढ़ रही है। अब हम बिहारियों को भी इज्ज़त की नजरो से देखा जा रहा है। हम बिहारियों के लिए लोगो की आवाज़ में अचानक एक बदलाव आ चुका है जो दिख रहा है। कुछ ऐसा ही भारत के साथ विश्व मंच पर भी हो रहा है। भारतीयों के लिए दुनिया भर के लोगो के मनों में इज्ज़त बढ़ रही है। देश के अन्दर बिहार तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है तो बाहर वैश्विक स्तर पर भारत की प्रगति का कोई जोड़ नहीं। इन सब के साथ भारत और बिहार में एक और समानता भी है। बिहारी देश के अन्दर दूसरे प्रांतो में पिट रहे हैं तो भारतियों को विदेशो में हिंसा का सामना करना पर रहा है। सोचता हूँ अगर कोई मराठी है तो उसे तो बस इस बात का ही दुःख उठाना है की भारतीय विदेशों में असुरक्षित हैं। हम बिहारियों को तो यहाँ double झटके मिलते हैं। समझ में नहीं आता की भारतीय होकर विदेशो में पिटने का गम मनाउँ या बिहारी होकर अपने ही देश में अपमानित होने का दंश झेलू।
लानत है हर उस आदमी पर जिसने ऑस्ट्रेलिया में हो रहे हमलों की निंदा की है और कभी बिहारियों पर हो रहे जुर्म की तरफ देखा तक नहीं है। अरे दूसरो के द्वारा किया गया अन्याय अपने देशवासियों के द्वारा दिए गए ग़मों के आगे कहाँ ठहरता है। मन तो बस इतना ही सोचता है कि बिहारी होने का अफ़सोस करूँ या हिन्दुस्तानी होने का गम!

Sunday, January 17, 2010

Facebook latest abuse: What colour's your bra??

Almost a week back, I witnessed quite an interesting flood of status messages from my female friends at facebook. I think most of you who use facebook must be knowing this. The status messages consisted of just one word, a colour. There was black, there was white, golden, red, and many others. I was a bit confused what exactly that was. I even asked one of them as to what that is but no reply came. The next day I saw an article in The Times Of India about it telling that all this followed a series of mails asking women and girls for writing the colour of their bra in order to spread awareness about breast carcinoma. The mail asked to write down just one word, the colour, and nothing else.
In a way, I was shocked reading the news in the daily. I don't know what kind of an organisation this was that initiated this move. I learned about it being an american NGO or something but does it really matter. There has been so many fruitful programmes on raising the awareness of this deadly disease, breast cancer. Can a campaign like this really do some good in this regard?
I don't really understand what kind of awareness could these colours raise but it certainly managed to give me much insight into female undergarments. I didn't know that a golden bra also comes in the market. There were many other colours too that I didn't know about. Certainly, it did arose some awarenesss for me (and many others like me). Some of us were even commenting on such colours. Some comments read like 'wow!', 'hot!', 'ooooohhhhhhhh!' and many others depicting the lusty expressions of the mankind. Was the campaign meant for comments like that. Isn't it a disgusting way of promoting something that is too important an issue?
The limit was crossed when some staus messages started coming saying 'nothing.' Such messages were flooded with highest number of comments showing in all respect what regards we boys have for that part of a female's body. I won't say that we boys are not guilty of throwing in such comments, we really are. But are not the girls guilty as much? What exactly do they want to propagate about the cancer by telling their bra's colour. I would have certainly felt a lot embarrassed if I had seen a status message like that one from my sister.
For me, the colour of undergarments in no way provoke any idea inside me for the disease. What could it do at the most was make me a little horny and nothing else. I don't want to be a 'moral police' here neither I want to act like one. I am not saying that it in any way is violating the element of decency in the society. Everybody has a right to express themselves, that they can do in any way of their likings. Maybe, this is what they were doing. Not all the girls on facebook were busy writing in such status messages. There were many who avoided it.
My only point lies in that what kind of an expression was it to tell the colour of your bra to the public. It didn't provoke anybody to form a fan club or community on facebook to fight against breast cancer. What it did provoke was a fan club named "I Really Dont Care What Color Your Bra Is." Now is it not evident enough of what kind of an idea it provoked in people's mind. Everybody has an idea of their own to do something. It lies only on the conscience of the followers to look into the matter, think over it and when it seems followable, then do follow it. May be one day I will see somebody posting a half-nude picture of herself on facebook and saying this is to raise the awareness about breast cancer and for that matter, I would certainly hope nobody raises her voice for cervical or vaginal cancer. We won't be able to tolerate that.
I want to put again my point very clearly that I am not against a move meant to raise awareness about any disease. Being a medical student, I have seen people dying of such diseases; diseases from which people could have been saved with early diagnosis and prompt treatment. I would welcome anything that in reality raises some awareness for this disease. I only hope that people don't indulge in something that is meaningless, disgraceful or in anyway hurting to somebody (like the brothers and fathers who must have felt emabarrassed with such messages). Hopeful for some meaningful use of facebook next time!!!

{NOTE: The link to the TOI article shows only a part of the published article. I couldn't find the full article on web. One can see the bottom of front page of TOI, 8th Jan. isssue.}

गुरु-शिष्य: बदलते रिश्ते!

बहुत पहले की बात है. पापा के साथ किन्हीं के घर गया था. मालूम नहीं था कौन थे वो. अभी भी अच्छी तरह से नहीं याद. पापा ने बताया था उनके कोई शिक्षक थे. कोई ४० साल पुराने. सुनकर बड़ा अजीब लगा था. ४० साल पुराने शिक्षक के साथ सम्बन्ध आज भी बने हुए थे. शिक्षक और शिष्यों के बीच रहने वाले सम्बन्ध के बारे में कई बार पापा बता चुके थे. किस्सा सुनाया करते थे कुछ शिक्षकों का जिनके सड़क से गुजरने वक़्त उनके शिष्य साइकिल से उतरकर किनारे खड़े हो जाया करते थे.

अक्सर सुनता आया हूँ किस तरह पुराने दिनों में शिक्षकों को सम्मान मिला करता था. आज मै भी कॉलेज का विद्यार्थी हूँ. कुछ सालो में शायद खुद भी शिक्षक बन जाऊँगा. जब उन सारे कहानियों के बारे में सोचता हूँ तो यही लगता है कि क्या वो सारी बाते सच में कहानियों तक ही सीमित रह गयी हैं. आज के समय में हम अपने शिक्षकों को वो सम्मान तो बिल्कुल ही नहीं दे रहे और ये आशा रखना कि हमारे शिक्षक बनने पर हमें वो सम्मान मिलेगा, ये बेमानी ही होगी.

वो समय कुछ और था जब शायद लोग गुरु जी को उनके नाम से पुकारते तक नहीं थे. मास्टर साहब बोल कर ही काम चलाया जाता था. कोई दबाव नहीं था मास्टर साहब बोलने का. बात अंतरात्मा से ही निकलती थी. उसके बाद समय आया जब गुरु जी को नाम से पुकारा जाने लगा. नाम के आगे सर या मैडम लगा दिया जाता था जो सम्मानसूचक हुआ करते थे. अगर मात्रा में देखा जाए तो सम्मान पहले से कमा था मगर फिर भी एक critical value से ऊपर ही था. आज का समय है. हम अपने गुरु जी को न नाम से पुकारते हैं ना ही सर या मैडम जैसे कोई संबोधन का प्रयोग करते हैं. आज के समय में झा जी झउआ बन गए हैं, सिंह जी सिंघवा, मंडल जी मंडलवा और तिवारी जी तिवरिया. जिनके उपनाम ऐसे हैं जिन्हें इस प्रकार से सुशोभित नहीं किया जा सकता उन लोगो के नामो का ही उपयोग कर लिया जाता है. सुधीर सुधिरवा बन जाते हैं और रीता रितिया. कुछ लोगो के नाम ऐसे होते हैं जिसके किसी भाग को ही इस तरह सुशोभित करना मुश्किल ये विचारनीय. बात है वाले गुरुओं के लिए सरवा या मैडमिया ही काफी होता है. ऐसे संबोधन मात्र से पता चल सकता है कि हम आज के समय में कितना सम्मान अपने ग्रोन के लिए रखते हैं.

बदलाव आया है. गुरु-शिष्य संबंधों में गिरावट ही आई है. अगर थोड़ी अतिशयोक्ति कि इजाज़त दी जाये तो ये कहना चाहूँगा कि गुरु-शिष्य सम्बन्ध अब नदारद ही हो चुके हैं. बदलाव सच में आया है जो गिरावट के शक्ल में दिख रहा है. अब बदलाव आया है तो कुछ कारण तो होगा ही. परिवर्तन संसार का नियम है; गीता के इस दर्शन का उपयोग मात्र कर के ही हम इस बदलाव को परिभाषित नहीं कर सकते. कही न कही कुछ अंतर तो हुआ जरूर है. ये शिक्षको के बदलते स्तर से जुड़ा है या विद्यार्थियों कि बदलती सोच से ये विचारणीय बात है.

पहले के समय में जो गुरु जी हुआ करते थे उनके पास ज्ञान का भण्डार हुआ करता था. ऐसा नहीं है कि आज के समय में शिक्षको को ज्ञान की कमी है, मगर उस ज्ञान को बाटने कि क्षमता और योग्यता जितनी पुराने शिक्षको में थी उतनी शायद आज नहीं रह गयी है. विद्यार्थी भी शायद अब पहले से ज्यादा आज़ाद हो गए हैं. Competition के इस युग में शायद उनकी निर्भरता अपने शिक्षको पर से कम गयी है. self-study का बोलबाला बढ़ गया है और इसके फैलने से शिक्षको कि महत्ता में खासी कमी आ गयी है.

सम्मान उनके लिए ही मन में आता है जो कि हमारे लिए कुछ सकारात्मक लेकर आते हैं. मानव स्वभाव है ये. हम उनको ही सम्मान देते हैं जिनसे हमें कुछ फायदा होता है.आज के समय में विद्यार्थियों को शायद शिक्षको से कोई फायदा नहीं मिल रहा. भाग दौड़ के इस युग में सब एक रेस में लगे हुए हैं. आगे निकल जाने की, सब को पछार देने की एक होड़ लगी हुई है. इस होड़ में विद्यार्थी को खुद से ज्यादा किसी पर भरोसा नहीं है. देखा जाए तो ये गलत भी नहीं है. खुद से ज्यादा वैसे भी किसी पर भरोसा नहीं करना चाहिए. अपने तकदीर के निर्धारक हम खुद हैं. इसे निर्धारित करने के लिए हमें किसी की जरूरत नहीं. ये कह कर शायद मैं विद्यार्थियों को justify कर रहा हूँ. शायद मैं यही कह रहा हूँ की दोष किसी का नहीं है, समय की आवश्यकता है ये बदलाव. हो सकता है आज मै एक विद्यार्थी हूँ और इसी हैसियत से ही लिख रहा हूँ. इसलिए विद्यार्थियों के पक्ष में ज्यादा लिखा है. कुछ साल बाद जब खुद एक शिक्षक बनू तो शायद उचित सम्मान न मिल पाने की झुंझलाहट में इसी ब्लॉग पर शिक्षको की और से भी कुछ विचार लिख सकू। खैर अभी के लिए इतने पर ही विचार काफी है।